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रामायणम् part I

ओ३म्
रामायणम्

Here we will use a selection of verses from each chapter in the सुन्दरकाण्डम् of श्रीमद्वाल्मीकि-रामायणम्। The English translation is from the GitaPress book.

Saturday, March 26, 2011

प्रथमः सर्गः

Summary: सीतामन्वेष्टुं लङ्कां जिगमिषुर्हनुमान् महेन्द्रशिखरादुत्प्लुत्य जलमध्यादुद्गत्य स्वशिखरे विश्राममर्थयमानं मैनाकं करतलसंस्पर्शनेन संमान्य देवैः प्रेषितां निट्चरीरूपधारिणीं सुरसां मुखं व्यादाय ग्रसितुं प्रतिपालयन्तीं धृतसूक्ष्मरूपस्तदुदरं प्रविश्यापि अहिंसित्वैव बहिर्निरगच्छत् । तथैव सिंहिकाख्यनिट्चरीं मुखं व्यादाय ग्रसितुं प्रतिपालयन्तीं स्वीकृतसूक्ष्मदेहस्तदुदरं प्रविश्य विदारणपूर्वकं व्यापादयत् । अथ च राक्षसजनसंभ्रमं वारयिष्यन्निजदेहं तनूकृत्य लङ्काबहिःस्थगिरिशिखरे न्यपतत्।

“Desirous of reaching Laṅkā in order to discover Sītā, Hanumān takes a leap from a peak of Mount Mahendra and honoring with the touch of his hand Mount Maināka, which rose from the bottom of the sea to provide rest on its peak to Hanumān, encounters Surasā (mother of Nāgas), sent by the gods in the form of an ogresswho was waiting for Hanumān with her mouth open to devour him—enters her belly assuming a minute form and comes out without killing her. Further he is met by another ogress, Siṁhikā by name, standing with her mouth wide open to gulp Hanumān. He enters her mouth after assuming a minute form and comes out after splitting her belly open and killing her. Then contracting his body into a minute form again in order to preclude the fear of the ogres, he descends on a mountain peak outside Laṅkā.”

जिगमिषु: 3-1-7, 7-2-58, 6-1-9, 7-4-79, 3-2-168

उत्प्लुत्य 6-1-71 “तुँक्”

सम्मान्य 6-4-51

Saturday, April 9, 2011

निट्चरी 3-2-16, 4-1-15

आ + ख्या + अङ् 3-3-106 = आ ख्य् अ 6-4-64 = आख्य + टाप् 4-1-4 = आख्या 6-1-101

सिंहिका आख्या यस्या: सा = सिंहिकाख्य 1-2-48 = सिंहिकाख्या 4-1-4, 6-1-101

सिंहिकाख्यनिट्चरी 6-3-42

पालयन्ती 4-1-6, 7-1-81

स्वीकृत 5-4-50, 7-4-32, 1-4-61, 2-2-18

पद् + णिच् 3-1-26 = पादि 7-2-116, by 3-1-32 धातु-सञ्ज्ञा

अपादयत् 3-2-111, 3-4-78, 3-4-100, 3-1-68, 7-3-84, 6-1-78, 6-4-71

वि दॄ + णिच् 3-1-26 = वि दारि 7-2-115, 1-1-51

विदारणम् 3-3-115, 7-1-1, 6-4-51, 8-4-2

तनूकृत्य 5-4-50, 7-4-26

वारयिष्यत् 3-2-127, 3-3-14

लङ्काबहि:स्थ 3-2-4, 6-4-64

verse1:
ततो रावणनीतायाः सीतायाः शत्रुकर्षणः ।
इयेष पदमन्वेष्टुं चारणाचरिते पथि ।। ५-१-१।।

“In order to discover the whereabouts of Sītā, who had been taken away by Rāvaṇa, Hanumān (the scourge of his foes) wished to course through the heavens (the path of the Cāraṇas or celestial bards).”

इष् + णल् 3-4-82 = इ एष् अ 1-1-59, 6-1-8, 7-4-60 = इय् एष 6-4-78

रावणनीता 2-1-32

कर्शन:/कर्षण: 3-1-134, 7-1-1, 7-3-86, 1-1-51, 8-4-2

Saturday, April 23, 2011

verse 2:
एवमुक्तः कपिश्रेष्ठस्तं नगोत्तममब्रवीत् ।
प्रीतोऽस्मि कृतमातिथ्यं मन्युरेषोऽपनीयताम् ।। ५-१-१३०।।

“Spoken to as above (by Maināka), Hanumān (the foremost of monkeys) replied (as follows) to the aforesaid jewel among mountains: – I am pleased (with you) and homage has been done (by you in the form of kind words). Let this sad thought that your hospitality has not been accepted by me be banished (from your mind).”

ब्रू + लँङ् 3-2-111 = ब्रू + त् 3-4-78, 3-4-100 = ब्रू + त् 3-1-68, 2-4-72, 1-1-63 = ब्रू + ईत् 7-3-93 = अ ब्रव् ईत् 7-3-84, 6-1-78, 6-4-71

उक्त 7-2-10, 6-1-15, 6-1-108, 8-2-30

(अप) नी + लोँट् (कर्मणि) = नी ताम् 3-4-78, 3-4-79, 3-4-90 = नी य ताम् 3-1-67

आतिथ्यम् 5-4-26, 1-3-7, 7-2-117, 1-4-18, 6-4-148

verse 3:
प्रविष्टोऽस्मि हि ते वक्त्रं दाक्षायणि नमोऽस्तु ते ।
गमिष्ये यत्र वैदेही सत्यश्चासीद् वरस्तव ।। ५-१-१६९ ।।

“Indeed I have entered your mouth and the boon granted to you has been honored. My salutation be to you, O daughter of Dakṣa! I shall (now) move to the place where Sītā (a princess of the Videha territory) is.”

अस् + लँङ् 3-2-111 = अस् + त् 3-4-78, 3-4-100 = अस् + त् 3-1-68, 2-4-72 = अस् + ईत् 7-3-96 = आ अस् + ईत् 6-4-72 then 6-1-90

‘प्रविष्ट’ 3-4-72 active

verse 4:
हृतहृत्सा हनुमता पपात विधुराम्भसि ।
स्वयम्भुवैव हनुमान् सृष्टस्तस्या निपातने ।। ५-१-१९८ ।।

“With her heart (the very seat of her life) torn asunder by Hanumān, she fell down dead into the water. Hanumān was created as an instrument for her destruction by the self-born creator himself.”

स्वयम्भू + टा = स्वयम्भुवा 6-4-77

पपात 3-4-78, 3-4-82, 6-1-8, 7-4-60, 7-2-116

Saturday, May 14, 2011

verse 5:
ततस्तु सम्प्राप्य समुद्रतीरं समीक्ष्य लङ्कां गिरिवर्यमूर्ध्नि ।
कपिस्तु तस्मिन् निपपात पर्वते विधूय रूपं व्यथयन्मृगद्विजान् ।। ५-१-२१२ ।।

“Duly reaching the seashore and perceiving from there Laṇkā perched on a summit of the Trikūṭa mountain (the foremost of mountains), the monkey for his part descended on that mountain (Trikūṭa), abandoning his (assumed colossal) form and agitating the beasts and birds (inhabiting that mountain with his gigantic monkey form).”

मूर्ध् अन् + ङि (इ 1-3-8) = मूर्धनि/मूर्ध्नि 6-4-136 – गीता 8-12

व्यथ् + णिच् 3-1-26 = व्यथि 7-2-116, 6-4-92, 3-1-32
व्यथि + लँट् 3-2-123 = व्यथि + शतृँ 3-2-124, 1-3-74 = व्यथि + शप् + शतृँ 3-1-68 = व्यथे + अ + अत् 7-3-84 = व्यथय् + अ + अत् 6-4-78 = व्यथयत् 6-1-97

द्वितीयः सर्गः

Summary: रक्षोगणपरिरक्षितलङ्काया दुष्प्रवेशत्वं विचिन्तयन्हनुमान्देहं संकोचयंश्चन्द्रोदयसमये तां प्रविवेश ।

“Reflecting on the difficulty of penetrating into Laṇkā, which was strongly guarded by ogres, Hanumān further contracts his body and enters it at moonrise.”

संकोचयन् + चन्द्रोदयसमये = संकोचयंश्चन्द्रोदयसमये 8-3-7, 8-3-4, 8-3-15, 8-3-34, 8-4-40

दुस् + प्रविश् + खल् (अ 1-3-8, 1-3-3) 3-3-126 = दुस् + प्रवेश् + अ 7-3-86 = दु: + प्रवेश् + अ 8-2-66, 8-3-15 = दुष् + प्रवेश् + अ 8-3-41

दुष्प्रवेशत्वम् use 5-1-119 for त्व-प्रत्ययः

विवेश 3-4-78, 3-4-82, 6-1-8, 7-4-60, 7-3-86

verse 1:
पालितां राक्षसेन्द्रेण निर्मितां विश्वकर्मणा ।
प्लवमानामिवाकाशे ददर्श हनुमान् कपिः ।। ५-२-२० ।।

“(Nay) the monkey, Hanumān, beheld the city constructed by Viśwakarmā (the architect of gods) and protected by Rāvaṇa (the king of the ogres) as though it was sailing in the air.”

ददर्श 3-4-78, 3-4-82, 6-1-8, 7-4-60, 7-4-66, 1-1-51, 7-4-60, 7-3-86, 1-1-51

पा (रक्षणे) + णिच् 3-1-26 = पालि 7-3-37 वा., 3-1-32

पाल् + णिच् 3-1-25 = पालि 3-1-32

पालि त 3-2-102 = पालि इत 7-2-35 = पाल् इत 6-4-52

मित 7-4-40

प्लु + शानच् 3-2-123, 3-2-124 = प्लु + शप् + शानच् 3-1-68 = प्लव् अ आन 7-3-84, 6-1-78 then use 7-2-82

Saturday, May 28, 2011
verse 2:
तदहं स्वेन रूपेण रजन्यां ह्रस्वतां गतः ।
लङ्कामभिपतिष्यामि राघवस्यार्थसिद्धये ।। ५-२-४६ ।।

“Therefore, reduced to a small size, I shall penetrate into Laṇkā by night in my own form for carrying through the purpose of my master.”

व्यथ् + णिच् (3-1-26) = व्याथ् इ 7-2-116 = व्यथि 6-4-92, 3-1-32

तत् – निपात: – चादिगण: (आकृति-गण:) – 1-1-37 अव्ययम्

गम् + क्त 3-2-102, 1-1-26 = गत 6-4-37, 3-4-72 active voice

ह्रस्व + ङस् + तल् 5-1-119 = ह्रस्व + तल् 1-2-46, 2-4-71 = ह्रस्वता 1-3-3, 4-1-4, 6-1-101

पत् + लृँट् 3-3-13 = पत् + इ स्य + मि 3-4-78, 3-1-33, 7-2-35 = पतिष्यामि 7-3-101, 8-3-59

verses 3 & 4:
प्रदोषकाले हनुमांस्तूर्णमुत्पत्य वीर्यवान् ।
प्रविवेश पुरीं रम्यां सुविभक्तमहापथाम् ।। ५-२-५० ।।

प्रासादमालाविततां स्तम्भैः काञ्चनसंनिभैः ।
शातकुम्भनिभैर्जालैर्गन्धर्वनगरोपमाम् ।। ५-२-५१ ।।

“Springing up quickly at eventide, the powerful Hanumān proceeded to penetrate deep into the lovely city, whose highways had been symmetrically aligned, which was filled with rows of mansions, and with its golden pillars and golden lattice windows looked like the city of Gandharvas.”

विश् + लिँट् 3-4-115 = विश् + णल् (अ 1-3-7, 1-3-3) 3-4-78, 3-4-82 = वि वेश् अ 6-1-8, 7-4-60, 7-3-86

रम्य 3-1-98

सुविभक्तमहापथा 6-3-46, 5-4-74, 1-4-18, 7-1-88, 4-1-4, 6-1-101

नि भा क (अ 1-3-8) 3-1-136, 3-4-67 = नि भ् अ 6-4-64

Saturday, June 11, 2011

तृतीयः सर्गः

Summary: निशि लङ्कां प्रविशन्तं हनुमन्तं लङ्काभिमानिनी महाराक्षसी प्रत्यक्षीभूय पाणितलेनाभिहत्य प्रत्यषेधत्। अथो हनुमता नारीति वाममुष्टिना मन्दं ताडिताऽपि विह्वला कपिना त्वयि पराजितायां लङ्काविनाशसमयः संप्राप्त इति विद्धीति ब्रह्मणो वचो निवेदयन्ती पुरःप्रवेशमन्वजानात्।

“Appearing in person before Hanumān, while he was making his way into Laṇkā at night, the mighty ogress presiding over the city stops him, striking him with the palm of her hand. Getting unnerved, even though gently smitten with his left fist by Hanumān – thinking “she is a woman”, she permits the monkey to enter, repeating the words of Brahmā (the creator) that the destruction of Laṇkā should be concluded as imminent when she is overpowered by a monkey.”

निशा + ङि 4-1-2 = निश् + इ 6-1-63, 1-3-8
विश् + श (अ 1-3-8) + शतृँ 3-2-124, 3-1-77 = विशत् 1-2-4, 1-1-5, 6-1-97

लङ्काभिमान + इनिँ (इन् 1-3-2) 5-2-115 = लङ्काभिमान् + इन् 1-4-18, 6-4-148, 1-1-52 then use 4-1-5

महाराक्षसी 6-3-46, 1-1-52, 6-1-101

प्रत्यक्ष सुँ च्विँ 5-4-50 = प्रत्यक्ष 1-3-7, 1-3-2, 6-1-67, 1-2-46, 2-4-71 = प्रत्यक्षी 7-4-32, 1-1-52 then
प्रत्यक्षीभूय 1-4-61, 2-2-18, 3-4-21, 7-1-37

अभिहन् य 3-4-21, 7-1-37 = अभिह य 6-4-38 = अभिहत् य 6-1-71 – गीता 1-36

प्रति + असेध् अ त् 6-1-64, 3-2-111, 3-4-78, 3-4-100, 3-1-68, 7-3-86, 6-4-71 then use 8-3-63
मन्दम् used adverbially 2-4-18 वा.

तडँ आघाते १०. ६४ |
तड् + णिच् (इ 1-3-7, 1-3-3) 3-1-25 = ताडि 3-1-32, 7-2-116
ताडि + क्त 3-2-102, 1-1-26, 3-4-70 = ताडि + इत 1-3-8, 7-2-35 then use 6-4-52 then 4-1-4, 6-1-101

त्वयि पराजितायाम् – सप्तमी by 2-3-37 (सत्सप्तमी)

सम्प्राप्त – कर्तरि क्त: 3-4-72

विद् + सिप् 3-4-78, 3-1-68, 2-4-72 = विद्धि 3-4-87, 6-4-101

नि वेदि 3-1-26, 7-3-86
वेदि + शप् + शतृँ 3-2-124, 3-1-68 = वेदय अत् 7-3-84, 6-1-78 = वेदय अत् ङीप् 4-1-6 then use 7-1-81

अनु अजानात् 3-2-111, 3-4-100, 3-1-81, 7-3-79, 6-4-71

Saturday, June 25, 2011

verse 1:
ततः कृत्वा महानादं सा वै लङ्का भयंकरम्।
तलेन वानरश्रेष्ठं ताडयामास वेगिता ।। ५-३-३८ ।।

“Raising a loud and frightful cry, Laṇkā then actually struck with impetuosity that jewel among the monkeys with the palm of her hand.”

कृत्वा 3-4-21

महांश्चासौ नादश्च = महानाद:
महत् सुँ नाद सुँ 2-1-57, 1-2-43, 2-2-30
= महत् नाद 1-2-46, 2-4-71
= महआ नाद 6-3-46
= महानाद 6-1-101

भयं करोति इति भयंकर:
भय अम् कृ खच् 2-2-19, 3-1-92, 3-2-43 (default would have been 3-2-1)
= भय कृ अ 1-2-46, 2-4-71, 1-3-8, 1-3-3
= भय कर् अ 7-3-84, 1-1-51
= भयमुँम् कर 6-3-67, 1-1-47
= भयम् कर 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9
Then use 8-3-23, 8-4-59 to get भयंकर:, भयङ्कर:।

वानराणां श्रेष्ठ: = वानरश्रेष्ठ: 2-2-8, 1-2-43, 2-2-30

तडँ आघाते १०. ६४
तड् + णिच् 3-1-25
= ताडि 7-2-116, धातु-सञ्ज्ञा by 3-1-32
ताडि + लिँट् 3-2-115
= ताडि + आम् + लिँट् 3-1-35
= ताडय् + आम् + लिँट् 6-4-55 (otherwise 6-4-51 would have applied)
= ताडयाम् 2-4-81
= ताडयाम् सुँ 3-1-93, 1-1-62, 1-2-46, 4-1-2
= ताडयाम् 2-4-81
= ताडयाम् अस् लिँट् 3-1-40
= ताडयाम् अस् णल् 1-3-2, 1-3-3, 3-4-78, 3-4-82
= ताडयाम् अस् अ 1-3-7, 1-3-3
= ताडयाम् अस् अस् अ 1-1-59, 6-1-8
= ताडयाम् अ अस् अ 7-4-60
= ताडयाम् आ अस् अ 7-4-70
= ताडयाम् आ आस् अ 7-2-116
= ताडयामास 6-1-101

वेगिता = सञ्जातवेगा
वेग + सुँ + इतच् 5-2-36
= वेग + इत 1-3-3, 1-2-46, 2-4-71
= वेगित 1-4-18, 6-4-148
वेगित + टाप् 4-1-4 = वेगिता 1-3-7, 1-3-3, 6-1-101

verse 2:
स्त्री चेति मन्यमानेन नातिक्रोधः स्वयं कृतः।
सा तु तेन प्रहारेण विह्वलाङ्गी निशाचरी।
पपात सहसा भूमौ विकृताननदर्शना ।। ५-३-४१ ।।

“No violent anger, however, was exhibited by him of his own accord, inasmuch as he looked upon her as a woman. Her limbs having been overpowered by that blow, that ogress fell precipitately to the ground, displaying her ugly features.”

मनँ ज्ञाने ४. ७३
मन् + लँट् 3-2-123
= मन् + शानच् 3-2-124, 1-4-100
= मन् + श्यन् + शानच् 3-1-69
= मन् य + आन 1-3-8, 1-3-3
= मन् यमुँक् + आन 7-2-82, 1-1-46
= मन् यम् + आन 1-3-2, 1-3-3

विह्वलानि अङ्गानि यस्या: सा = विह्वलाङ्गी
विह्वल जस् अङ्ग जस् 2-2-24, 2-2-35
= विह्वल अङ्ग 1-2-46, 2-4-71
= विह्वलाङ्ग 6-1-101
विह्वलाङ्ग + ङीष् 4-1-54 वार्त्तिकम् – “अङ्गगात्रकण्ठेभ्य इति वक्तव्यम्।”
= विह्वलाङ्ग + ई 1-3-8, 1-3-3
= विह्वलाङ्गी 1-4-18, 6-4-148

निशायां चरति इति निशाचरी
निशा ङि चर् ट 2-2-19, 3-1-92, 3-2-16
= निशा चर् अ 1-3-7, 1-2-46, 2-4-71
निशाचर + ङीप् 4-1-15
= निशाचर + ई 1-3-8, 1-3-3
= निशाचर् + ई 1-4-18, 6-4-148

पतॢँ गतौ १. ९७९
पत् + लिँट् 3-2-115
= पत् + णल् 1-3-2, 1-3-3, 3-4-78, 3-4-82
= पत् + अ 1-3-7, 1-3-3
= पत् पत् अ 1-1-59, 6-1-8
= प पत् अ 7-4-60
= प पात् अ 7-2-116

विकृताननम् – कर्मधारय-समास:
विकृत सुँ आनन सुँ 2-1-57, 1-2-43, 2-2-30
= विकृतानन 1-2-46, 2-4-71, 6-1-101
विकृताननं दर्शयति = विकृताननदर्शना
दृश् + णिच् 3-1-26 = दर्शि 1-3-7, 1-3-3, 7-3-86, 1-1-51, 3-1-32
विकृतानन ङस् दर्शि ल्यु 3-1-134, 2-3-65
= विकृतानन दर्शि अन 1-2-46, 2-4-71, 1-3-8, 7-1-1
= विकृतानन दर्श् अन 6-4-51
विकृताननदर्शन + टाप् 4-1-4
= विकृताननदर्शन + आ 1-3-7, 1-3-3 = विकृताननदर्शना 6-1-101

verse 3:
यदा त्वां वानरः कश्चिद् विक्रमाद् वशमानयेत् ।
तदा त्वया हि विज्ञेयं रक्षसां भयमागतम् ।। ५-३-४७ ।।

“Surely at the time when some monkey subdues you by dint of his prowess, destruction of the ogres should be concluded by you to be imminent.”

ज्ञा + यत् 3-1-97 = ज्ञा य 1-3-3 = ज्ञी य 6-4-65 = ज्ञेय 7-3-84

गम् + क्त 3-2-102, 1-1-26, 3-4-72
= ग + त 1-3-8, 7-2-10, 6-4-37

Saturday, July 09, 2011

चतुर्थः सर्गः

Summary: लङ्कायां प्रविशन्हनुमान्नगरान्तर्वाद्यमाननानावादित्रादि शृण्वन्‌ननेकविधायुधधारिमूलबलं विलोकयंश्चान्तःपुरमाविवेश।
“Entering Laṇkā and hearing the music of various instruments being played upon inside, and also observing the enemy’s forces armed with various weapons, Hanumān finds his way into the royal gynaeceum.”

विशँ प्रवेशने ६. १६०

विश् + लँट् 3-2-123 = विश् + शतृँ 3-2-124
= विश् + श + शतृँ 3-1-77 = विश् अ अत् 1-3-2, 1-3-8 (7-3-86 is stopped by 1-1-5 because the श-प्रत्यय: is ङिद्वत् by 1-2-4)
= विशत् 6-1-97

प्रविशत् + सुँ 4-1-2 = प्रविश नुँम् त् + सुँ 7-1-70, 1-1-47
= प्रविशन्त् स् 1-3-2, 1-3-3 = प्रविशन्त् 6-1-68
= प्रविशन् 8-2-23 (after this 8-2-7 cannot apply because of 8-2-1.)

Similarly,

श्रु श्रवणे १. १०९२

श्रु + लँट् 3-2-123 = श्रु + शतृँ 3-2-124
= शृ + श्नु + शतृँ 3-1-74 = शृ नु अत् 1-3-2, 1-3-8 (1-1-5 prevents 7-3-84 from acting on the ऋकार: of “शृ” because the श्नु-प्रत्यय: is ङिद्वत् by 1-2-4. Similarly, 1-1-5 prevents 7-3-84 from acting on the उकार: of “श्नु” because the शतृँ-प्रत्यय: is ङिद्वत् by 1-2-4.)
= शृन्वत् 6-4-87
= शृण्वत् by वार्त्तिकम् (under 8-4-1) – ऋवर्णान्नस्य णत्वं वाच्यम्।

शृण्वन् is पुंलिङ्गे प्रथमा-एकवचनम् – steps are similar to those for प्रविशन् shown above.

Similarly,

लोकृँ – [भाषार्थः]१०. ३०७

लोक् + णिच् 3-1-25 = लोक् + इ 1-3-7, 1-3-3 = लोकि 3-1-32
लोकि + लँट् 3-2-123 = लोकि + शतृँ 3-2-124
= लोकि + शप् + शतृँ 3-1-68 = लोकि अ अत् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-8
= लोके अ अत् 7-3-84 = लोकय् अ अत् 6-1-78
= लोकयत् 6-1-97

विलोकयन् is पुंलिङ्गे प्रथमा-एकवचनम् – steps are similar to those for प्रविशन् shown above.
ref. गीता 6-13

नगरे अन्तर् = नगरान्तर् 2-1-40, 1-2-43, 2-2-30 (meaning is नगरमध्ये)

वदँ व्यक्तायां वाचि १. ११६४

वद् + णिच् 3-1-26 = वादि 1-3-7, 1-3-3, 7-2-116, 3-1-32

वादि + लँट् (कर्मणि) 3-2-123, 3-4-69 = वादि + शानच् 3-2-124, 1-3-13, 1-4-100
= वादि + यक् + शानच् 3-1-67
= वाद् + य + आन 6-4-51, 1-3-3, 1-3-8
= वाद्यम् आन 7-2-82, 1-1-46, 1-3-2, 1-3-3

नाना is an अव्ययम् by 1-1-37. Used in गीता 1-9

वाद्यते तद् वादित्रम्
वादि + णित्रन् (उणादि-सूत्रम् 4-172 भूवादिगॄभ्यो णित्रन्)
= वादि इत्र 1-3-7, 1-3-3
= वाद् इत्र 6-4-51 = वादित्र

डुधाञ् धारणपोषणयोः
वि धा + अङ् 3-3-106 = वि ध् अ 1-3-3, 6-4-64
= विध + टाप् 4-1-4 = विध आ 1-3-7, 1-3-3 = विधा 6-1-101

अनेक 2-2-6, 6-3-73, 6-3-74

युधँ सम्प्रहारे ४. ६९
आ युध्यन्ते अनेन इति आयुधम्। अमरकोश: २-८-८२॥
घञर्थे कविधानं स्थास्नापाव्यधिहनियुध्यर्थम्। वार्त्तिकम् under 3-3-58.
(Similarly विहन्यन्ते अस्मिन् इति वघ्न:)

अनेका: विधा: येषाम् तानि अनेकविधानि आयुधानि
अनेका जस् विधा जस् 2-2-24
= अनेका विधा 1-2-46, 2-4-71
= अनेक विधा 6-3-34
= अनेकविध 1-2-48

धृञ् धारणे १. १०४७
आयुध शस् धृ + णिनिँ 2-2-19, 3-2-78
= आयुध धृ इन् 1-2-46, 2-4-71, 1-3-7, 1-3-2
= आयुध धार् इन् 7-2-115, 1-1-51

विशँ प्रवेशने ६. १६०

विश् + लिँट् 3-2-115 = विश् + ल् 1-3-2, 1-3-3
= विश् तिप् 3-4-78 = विश् + णल् 3-4-82
= विश् + अ 1-3-7, 1-3-3 (3-1-68 cannot apply because of 3-4-115)
= विश् विश् अ 1-1-59, 6-1-8 = वि विश् अ 7-4-60
= विवेश 7-3-86

मूलँ प्रतिष्ठायाम् १. ६०७
मूलति इति मूलम्
मूल् क 3-1-135 = मूल् अ 1-3-8

मूलम् च तत् बलम् च = मूलबलम् 2-1-57

अन्तःपुरम् [अन्तः अभ्यन्तरं पुरं गृहम्, or पुरस्यान्तःस्थितम्] – inner apartment of a palace

verse 1:
स हेमजाम्बूनदचक्रवालं महार्हमुक्तामणिभूषितान्तम् ।
परार्ध्यकालागुरुचन्दनार्हं स रावणान्तःपुरमाविवेश ।। ५-४-३० ।।

“The celebrated Hanumān (finally) entered the gynaeceum of Rāvaṇa, which was encircled with walls of refined gold and pure gold (so-called because it was found in the olden days in the bed of the Jāmbū river, now known by the name of Jammu); whose inside was embellished with pearls and gems of great value and which was (daily) sprinkled with water containing superb Agallocum and Sandalwood.”

हेमसहितेन जाम्बूनदेन निर्मितम् चक्रवालम् (प्राकारमण्डलम्) यस्य तत् (अन्त:पुरम्) = हेमजाम्बूनदचक्रवालम्

जम्बूनद्याम् भवम् = जाम्बूनदम्
जम्बूनदी + ङि + अण् 4-1-83, 4-3-53
= जम्बूनदी + अ 1-2-46, 2-4-71, 1-3-3
= जाम्बूनदी + अ 7-2-117
= जाम्बूनद् + अ 1-4-18, 6-4-148
= जाम्बूनद

हेम(सहित)जाम्बूनदम् – वार्तिकम् on 2-1-60 समानाधिकरणाधिकारे शाकपार्थिवादीनाम् उपसङ्ख्यानम् उत्तरपदलोपश्च।

हेमजाम्बूनदेन निर्मितम् चक्रवालम् (प्राकारमण्डलम्) यस्य तत् 2-2-24

चक्रवालं तु मण्डलम्॥ अमरकोश: १-३-६॥
चक्राकारेण वलते। वलँ-[संवरणे सञ्चलने च] १. ५६४। अच् (३-१-१३४)। अन्येषामपि दृश्यते (६-३-१३७) इति दीर्घ:। यद्वा भावे घञि वाल:। चक्रमिव वालो यस्य। अथवा चक्राकारेण वाडते। वाडृँ [आप्लाव्ये] इत्येके १. ३२१, अच् (३-१-१३४), चक्रवाडम्। डलयोरेकत्वस्मरणाच्चक्रवालम्।

महान् अर्ह: (मूल्यम्) येषाम् ते महार्हा: मुक्तामणय:।
तै: भूषित: अन्त: शिरोभाग: यस्य तत् (अन्त:पुरम्)।

परस्मिन्नर्धे भव: परार्ध्य:। अमरकोश: ३-१-५८॥
परार्ध + ङि + यत् 4-3-5, 4-3-53
= परार्ध + य 1-2-46, 2-4-71, 1-3-3
= परार्ध् + य 1-4-18, 6-4-148

परार्ध्याभ्याम् (उत्तमाभ्याम्) कालागुरुचन्दनाभ्याम् अर्ह: (अर्हणम् = पूजा) यस्य तत् (अन्त:पुरम्)।

कालागुरु n. a kind of sandal tree, black kind of aloe

पञ्चमः सर्गः

Summary: गगनाङ्गणमारोहति भगवति शीतभानौ नानाविधान्निट्चरान्निशाचरीश्च विलोकयन्नपि सीतामपश्यन्हनुमांश्चिन्तां प्रपेदे ।

“Even though seeing ogres and ogresses of various grades and orders while the moon was ascending the heavens, Hanumān gives way to anxiety on his not being able to find Sītā.”

पदँ गतौ ४. ६५
पद् + लिँट् 3-2-115 = पद् ल् 1-3-2, 1-3-3
= पद् + त 3-4-78 = पद् + ए 3-4-81, 1-1-55
= पद् पद् ए 6-1-8 = पेदे 6-4-120

निशायां चरति इति निशाचरी
निशा ङि चर् ट 2-2-19, 3-1-92, 3-2-16
= निशा चर् अ 1-3-7, 1-2-46, 2-4-71
निशाचर + ङीप् 4-1-15
= निशाचर + ई 1-3-8, 1-3-3
= निशाचर् + ई 1-4-18, 6-4-148

Similarly निशि चरति इति निट्चर:

शीता: भानव: (किरणा:) यस्य स: (चन्द्रमा:) 2-2-24

रुहँ बीजजन्मनि प्रादुर्भावे च १. ९९५
आरोहति is not a तिङन्तम् पदम् but a सुबन्तम् पदम् (सप्तमी-एकवचनम् of the शतृँ-प्रत्ययान्त-प्रातिपदिकम् “आरोहत्”)। सत्सप्तमी is prescribed by 2-3-37 यस्य च भावेन भावलक्षणम्‌ ।

Saturday, July 23, 2011

verse 1:
ततः प्रियान् प्राप्य मनोऽभिरामान् सुप्रीतियुक्ताः सुमनोऽभिरामाः।
गृहेषु हृष्टाः परमाभिरामा हरिप्रवीरः स ददर्श रामाः ।। ५-५-२१ ।।

“The said Hanumān (the foremost hero among the monkeys) then saw the most charming young women happy in their homes and filled with great delight to meet their beloved ones – who were highly pleasing to their mind – and lovely with flowers (on their person).”

सुप्रीतियुक्ताः, सुमनोऽभिरामाः, हृष्टाः, परमाभिरामाः and रामाः are all द्वितीया-विभक्ति-बहुवचनान्ताः (like रमाम् रमे रमाः)

आपॢँ व्याप्तौ ५. १६
आप् + क्त्वा 1-3-2, 3-4-21
प्र आप् ल्यप् 7-1-37
प्र आप् य 1-3-8, 1-3-3
प्राप्य 6-1-101

प्रगत: वीरः = प्रवीरः 2-2-18 कुगतिप्रादयः। प्रादयो गताद्यर्थे प्रथमया। (Example – प्रगत: आचार्यः = प्राचार्यः।)
हरीणां प्रवीरः = हरिप्रवीरः 2-2-8

सुप्रीति: = अत्यन्तप्रीति: 2-1-57
सुप्रीत्या युक्ता = सुप्रीतियुक्ता 2-1-32

अभिरमते मनोऽत्र = अभिराम: (adjective)
अभि रम् + घञ् (आधारे) 3-3-19 = अभिराम 1-3-8, 1-3-3, 7-2-116

मनस: अभिरामान् (प्रियान्) = मनोऽभिरामन् 2-2-8

सुमनोभि: (पुष्पै:) अभिरामा = सुमनोऽभिरामा: 2-1-32

परमया (शोभया) अभिरामा: = परमाभिरामा: 2-1-32
अथवा –
परमा: च ता: अभिरामा: = परमाभिरामा: (अतिसुन्दरा:) 2-1-57

दृशिर् प्रेक्षणे १. ११४३
दृश् + लिँट् 3-2-115
दृश् ल् 1-3-2, 1-3-3
दृश् णल् 3-4-78, 3-4-82 (3-4-115 stops 3-1-68)
दृश् अ 1-3-7, 1-3-3
दृश् दृश् अ 6-1-8
दर् श् दृश् अ 7-4-66, 1-1-51
द दृश् अ 7-4-60
ददर्श 7-3-86, 1-1-51

हृषँ तुष्टौ ४. १४२
हृष्ट 7-2-29

रमते इति रामा
रमुँ क्रीडायाम् | रमँ इति माधवः १. ९८९
रम् + ण 3-1-140 = रम् + अ 1-3-7
= राम् अ 7-2-116 = राम + टाप् 4-1-4
= राम + आ 1-3-7, 1-3-3 = रामा 6-1-101

verse 2:
सीतामपश्यन्मनुजेश्वरस्य रामस्य पत्नीं वदतां वरस्य ।
बभूव दुःखोपहतश्चिरस्य प्लवङ्गमो मन्द इवाचिरस्य ।। ५-५-२७ ।।

“The monkey (Hanumān) at once turned languid (as it were), afflicted as he was with sorrow, on not finding, even after (striving for) a long time, Sītā, the consort of Śrī Rāma – a ruler of men, the best of speakers.”

चिरस्य = चिरमित्यर्थेऽव्ययम् stated in तिलक-टीका

मनोः जाताः मनुजाः
मनु + ङसिँ + जन् + ड 2-2-19, 3-2-98
= मनु + जन् + अ 1-2-46, 2-4-71, 1-3-7
= मनु + ज् + अ 6-4-143 (डिति अभस्य अपि अनुबन्धकरणसामर्थ्यात् टिलोपो भवति।)

मनुजानाम् ईश्वरः मनुजेश्वरः 2-2-8, तस्य मनुजेश्वरस्य

दःखेन उपहतः दुःखोपहतः 2-1-32

भू सत्तायाम् १.१
भू + लिँट् 3-2-115
भू ल् 1-3-2, 1-3-3
भू णल् 3-4-78, 3-4-82. (3-4-115 stops 3-1-68)
भू अ 1-3-7, 1-3-3
भूव् अ 6-4-88, 1-1-46
भूव् भूव् अ 6-1-8
भू भूव् अ 7-1-60
भु भूव् अ 7-4-59
भ भूव् अ 7-4-73
बभूव 8-4-54

प्लुङ् गतौ १. १११२
प्लव: = प्लवनम् (भावे)
प्लु + अप् 3-3-57 (अपवाद: for “घञ्”)
प्लो + अ 1-3-3, 7-3-84
= प्लव 6-1-78
प्लवेन गच्छति इति प्लवङ्गम:।
प्लव + टा + गम् + खच् 2-2-19, 3-2-47
= प्लव + गम् + अ 1-2-46, 2-4-71, 1-3-8, 1-3-3
= प्लवमुँम् + गम् + अ 6-3-67, 1-1-47
= प्लवम् + गम् + अ 1-3-2, 1-3-3

प्लवम्गम + सुँ 4-1-2 = प्लवम्गम: 1-3-2, 8-2-66, 8-3-15
= प्लवंगम: 8-3-24 = प्लवङ्गम: 8-4-58

षष्ठः सर्गः

Summary: हनुमान्पुनर्लङ्कालङ्करणभूतं रावणनिवासमेत्य तदन्तिकस्थप्रहस्तादिभवनेषु वैदेहीमन्विष्य रावणगृहं प्राविशत् ।

“Reaching the palace of Rāvaṇa, which served as an adornment to Laṅkā, and having looked for Sītā in the adjoining mansions of Prahasta and others, Hanumān now enters the palace of Rāvaṇa.”

लङ्कायाः अलङ्करणम् = लङकालङ्करणम् 2-2-8

उत्तरपदस्थ-भूत-शब्द: स्वरूपार्थोऽपि
लङकालङ्करणम् स्वरूपम् यस्य स: (रावणनिवास:)

रावणस्य निवासम् = रावणनिवासम्

अन्तिके तिष्ठति इति अन्तिकस्थम्
अन्तिक ङि स्था क 2-2-19, 3-2-4
= अन्तिक स्था अ 1-2-46, 2-4-71, 1-3-8
= अन्तिक स्थ् अ 6-4-64

इण् गतौ २. ४०
इ + क्त्वा 3-4-21
आ इ ल्यप् 7-1-37
आ इ य 1-3-8, 1-3-3
ए य 6-1-87
एत्य 6-1-86, 6-1-71, 1-1-46

इषुँ इच्छायाम् ६. ७८
इष् + क्त्वा 1-3-2, 3-4-21
अनु इष् ल्यप् 7-1-37
अनु इष् य 1-3-8, 1-3-3
अन्विष्य 6-1-77

विशँ प्रवेशने ६. १६०
प्र विश् + लङ् 3-2-111
प्र विश् ल् 1-3-2, 1-3-3
प्र विश् ति 3-4-78
प्र विश् त् 3-4-100
प्र विश् श त् 3-1-77 (1-2-4, 1-1-5 stop 7-3-86)
प्र विश् अ त् 1-3-8
प्र अविशत् 6-4-71
प्राविशत् 6-1-101

Saturday, August 13, 2011

verse 1:
गृहाद् गृहं राक्षसानामुद्यानानि च सर्वशः।
वीक्षमाणोऽप्यसंत्रस्तः प्रासादांश्च चचार सः ।। ५-६-१६ ।।

“Moving from house to house belonging to the ogres and even observing all the gardens as well as the palaces, he ranged undaunted everywhere.”

१.६९४ ईक्षँ दर्शने
वि ईक्ष् + लँट् 1-3-2, 1-3-9, 3-2-123
वि ईक्ष् + शानच् 3-2-124, 1-4-100
वि ईक्ष् + शप् + शानच् 3-1-68
वि ईक्ष् + अ + आन 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
वि ईक्ष मुँक् + आन 7-2-82, 1-1-46
वि ईक्षम् + आन 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9
वि ईक् ष् अ म् आ न
वि ईक्षमाण 8-4-2
वीक्षमाण 6-1-101

४.११ त्रसीँ उद्वेगे
सम् त्रसीँ + क्त 3-2-102, 1-1-26, 7-2-14
सम् त्रस् + त 1-3-8, 1-3-2, 1-3-9
संत्रस्त/सन्त्रस्त 8-3-23, 8-4-59

१.६४० चरँ गत्यर्थ: | चरतिर्भक्षणार्थोऽपि
चर् + लिँट् 3-2-115, 1-3-2
चर् + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9, 3-4-78
चर् + णल् 3-4-82
चर् + अ 1-3-7, 1-3-3, 1-3-9
चर् चर् + अ 6-1-8, 1-1-59
च चर् + अ 7-4-60
च चार् + अ 7-2-116
चचार

प्रासादान् + च
प्रासादारुँ + च 8-3-7
प्रासादांर् + च 8-3-4, 1-3-2, 1-3-9
प्रासादां: + च 8-3-15
प्रासादांस् + च 8-3-34
प्रासादांश्च 8-4-40

सर्वश: 5-4-42

verse 2:
सर्वेषां समतिक्रम्य भवनानि समन्ततः ।
आससादाथ लक्ष्मीवान् राक्षसेन्द्रनिवेशनम् ।। ५-६-२८ ।।

“Passing clearly beyond the residences of all (the aforesaid principal ogres) on every side, Hanumān (endowed with riches in the form of virility) once more reached the palace of Rāvaṇa (the ruler of ogres).”

बहुलमन्यत्रापि। उणादि-सूत्रम् 2-79.
अन्यधातुभ्योऽपि बहुलं युच् प्रत्ययो भवति।

भवन्त्यत्र इति भवनम्। अधिकरणे युच्।
भू + युच् = भू + अन 1-3-3, 7-1-1
= भो + अन 7-3-84
= भव् अन 6-1-78 = भवन

Similarly निविशन्त्यत्र इति निवेशनम्।

राक्षसेन्द्रनिवेशनम्।
राक्षसानाम् इन्द्रः राक्षसेन्द्रः, राक्षसेन्द्रस्य निवेशनम् राक्षसेन्द्रनिवेशनम्।

६.१६३ षदॢँ विशरणगत्यवसादनेषु
आ सद् 6-1-64, 1-3-2, 1-3-9
आ सद् + लिँट् 3-2-115
आ सद् + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9, 3-4-78
आ सद् + णल् 3-4-82
आ सद् + अ 1-3-7, 1-3-3, 1-3-9
आ सद् सद् + अ 6-1-8, 1-1-59
आ स सद् + अ 7-4-60
आ स साद् + अ 7-2-116
आससाद।

लक्ष्मीः अस्य अस्ति इति लक्ष्मीवान्।
लक्ष्मी + सुँ + मतुँप् 5-2-94
लक्ष्मी + मतुँप् 1-2-46, 2-4-71
लक्ष्मी + मत् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9
लक्ष्मी + वत् 8-2-9

समन्तत: = समन्तात्।
तसिप्रकरण आद्यादिभ्य उपसङ्ख्यानम्। 5-4-44 वार्त्तिकम्।

सप्तमः सर्गः

Summary: प्रसङ्गाद्रावणभवनं तत्रस्थं पुष्पकविमानं च कविर्वर्णयति ।

“The poet incidentally draws a pen-picture of Rāvaṇa’s palace and his aerial car known by the name of Puṣpaka.”

तत्र तिष्ठति इति तत्रस्थम्।
तत्र + स्था + क 2-2-19, 3-2-4
= तत्र + स्था + अ 1-3-8
= तत्र + स्थ् + अ 6-4-64

पुष्पकविमानम् 2-1-57

१०.४८४ वर्ण वर्णक्रियाविस्तारगुणवचनेषु (अदन्त:)
वर्ण + णिच् 3-1-25
वर् ण् + इ 1-3-7, 1-3-3, 1-3-9, 6-4-48
वर्णि 3-1-32
वर्णि + लँट् 3-2-123
वर्णि + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9, 3-4-78
वर्णि + शप् + तिप् 3-1-68
वर्णि + अ + ति 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
वर्णे + अ + ति 7-3-84
वर्णय् + अ + ति 6-1-77 = वर्णयति

Saturday, August 27, 2011

verse 1:
यथा नगाग्रं बहुधातुचित्रं यथा नभश्च ग्रहचन्द्रचित्रम् |
ददर्श युक्तीकृतचारुमेघचित्रं विमानं बहुरत्नचित्रम् ।। ५-७-८ ।।

“Hanumān (also) beheld (in that palace) an aerial car decked with numerous precious stones and charming like a beautiful cloud endowed with many hues (by the rays of the sun), which resembled a mountain-peak, looking picturesque with numerous minerals, and the firmament illumined by planets including the moon.”

न गच्छति इति नग:।
गमॢ- [गतौ] १. ११३७
न गम् + ड 2-2-19, 3-2-48 वार्त्तिकम् (अन्येष्वपि दृश्यते) or 3-2-101 वार्त्तिकम् (अन्येभ्योऽपि दृश्यते)
= न गम् + अ 1-3-7
= न ग् अ 6-4-143 (डिति अभस्य अपि अनुबन्धकरणसामर्थ्यात् टिलोपो भवति।)
= नग

नगस्य अग्रम् नगाग्रम् (2-2-8) = शैलाग्रम्।
बहवः धातवः बहुधातवः (2-1-57)
बहुधातुभिः चित्रं बहुधातुचित्रम् (2-1-32)

ग्रहै: युक्त: चन्द्र: ग्रहचन्द्र: (2-1-60 वार्त्तिकम् – समानाधिकरणाधिकारे शाकपार्थिवादीनाम् उपसङ्ख्यानम् उत्तरपदलोपश्च)
ग्रहचन्द्रेण चित्रं ग्रहचन्द्रचित्रम् (2-1-32)

बहूनि रत्नानि बहुरत्नानि (2-1-57)
बहुरत्नैः चित्रं बहुरत्नचित्रम् (2-1-32)

दृशिर् प्रेक्षणे १. ११४३
दृश् + लिँट् 3-2-115
दृश् ल् 1-3-2, 1-3-3
दृश् णल् 3-4-78, 3-4-82 (3-4-115 stops 3-1-68)
दृश् अ 1-3-7, 1-3-3
दृश् दृश् अ 6-1-8
दर् श् दृश् अ 7-4-66, 1-1-51
द दृश् अ 7-4-60
ददर्श 7-3-86, 1-1-51

नानावर्णैरयुक्तोऽपि तद्युक्त: कृत: = युक्तीकृत:।
युक्त + च्विँ (सर्वापहार-लोप: 1-3-7, 1-3-2, 6-1-67) 5-4-50 = युक्त = युक्ती 7-4-32, 1-1-52. युक्ती gets the गति-सञ्ज्ञा by 1-4-61.
युक्ती कृ + क्त 3-2-102, 1-1-26, 2-2-18
= युक्तीकृत 1-3-8. 7-2-10 stops 7-2-35. And 1-1-5 stops 7-3-84.

युक्तीकृत: चासौ चारुमेघश्च (2-1-57) तद्वद्विचित्रम् (2-1-55) विमानं पुष्पकाख्यम्।

The above is from तिलक-टीका।

गोविन्दराज: comments as follows:

युक्तीकृतमेघचित्रं पुञ्जीकृतमेघचित्रं चित्रमेघसङ्घातसदृशमित्यर्थ:।

अष्टमः सर्गः

Summary: पुनः पुष्पकविमानं विस्तरतो वर्णयति ।

“A further description of the aerial car Puṣpaka.”

विस्तरत: = विस्तरेण 5-4-44 वार्त्तिकम् – तसिप्रकरण आद्यादिभ्य उपसङ्ख्यानम्। This is referred to as सार्वविभक्तिकस्तसि:।

verse 1:
वसन्तपुष्पोत्करचारुदर्शनं वसन्तमासादपि चारुदर्शनम् ।
स पुष्पकं तत्र विमानमुत्तमं ददर्श तद् वानरवीरसत्तमः ।। ५-८-८ ।।

“That prince among monkey heroes saw in that palace the excellent aerial car, Puṣpaka, which with its bunches of vernal flowers was charming to look at and was lovelier even than the vernal month.”

उत्कीर्यते इति उत्कर:।
कॄ विक्षेपे (निक्षेपे) ६. १४५
उद् कॄ + अप् 3-3-57
= उद् कर् + अ 1-3-3, 7-3-84, 1-1-51
= उत्कर 8-4-55

वसन्तपुष्पोत्करचारुदर्शनम् = वसन्तकालिकपुष्पसमूहेन चारुदर्शनम्।

The above is from तिलक-टीका।

शिरोमणि-टीका comments as follows:

वसन्तपुष्पोत्करेण वसन्तकालिकपुष्पसमूहेन (2-1-60 वार्त्तिकम् – समानाधिकरणाधिकारे शाकपार्थिवादीनाम् उपसङ्ख्यानम् उत्तरपदलोपश्च।, 2-2-8, 2-1-32) चारु दर्शनं यस्य (2-2-24)
अत एव वसन्तमासात् (2-1-57) = वसन्तकालादपि चारु दर्शनं यस्य (2-2-24) तत् विमानसत्तमं पुष्पकं वानरवीरसत्तमो हनूमान् ददर्श।

वानराणां वीरः वानरवीरः 2-2-8, वानरवीराणां सत्तम: (उत्तम:) = वानरवीरसत्तमः (2-2-8)

असँ भुवि २. ६०
अस् + लँट् 3-2-123
= अस् + शतृँ 3-2-124, 1-4-99 = अस् + शप् + शतृँ 3-1-68 = अस् + अत् 2-4-72, 1-3-8, 1-3-2 = सत् 1-2-4, 6-4-111

अतिशयेन सन् = सत्तम:।
सत् सुँ तमप् 5-3-55 अतिशायने तमबिष्ठनौ
= सत् तमप् 1-2-46, 2-4-71
= सत्तम 1-3-3

नवमः सर्गः

Summary: रावणभवने सीतामन्वेषयन्हनुमांस्तत्र स्थितपुष्पकविमानमारुह्यानेकावस्थापन्नप्रसुप्तनारीगणान्विलोकयति।

“Leaping up the Puṣpaka in the course of his quest for Sītā in the palace of Rāvaṇa, Hanumān gazes from that vantage-ground on the hosts of women lying asleep in the women’s apartments in diverse states.”

रावणस्य भवनम् = रावणभवनम् 2-2-8

इषँ (इषुँ) इच्छायाम् ६. ७८
इष् + णिच् 3-1-26
= एषि 1-3-7, 1-3-3, 7-3-86, 3-1-32

अनु + एषि + लँट् 3-2-123
= अनु + एषि + शतृँ 3-2-124, 1-4-99 = अनु + एषि + शप् + शतृँ 3-1-68 = अनु + एषे + अ + अत् 7-3-84, 1-3-8, 1-3-3, 1-3-2
= अनु + एषय् + अ + अत् 6-1-78
= अनु + एषय् + अत् 6-1-97
= अन्वेषयत् 6-1-77

पुष्पकविमानम् 2-1-57
स्थितं च तत् पुष्पकविमानं च स्थितपुष्पकविमानम् 2-1-57

रुह् + क्तवा 3-4-21
आ रुह् + ल्यप् 7-1-37
आरुह् + य 1-3-8, 1-3-3 = आरुह्य 1-1-5 stops 7-3-86.

न एका = अनेका 2-2-6, 6-3-73, 6-3-74
अनेकावस्था 2-1-57
अनेकावस्थापन्ना 2-1-24
प्रसुप्तनारी 2-1-57, 6-3-42
अनेकावस्थापन्नप्रसुप्तनारी 2-1-57, 6-3-42
अनेकावस्थापन्नप्रसुप्तनारीगणान् 2-2-8

लोक् + णिच् 3-1-25 = लोक् + इ 1-3-7, 1-3-3 = लोकि 3-1-32
लोकि + लँट् 3-2-123 = लोकि + तिप् 3-4-78
= लोकि + शप् + तिप् 3-1-68 = लोकि अ ति 1-3-3, 1-3-8
= लोके अ ति 7-3-84 = लोकय् अ ति 6-1-78
= लोकयति

verse 1:
न चाकुलीना न च हीनरूपा नादक्षिणा नानुपचारयुक्ता ।
भार्याभवत् तस्य न हीनसत्त्वा न चापि कान्तस्य न कामनीया ।। ५-९-७१ ।।

“Again, no consort of his was low-born, nor devoid of beauty nor clumsy nor unadorned nor feeble nor repulsive to her husband.”

कुल ङस् + ख 4-1-139
= कुल + ख 1-2-46, 2-4-71
= कुल + ईन 7-1-2
= कुल् + ईन 1-4-18, 6-4-148
= कुलीन।

न कुलीना = अकुलीना 2-2-6, 6-3-73

ओँहाक् त्यागे ३. ९
हा + क्त 1-3-2, 1-3-3, 3-2-102, 1-1-26, 3-4-70
= हा + त 1-3-8 (7-2-10 stops 7-2-35.)
= ही त 6-4-66
= हीन 8-2-45

हीनं रूपं यस्या: सा हीनरूपा 2-2-24, 6-3-34

Similarly,
हीनसत्त्वा = हीनबला

कमुँ कान्तौ १. ५११
कम् + णिङ् 3-1-31 = कामि 7-2-116
कामि + अनीयर् 3-1-96 = कामनीय 1-3-3, 6-4-51

कम् + क्त (णिङ्-अभावपक्षे) 3-2-102, 1-1-26 = कम् + त 1-3-8, 7-2-15 (along with 7-2-56) stops 7-2-35
= काम् त 6-4-15
= कान्त 8-3-24, 8-4-58

उपचार: = उत्तमाम्बरभूषणमालादि:।
उपचारै: युक्ता = उपचारयुक्ता 2-1-32
न उपचारयुक्ता = अनुपचारयुक्ता 2-2-6, 6-3-73, 6-3-74

दक्षते वर्धते शीघ्रकारी भवति वा स दक्षिण:।
दक्षँ वृद्धौ शीघ्रार्थे च १. ६९२
दक्ष् + इनन् by उणादि-सूत्रम् 2-51 द्रुदक्षिभ्यामिनन्
= दक्षिन 1-3-3
= दक्षिण 8-4-2

दशमः सर्गः

Summary: हनुमान्पुष्पकविमाने नानालंकरणोपशोभितोपकरणभासुरशयनोत्तमशायिनं बहुविधाभरणविभूषितवपुषं रावणं ददर्श । तदविदूरतः पणवमृदङ्गवेणुवीणाढक्कादिनानातोद्यालिङ्गितवपुषां सुप्त्यनवस्थाङ्गप्रत्यङ्गानां शैलूषीणां मध्येऽद्भुतशयनशायिनीमुज्ज्वलाभरणोपशोभितां मन्दोदरीं दृष्ट्वा सेयं सीतेति मत्वा संजातहर्षः पुच्छचुम्बनादि कापेयमाविश्चकार ।

“Hanumān catches sight of Rāvaṇa reposing on an excellent couch decked with various ornaments, himself adorned with jewels of every description. Perceiving Mandodarī graced with bright jewels and lying asleep on a wonderful couch not far from her husband in the midst of dancing girls lying in a disorderly state with diverse musical instruments clasped to their bosom, and taking her to be Sītā, Hanumān gets enraptured and exhibits his joy through various simian gestures such as kissing the end of his tail.”

पुष्पकविमान 2-1-57

भासृँ दीप्तौ १. ७११
भास् + घुरच् 3-2-161 भञ्जभासमिदो घुरच् ।
= भास् + उर 1-3-8, 1-3-3
= भासुर

नानालंकरण 2-1-57
नानालंकरणोपशोभित 2-1-32
नानालंकरणोपशोभितोपकरण 2-1-57
नानालंकरणोपशोभितोपकरणभासुर 2-1-32
शयनोत्तम 2-2-8
नानालंकरणोपशोभितोपकरणभासुरशयनोत्तम 2-1-57
नानालंकरणोपशोभितोपकरणभासुरशयनोत्तमे शेते तच्छील: = नानालंकरणोपशोभितोपकरणभासुरशयनोत्तमशायी, तम्।
शीङ् स्वप्ने २. २६
शयनोत्तम ङि + शी णिनिँ 2-2-19, 3-2-78
= शयनोत्तम + शी इन् 1-2-46, 2-4-71, 1-3-7, 1-3-2
= शयनोत्तम + शै इन् 7-2-115
= शयनोत्तम + शाय् इन् 6-1-78

बहुविध 2-2-24
बहुविधाभरण 2-1-57
बहुविधाभरणविभूषित 2-1-32
बहुविधाभरणविभूषितवपुस् 2-2-24

अविदूर 2-2-6, 6-3-73
तदविदूर 2-2-8
तदविदूरतः = तदविदूरे 5-4-44 वार्त्तिकम् – तसिप्रकरण आद्यादिभ्य उपसङ्ख्यानम्। This is referred to as सार्वविभक्तिकस्तसि:।

पणवमृदङ्गवेणुवीणाढक्क 2-2-29
पणवमृदङ्गवेणुवीणाढक्कादि 2-2-24
नानातोद्य 2-1-57
पणवमृदङ्गवेणुवीणाढक्कादिनानातोद्य 2-1-57
पणवमृदङ्गवेणुवीणाढक्कादिनानातोद्यालिङ्गित 2-1-32
पणवमृदङ्गवेणुवीणाढक्कादिनानातोद्यालिङ्गितवपुस् 2-2-24

प्रतिगतमङ्गमिति प्रत्यङ्गम् (2-2-18 वार्त्तिकम् – अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयया) = करादिकम्।

अनवस्थ 2-2-24 वार्त्तिकम्, 6-3-73, 6-3-74, 1-2-48
सुप्त्यनवस्थ 2-1-32
अङ्गप्रत्यङ्ग 2-2-29
सुप्त्यनवस्थाङ्गप्रत्यङ्ग 2-2-24

शिलूषस्य ऋषेरपत्यम् = शैलूष:।
शिलूष ङस् अण् 4-1-114 (overrules 4-1-95)
= शिलूष अ 1-2-46, 2-4-71, 1-3-3
= शैलूष अ 7-2-117
= शैलूष् अ 1-4-18, 6-4-148
= शैलूष

In the feminine –
शैलूष + ङीप् 4-1-15 = शैलूष + ई 1-3-8, 1-3-3
= शैलूष् + ई 1-4-18, 6-4-148
= शैलूषी

अद्भुतशयन 2-1-57
अद्भुतशयनशायिनी 2-2-19, 3-2-78, 4-1-5

शुभँ दीप्तौ १. ८५३
शुभ् + णिच् 3-1-26
= शोभि 1-3-7, 1-3-3, 7-3-86, 3-1-32
शोभि + क्त 3-2-102, 1-1-26
= शोभि इत 1-3-8, 7-2-35
= शोभित 6-4-52

उज्ज्वलाभरण 2-1-57
उज्ज्वलाभरणोपशोभित 2-1-32

संजातहर्ष 2-2-24

पुच्छचुम्बन 2-2-8
पुच्छचुम्बनादि 2-2-24

चकार 3-2-115, 3-4-78, 3-4-82, 6-1-8, 7-4-66, 1-1-51, 7-4-60, 7-4-62, 7-2-115, 1-1-51

आविस् gets गति-सञ्ज्ञा by 1-4-61, 1-4-74
आविस् चकार 1-4-80. Not a compound.
आविश्चकार 8-2-66, 1-3-2, 8-3-15, 8-3-34, 8-4-40

कपेर्भाव: कर्म वा = कापेयम्।
कपि ङस् + ढक् 5-1-127
= कपि + ढक् 1-2-46, 2-4-71
= कपि + एय 1-3-3, 7-1-2
= कापि + एय 7-2-118
= काप् + एय 1-4-18, 6-4-148
= कापेय।

verse 1:
स तां दृष्ट्वा महाबाहुर्भूषितां मारुतात्मजः ।
तर्कयामास सीतेति रूपयौवनसम्पदा ।
हर्षेण महता युक्तो ननन्द हरियूथपः ।। ५-१०-५३ ।।

“Seeing her adorned and endowed with wealth of beauty and exuberance of youth, the mighty-armed Hanumān (sprung from the loins of the wind-god) inferred her to be Sītā; filled with great delight, that leader of monkey hordes felt transported with joy.”

दृशिँर् प्रेक्षणे (“इर्” gets the इत्-सञ्ज्ञा by the वार्त्तिकम् – इर इत्-सञ्ज्ञा वाच्या)
दृश् + क्त्वा 3-4-21
दृश् + त्वा 1-3-8. 7-2-10 stops 7-2-35.
दृष् + त्वा 8-2-36
दृष्ट्वा 8-4-41

महान्तौ बाहू यस्य सः महाबाहुः 2-2-24

१०.३११ तर्कँ भाषार्थः (ऊहेऽप्ययमिति मैत्रेय:)
तर्क् + णिच् 3-1-25
तर्क् + इ 1-3-7, 1-3-3
तर्कि 3-1-32

तर्कि + लिँट् 3-2-115
तर्कि आम् + लिँट् 3-1-35
तर्कय् + आम् + लिँट् 6-4-55
तर्कय् + आम् 2-4-81, 1-1-62, 1-2-46
तर्कयाम् + सुँ 4-1-2
तर्कयाम् 2-4-81
तर्कयाम् + अस् + लिँट् 3-1-40
तर्कयाम् + अस् + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 3-4-78
तर्कयाम् + अस् + णल् 3-4-82
तर्कयाम् + अस् + अ 1-3-7, 1-3-3
तर्कयाम् + अस् अस् + अ 6-1-8
तर्कयाम् + अ अस् + अ 7-4-60
तर्कयाम् + आ अस् + अ 7-4-70
तर्कयाम् + आस् + अ 6-1-101 = तर्कयामास

म्रियन्ते अनेन वृद्धेन विना वा इति मरुत्।
मृङ् प्राणत्यागे ६. १३९
मृ + उत् by उणादिसूत्रम् 1-94
= मरुत् 7-3-84, 1-1-51

मरुत् एव मारुत:।
मरुत् + अण् 5-4-38
= मरुत् + अ 1-3-3
= मारुत 7-2-117

आत्मनः जातः आत्मजः।
आत्मन् ङसिँ + जन् ड 2-2-19, 3-2-98
= आत्मन् + जन् अ 1-2-46, 2-4-71, 1-3-7
= आत्मन् + ज् अ 6-4-143 व्याख्यानम् – डिति अभस्य अपि अनुबन्धकरणसामर्थ्यात् टिलोपो भवति।
= आत्मज 1-1-62, 1-4-14, 8-2-7

मारुतस्य आत्मजः = मारुतात्मजः 2-2-8

यूनो भाव: = यौवनम्।
युवन् ङस् अण् 5-1-130 हायनान्तयुवादिभ्योऽण् ।
= युवन् अण् 1-2-46, 2-4-71
= युवन् अ 1-3-3. Note: 6-4-167 अन् stops the टि-लोप: which would have otherwise taken place by 6-4-144 नस्तद्धिते ।
= यौवन् अ 7-2-117

रूपं च यौवनं च रूपयौवने 2-2-29
रूपयौवने एव सम्पद् 2-1-57, तया

७.७ युजिँर् योगे (“इर्” gets the इत्-सञ्ज्ञा by the वार्त्तिकम् – इर इत्-सञ्ज्ञा वाच्या)
युज् + क्त 3-2-102, 1-1-26
युज् + त 1-3-8. (7-2-10 stops 7-2-35. 1-1-5 stops 7-3-86.)
युग् + त 8-2-30 = युक्त 8-4-55

१.७० टुनदिँ समृद्धौ
न + नुँम् + द् 1-3-5, 1-3-2, 7-1-58, 1-1-47
नन्द् + लिँट् 1-3-2, 1-3-3, 3-2-115
नन्द् + तिप् 3-4-78
नन्द् + णल् 3-4-82
नन्द् + अ 1-3-7, 1-3-3
नन्द् नन्द् अ 6-1-8
न नन्द् अ 7-4-60 = ननन्द 8-3-24, 8-4-58

हरीणां यूथम् = हरियूथम्
हरियूथं पाति इति हरियूथपः।
हरियूथ अम् + पा क 2-2-19, 3-2-3
= हरियूथ + पा अ 1-2-46, 2-4-71, 1-3-8
= हरियूथ + प् अ 6-4-64 = हरियूथप

verse 2:
आस्फोटयामास चुचुम्ब पुच्छं ननन्द चिक्रीड जगौ जगाम ।
स्तम्भानरोहन्निपपात भूमौ निदर्शयन्स्वां प्रकृतिं कपीनाम् ।। ५-१०-५४ ।।

“Demonstrating his simian nature, he clapped his arms and kissed his tail, rejoiced, frolicked, sang and paced, climbed up the pillars and dropped (back) on the ground.”

१०. २४७ स्फुटँ भेदने
स्फुट् + णिच् 3-1-25
स्फुट् + इ 1-3-3, 1-3-7
स्फोट् + इ 7-3-86
स्फोटि 3-1-32
स्फोटि + लिँट् 3-2-115
स्फोटि + आम् + लिँट् 3-1-35
स्फोटय् + आम् + लिँट् 6-4-55
स्फोटय् + आम् 2-4-81, 1-1-62, 1-2-46
स्फोटयाम् + सुँ 4-1-2
स्फोटयाम् 2-4-81
स्फोटयाम् + अस् + लिँट् 3-1-40
स्फोटयाम् + अस् + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 3-4-78
स्फोटयाम् + अस् + णल् 3-4-82
स्फोटयाम् + अस् + अ 1-3-7, 1-3-3
स्फोटयाम् + अस् अस् + अ 6-1-8
स्फोटयाम् + अ अस् + अ 7-4-60
स्फोटयाम् + आ अस् + अ 7-4-70
स्फोटयाम् + आस् + अ 6-1-101 = स्फोटयामास

१.४९५ चुबिँ वक्त्रसंयोगे
चु नुँम् ब् 1-3-2, 7-1-58, 1-1-47
= चुन्ब् 1-3-2, 1-3-3
चुन्ब् + लिँट् 3-2-115
चुन्ब् + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 3-4-78
चुन्ब् + णल् 3-4-82
चुन्ब् + अ 1-3-7, 1-3-3
चुन्ब् चुन्ब् + अ 6-1-8
चु चुन्ब् + अ 7-4-60
चुचुंब 8-3-24 = चुचुम्ब 8-4-58

१.४०५ क्रीडृँ विहारे
क्रीड् + लिँट् 3-2-115
क्रीड् + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 3-4-78
क्रीड् + णल् 3-4-82
क्रीड् + अ 1-3-7, 1-3-3
क्रीड् क्रीड् + अ 6-1-8
की क्रीड् + अ 7-4-60
कि क्रीड् + अ 7-4-59
चि क्रीड् + अ 7-4-62 = चिक्रीड

१.१०६५ गै शब्दे
गा + लिँट् 6-1-45, 3-2-115
गा + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 3-4-78
गा + णल् 3-4-82
गा गा + णल् 6-1-8
ग गा + णल् 7-4-59
ज गा + णल् 7-4-62
ज गा + औ 7-1-34
जगौ 6-1-88

१.११३७ गमॢँ गतौ
गम् + लिँट् 3-2-115
गम् + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 3-4-78
गम् + णल् 3-4-82
गम् + अ 1-3-7, 1-3-3
गम् गम् + अ 6-1-8
ग गम् + अ 7-4-60
ज गम् + अ 7-4-62
जगाम 7-2-116

१.५७९ रुहँ बीजजन्मनि प्रादुर्भावे च
रुह् + लङ् 3-2-111
रुह् + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 3-4-78
रुह् + त् 1-3-3, 3-4-100
रुह् + शप् + त् 3-1-68
रोह् + शप् + त् 7-3-86
रोह् + अ + त् 1-3-8, 1-3-3
अ रोह् + अ + त् 6-4-71, 1-1-46, 1-3-3
अरोहत्

१.९७९ पतॢँ गतौ |
पत् + लिँट् 3-2-115
पत् + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 3-4-78
पत् + णल् 3-4-82
पत् + अ 1-3-7, 1-3-3
पत् पत् + अ 6-1-8
प पत् + अ 7-4-60
प पात् + अ 7-2-116 = पपात

दृशिँर् प्रेक्षणे (“इर्” gets the इत्-सञ्ज्ञा by the वार्त्तिकम् – इर इत्-सञ्ज्ञा वाच्या)
दृश् + णिच् 3-1-26
दर्शि 7-3-86, 1-1-51, 3-1-32
दर्शि + शतृँ 3-2-123, 3-2-124
दर्शि + शप् + शतृँ 3-1-68
दर्शि + अ + अत् 1-3-8, 1-3-3, 1-3-2
दर्शे + अ + अत् 7-3-84
दर्शय् + अ + अत् 6-1-78
दर्शयत् 6-1-97

दर्शयत् + सुँ 4-1-2
= दर्शयत् + स् 1-3-2
= दर्शयनुँम् त् + स् 7-1-70, 1-1-47
= दर्शयन् त् + स् 1-3-2, 1-3-3
= दर्शयन् त् 6-1-68
= दर्शयन् 8-2-23. After this 8-2-7 does not apply because of 8-2-1.

एकादशः सर्गः

Summary: मन्दोदर्यां जातां सीतात्वबुद्धिं युक्तिपर्यालोचनेन निवर्तयन्हनुमान्पानभूमिगतं रावणं परितः प्रसुप्ता नानावस्थाः स्त्रियोऽनेकविधपानपात्रादिकं चावालोकयत्। परदारदर्शनजन्यदुरितं विशङ्क्य वशीकृतमनस्कत्वात्तत्संसर्गं निराकुर्वन्नन्यत्रान्वेषणञ्चोपक्रमते ।।

“Banishing by recourse to reason the thought that the lady (Mandodarī) whom he had seen was Sītā, Hanumān sees women in various states lying around Rāvana in the drinking room, as well as various kinds of drinking vessels etc. He is seized with fear of having incurred the sin of gazing on other’s wives; but the thought that he had looked on them with a lust-free mind eases his conscience and he begins to search elsewhere.”

सीतायाः भावः सीतात्वम् 5-1-119
सीतात्वे बुद्धिः सीतात्वबुद्धिः 2-1-40 (योगविभाग:), ताम्

युक्त्या पर्यालोचनम् 2-1-32, तेन युक्तिपर्यालोचनेन

जायते इति जन्यम्।
जनीँ प्रादुर्भावे ४. ४४
जन्य 3-4-68

परदारदर्शनजन्यदुरितम्
परेषां दारा: = परदारा: 2-2-8
परदाराणां दर्शनम् = परदारदर्शनम् 2-2-8
परदारदर्शनेन जन्यम् = परदारदर्शनजन्यम् 2-1-32
परदारदर्शनजन्यं च तद् दुरितं च = परदारदर्शनजन्यदुरितम् 2-1-57

वशी 5-4-50, 7-4-32, 1-4-61
वशीकृतं (2-2-18) मनो यस्य स: = वशीकृतमनस्क:। 2-2-24
कप्-प्रत्यय: by 5-4-154
सकारादेश: by 8-3-38

ref. गीता 18-67 अतपस्काय

verse 1:
तदिदं मार्गितं तावच्छुद्धेन मनसा मया ।
रावणन्तःपुरं सर्वं दृश्यते न च जानकी ।। ५-११-४५ ।।

“Therefore with a pure mind only has this entire gynaeceum of Rāvaṇa been ransacked by me; Janaka’s daughter, however, is not to be seen.”

१०. ३८४ मार्गँ अन्वेषणे
मार्ग् + णिच् 1-3-2, 3-1-25
मार्गि 3-1-32
मार्गि + क्त 3-2-102, 1-1-26
मार्गि + इत 1-3-8, 7-2-35 (7-2-10 doesn’t apply)
मार्ग् + इत 6-4-52 = मार्गित

मार्गित + सुँ 4-1-2 = मार्गितम् 7-1-24, 6-1-107 (adjective to रावणन्तःपुरम्)

तावत् + शुद्धेन
तावद् + शुद्धेन 8-2-39
तावज् + शुद्धेन 8-4-40
तावच् + शुद्धेन 8-4-55
तावच् + छुद्धेन 8-4-63 = तावच्छुद्धेन

रावणस्य अन्तःपुरम् = रावणान्तःपुरम् 2-2-8

१.११४३ दृशिर् प्रेक्षणे (“इर्” gets the इत्-सञ्ज्ञा by the वार्त्तिकम् – इर इत्-सञ्ज्ञा वाच्या)
दृश् + त 3-2-123, 1-3-13, 3-4-78
दृश् + ते 3-4-79
दृश् + यक् + ते 3-1-67 (Note: 7-3-78 doesn’t apply because यक् is not a शित्-प्रत्यय:)
दृश् + य + ते 1-3-3, 1-3-9. (Note: 1-1-5 ग्क्ङिति च stops 7-3-86 पुगन्तलघूपधस्य च)
दृश्यते

द्वादशः सर्गः

Summary: चित्रगृहनिकुञ्जादिनानास्थानेष्वन्विष्याप्यप्राप्तसीतादर्शनो हनुमांस्तस्या रावणेन प्रमापणादि संभाव्याकृतकार्यतया स्वयत्नवैफल्यं मन्वानः सुग्रीवदर्शनादिषु निर्विण्णोऽपि निर्वेदस्यानर्थापादकत्वं विचिन्त्यानिर्वेदस्यैव फलोत्पादकत्वं निश्चिन्वन्पुनरप्यन्वेष्टुमारभते। अन्विष्टाखिलप्रदेशोऽप्यलब्धसीतादर्शनः पुनश्च विषीदति ।

“Having failed to discover Sītā even after searching for her in the picture gallery and other places, Hanumān suspects that she might have been disposed of by Rāvaṇa and, thus meeting with frustration, falls into the quagmire of despair. On second thought, however, he deprecates despair as harmful and, falling back upon self-reliance, resumes the search. But, failing to find her even on searching for her all round, he becomes despondent again.”

चित्रै: भूषितं गृहम् = चित्रगृहम् – वार्तिकम् on 2-1-60 समानाधिकरणाधिकारे शाकपार्थिवादीनाम् उपसङ्ख्यानम् उत्तरपदलोपश्च।

चित्रगृहाणि च निकुञ्जानि च = चित्रगृहनिकुञ्जानि 2-2-29
नाना (विविधानि) च तानि स्थानानि = नानास्थानानि 2-1-57

चित्रगृहनिकुञ्जानि आदीनि येषां तानि = चित्रगृहनिकुञ्जादीनि 2-2-24

चित्रगृहनिकुञ्जादीनि च तानि नानास्थानानि = चित्रगृहनिकुञ्जादिनानास्थानानि। 2-1-57

न प्राप्तम् = अप्राप्तम् 2-2-6, 6-3-73
सीतायाः दर्शनम् = सीतादर्शनम् 2-2-8
अप्राप्तं सीतादर्शनं येन स: = अप्राप्तसीतादर्शन: 2-2-24

६.७८ इषुँ इच्छायाम्
इष् + क्त्वा 3-4-21, 1-3-2
अनु इष् ल्यप् 2-2-18, 7-1-37
अनु इष् य 1-3-8, 1-3-3
अन्विष्य 6-1-77

मीञ् हिंसायाम् ९. ४
मा + णिच् (स्वार्थे) 1-3-3, 6-1-50
= मा + इ 1-3-7, 1-3-3
= मापि 7-3-36, 1-1-46

मापि + ल्युट् 3-3-115
= मापि + अन 1-3-8, 1-3-3, 7-1-1
= माप् अन 6-4-51

प्रमापणम् 2-2-18, 8-4-29

प्रमापणम् आदि यस्य तत् प्रमापणादि 2-2-24

भू + णिच् 3-1-26
भौ + इ 7-2-115, 1-3-7, 1-3-3, 1-3-9
भावि 6-1-78, 3-1-32

भावि + क्त्वा 3-4-21
सम् + भावि + ल्यप् 2-2-18, 7-1-37
सम् + भावि + य 1-3-8, 1-3-3
सम् + भाव् + य 6-4-51
संभाव्य 8-3-23
= संभाव्य, सम्भाव्य 8-4-59

कृतानि कार्याणि येन स कृतकार्यः 2-2-24
न कृतकार्यः अकृतकार्यः 2-2-6, 6-3-73
अकृतकार्यस्य भावः अकृतकार्यता 5-1-119, 4-1-4
तया अकृतकार्यतया 2-3-23

स्वस्य यत्नं स्वयत्नम् 2-2-8

विगतं फलम् यस्य/यस्मात् तत् = विफलम् 2-2-24 वा.
विफलस्य भाव: = वैफल्यम्
विफल ङस् + ष्यञ् 5-1-124
= विफल + य 1-3-6, 1-3-3, 1-2-46, 2-4-71
= वैफल + य 7-2-117
= वैफल् + य 1-4-18, 6-4-148

स्वयत्नस्य वैफल्यम् = स्वयत्नवैफल्यम् 2-2-8

८.९ मनुँ अवबोधने
मन् + शानच् 1-3-2, 1-3-9, 3-2-123, 3-2-124
मन् + उ + आन 3-1-79, 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
मन्वान 6-1-77. Note: 7-2-82 doesn’t apply because the अङ्गम् “मनु” does not end in a अकार:।
मन्वान + सुँ 4-1-2 = मन्वानः 1-3-2, 8-2-66, 8-3-15

सुग्रीवस्य दर्शनम् = सुग्रीवदर्शनम् 2-2-8
सुग्रीवदर्शनम् आदि येषाम् तानि = सुग्रीवदर्शनादीनि 2-2-24, तेषु सुग्रीवदर्शनादिषु

४. ६७ विदँ सत्तायाम्
निर् विद् + क्त 3-2-102, 1-1-26, 2-2-18
निर् विन् + न 1-3-8, 8-2-42
निर् विन् + ण 8-4-29 वार्त्तिकम् – निर्विण्णस्योपसङ्ख्यानम्
निर् विण् + ण 8-4-41 = निर्विण्ण

अविद्यमान: अर्थ: यस्य तत् = अनर्थम् 2-2-24 वा., 6-3-73, 6-3-74

पदँ गतौ ४. ६५
पद् + णिच् 1-3-2, 3-1-26
= पादि 1-3-7, 1-3-3, 7-2-116, 3-1-32

पादि + ण्वुल् 3-1-133
= पादि + अक 1-3-7, 1-3-3, 7-1-1
= पाद् अक 6-4-51

आपादक 2-2-18

अनर्थस्य आपादक: = अनर्थापादक: 2-2-8
अनर्थापादकस्य भाव: = अनर्थापादकत्वम् 5-1-119

५.५ चिञ् चयने
चि + शतृँ 3-2-123, 3-2-124
चि श्नु शतृँ 3-1-73
चि नु अत् 1-3-8, 1-3-2, 1-3-9
चिन्वत् 6-4-87

चिन्वत् + सुँ 4-1-2
चिन्व नुँम् त् + सुँ 1-1-43, 7-1-70, 1-1-47
चिन्वन्त् स् 1-3-2, 1-3-3
चिन्वन्त् 6-1-68
चिन्वन् 8-2-23 (after this 8-2-7 cannot apply because of 8-2-1.)

निस् + चिन्वन् 2-2-18 = निश्चिन्वन् 8-2-66, 1-3-2, 8-3-15, 8-3-34, 8-4-40

६.७८ इषुँ इच्छायाम्
अनु + इष् + तुमुँन् 1-3-2, 3-4-65, 2-2-18
अनु + एष् + तुम् 7-3-86, 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9
अन्वेष् + तुम् 6-1-77
अन्वेष्टुम् 8-4-41

१.११२९ रभँ राभस्ये
आङ् + रभ् + त 3-2-123, 1-3-2, 1-3-12, 3-4-78
आङ् + रभ् + ते 3-4-79
आङ् + रभ् + शप् + ते 3-1-68
आ + रभ् + अ + ते 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
आरभते

१.११३० डुलभँष् प्राप्तौ
लभ् + क्त 1-3-2, 1-3-3, 1-3-5, 3-2-102, 1-1-26
लभ् + त 1-3-8. 7-2-10 stops 7-2-35.
लभ् + ध 8-2-40
लब् + ध 8-4-53

न लब्धम् = अलब्धम् 2-2-6, 6-3-73

सीतायाः दर्शनम् सीतादर्शनम् 2-2-8
अलब्धं सीतादर्शनं येन सः = अलब्धसीतादर्शनः 2-2-24

१. ९९० षदॢँ विशरणगत्यवसादनेषु
वि सद् लँट् 1-3-2, 6-1-64, 3-2-123
वि सद् + तिप् 1-3-78, 3-4-78
वि सद् + शप् + तिप् 3-1-68
वि सद् + अ + ति 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
वि सीद + अ + ति 7-3-78
वि सीदति 6-1-97
विषीदति 8-3-66

verse 1:
अवतीर्य विमानाच्च हनूमान् मारुतात्मजः ।
चिन्तामुपजगामाथ शोकोपहतचेतनः ।। ५-१२-२५ ।।

“Nay, descending from the aerial car, Hanumān, sprung from the loins of the wind-god, now fell a brooding, his understanding having been clouded by grief.”

१.६८४ तॄ प्लवनतरणयोः
तॄ + क्त्वा 3-4-21
अव + तॄ + ल्यप् 2-2-18, 7-1-37
अव + तॄ + य 1-3-8, 1-3-3. Note: 1-1-5 stops 7-3-84.
अव + तिर् + य 7-1-100, 1-1-51
अव + तीर् + य 8-2-77
अवतीर्य

१.११३७ गमॢँ गतौ
उप + गम् + लिँट् 3-2-115
उप + गम् + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 3-4-78
उप + गम् + णल् 3-4-82
उप + गम् + अ 1-3-7, 1-3-3
उप + गम् गम् + अ 6-1-8
उप + ग गम् + अ 7-4-60
उप + ज गम् + अ 7-4-62
उपजगाम 7-2-116

शोकेन उपहता = शोकोपहता 2-1-32
चितँ सञ्चेतने १०. १९२
चित् + णिच् 3-1-25 = चेति 7-3-86, 1-3-7, 1-3-3, 3-1-32
चेति + युच् 3-3-107
चेति + यु 1-3-3
चेति + अन 7-1-1
चेत् + अन 6-4-51

चेतन + टाप् 4-1-4 = चेतना 1-3-7, 1-3-3, 6-1-101

शोकोपहता चेतना यस्य स: = शोकोपहतचेतनः।
पुंवद्भाव: for the पूर्वपदम् by 6-3-34
ह्रस्वादेश: at the end by 1-2-48.

त्रयोदशः सर्गः

पुष्पकविमानान्निर्गतो हनुमान्विद्युद्वेगेन सर्वतोऽन्विष्याप्यलब्धसीतादर्शनस्तस्या विनाशमेवादर्शने हेतुत्वेनोत्प्रेक्षते। जानक्या अनुपलब्धी रामे निवेदितानिवेदिताप्यनेकमहानर्थापादिकेति विचिन्त्य प्रतिप्रयाणान्निवृत्तः प्रायोपवेशनं प्राणमोक्षणं रावणमारणं वा यावद्विचिन्तयति तावदेकां वनवाटिकामनन्वेषितां निर्धार्य तामन्वेष्टुमुपक्रान्तः स्वोद्योगसाफल्यापादनार्थमृषिदेवगणब्रह्मादीन्प्रार्थयते ।

“Coming out of the aerial car, Puṣpaka, and not finding Sītā even on searching for her on all sides. Hanumān concludes her to have been killed. Believing that her untraceability, no matter whether it is reported to Śrī Rāma or not, may lead to disastrous consequences. Hanumān decides not to return to the mainland. Meanwhile, while he contemplates fasting till death or suicide or the killing of Rāvaṇa, he catches sight of a groove which he does not remember to have seen and before proceeding to explore it mentally invokes the succour of Rṣis and gods for success in his undertaking.”

विद्युतो वेग: = विद्युद्वेग: 2-2-8, तेन

सर्वत: 5-3-7

अन्विष्य 3-4-21, 2-2-18, 7-1-37

हेतुत्वम् 5-1-119

१.६९४ ईक्षँ दर्शने

उद् + प्र + ईक्ष् + लँट् 3-2-123
उद् + प्र + ईक्ष् + त 3-4-78, 1-3-12
उद् + प्र + ईक्ष् + ते 3-4-79
उद् + प्र + ईक्ष् + शप् + ते 3-1-68
उद् + प्र + ईक्ष् + अ + ते 1-3-8, 1-3-3
उत्प्रेक्षते 6-1-87, 8-4-55

विदँ चेतनाख्याननिवासेषु १०. २३२
विद् + णिच् 1-3-2, 3-1-25
= वेदि 1-3-7, 1-3-3, 7-3-86, 3-1-32
वेदि + क्त 3-2-102, 1-1-26
= वेदि + इत 1-3-8, 7-2-35 (7-2-10 does not apply)
= वेदित 6-4-52
निवेदित 2-2-18

चितिँ स्मृत्याम् १०. २
चि नुँम् त् + णिच् 1-3-2, 7-1-58, 1-1-47, 3-1-25
= चिन्ति 1-3-2, 1-3-3, 1-3-7, 3-1-32
चिन्ति + क्त्वा 3-4-21
वि चिन्ति + क्त्वा 2-2-18
= वि चिन्ति + ल्यप् 7-1-37
= वि चिन्त्य 1-3-8, 1-3-3, 6-4-51

Similarly निर्धार्य

इण् गतौ २. ४०
प्र + इ + अच् 1-3-3, 3-3-56, 2-2-18
= प्र + ए + अ 1-3-3, 7-3-84
= प्र + अय 6-1-78
= प्राय 6-1-101

प्राय: = मरणार्थम् अनशनम्
प्रायेण उपवेशनम् = प्रायोपवेशनम् 2-1-32, 6-1-87

verse 1:
अशोकवनिका चापि महतीयं महाद्रुमा।
इमामधिगमिष्यामि नहीयं विचिता मया ।। ५-१३-५५ ।।

“Here is a large grove too of Aśoka trees, containing gigantic trees. I shall (now) explore it since it has not been scoured by me (so far).”

By the उणादि-सूत्रम् “वर्तमाने पृषद्-बृहन्महज्जगद् शतृँवच्च।” the प्रातिपदिकम् “महत्” will undergo the same operations as a शतृँ-प्रत्ययान्त-शब्द:। This makes it उगित् (one that has an उक् letter as an इत्) and hence in the feminine 4-1-6 उगितश्च applies.
महत् + ङीप् 4-1-6
= महती 1-3-8, 1-3-3

महान्तो द्रुमा यस्यां सा = महाद्रुमा (अशोकवनिका)
महत् जस् द्रुम जस् 2-2-24
= महत् द्रुम 1-2-46, 2-4-71
= मह आ द्रुम 6-3-46
= महाद्रुम 6-1-101
In the feminine –
महाद्रुम + टाप् 4-1-4
= महाद्रुमा 1-3-7, 1-3-3, 6-1-101

“इट्”-आगम: in the form गमिष्यामि is by 7-2-70 ऋद्धनोः स्ये।

चतुर्दशः सर्गः

अशोकवनिकाप्राकारमवप्लुत्य प्राकारस्थ एव वनरामणीयकं पश्यन्वनं प्रविश्य वृक्षाद्वृक्षान्तरेष्ववप्लुत्य सीतां विचिन्वानो हनुमान् कंचिच्छिंशुपावृक्षं ददर्श । तदुपान्ताद्वहन्तीं सरितं दृष्टवा संध्योपास्त्याद्यर्थमत्र सीतागमनं भवेदिति संभावयञ्छिंशुपामधिरुह्य पर्णनिबिडविटपेषु निलीयावस्थितोऽभूत्।

“Leaping down to the enclosure of the Aśoka grove and watching the loveliness of the grove from the top of the wall, Hanumān enters the grove and, leaping from tree to tree in the course of his search for Sītā, catches sight of a Śiṁśupā tree. Espying a stream running beside it and expecting that Sītā might turn up on the bank of the stream to say her Sandhyā prayers, he takes up his position on that Aśoka tree, hiding himself behind its leafy boughs.”

अवप्लुत्य 3-4-21, 2-2-18, 7-1-37, 6-1-71
अधिरुह्य, निलीय 3-4-21, 2-2-18, 7-1-37

ष्ठा गतिनिवृत्तौ १. १०७७ = स्था (6-1-64, “निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपाय:”)
प्राकारे तिष्ठति इति प्राकारस्थ:। (ref. गीता 6-9)
प्राकार ङि + स्था क 2-2-19, 3-1-92, 3-2-4, 3-4-67, 1-2-43, 2-2-30
= प्राकार ङि + स्था अ 1-3-8
= प्राकार ङि + स्थ् अ 3-4-114, 6-4-64
= प्राकारस्थ 1-2-46, 2-4-71

रमणीय 3-1-96, 8-4-2
रमणीयस्य भाव: (कर्म वा) = रामणीयकम् (= रमणीयत्वम्)।
रमणीय ङस् + वुञ् 5-1-132
= रमणीय + अक 1-3-3, 1-2-46, 2-4-71
= रामणीय + अक 7-2-117
= रामणीय् + अक 1-4-18, 6-4-148
= रामणीयक

अन्यो वृक्ष: = वृक्षान्तरम् 2-1-72
(ref. गीता 2-13 – देहान्तरम्)
अन्यो राजा = राजान्तरम् (सिद्धान्तकौमुदी)

चिञ् चयने ५. ५
चि + शानच् 3-2-123, 3-2-124, 1-3-72, 1-4-100
चि + नु + आन 3-1-73, 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
चिन्वान 6-1-87. Note: 7-2-82 doesn’t apply because the अङ्गम् “चिनु” does not end in a अकार:।
चिन्वान + सुँ 4-1-2 = चिन्वानः 1-3-2, 8-2-66, 8-3-15
विचिन्वानः 2-2-18

दृशिर् प्रेक्षणे १. ११४३
दृश् + लिँट् 3-2-115
दृश् ल् 1-3-2, 1-3-3
दृश् णल् 3-4-78, 3-4-82 (3-4-115 stops 3-1-68)
दृश् अ 1-3-7, 1-3-3
दृश् दृश् अ 6-1-8
दर् श् दृश् अ 7-4-66, 1-1-51
द दृश् अ 7-4-60
ददर्श 7-3-86, 1-1-51

वहन्ती – “नुँम्”-आगम: by 7-1-81

उपगतोऽन्तम् = उपान्त: (adjective) – 2-2-18 वार्त्तिकम् – अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयया।

verse 1:
लताप्रतानैर्बहुभिः पर्णैश्च बहुभिर्वृताम् ।। ५-१४-३६।।
काञ्चनीं शिंशुपामेकां ददर्श स महाकपिः।
वृतां हेममयीभिस्तु वेदिकाभिः समन्ततः ।। ५-१४-३७।।

“That mighty monkey (then) sighted a singular golden Śimśapā (Aśoka) tree intertwined with numerous clusters of climbers and clothed with abundant leaves, and actually surrounded on all sides by golden daisies.”

लतानां प्रताना: = लताप्रताना: 2-2-8, तै:

एकाम् = मुख्याम् = वृक्षान्तरसम्बन्धरहिताम्

महाकपिः 6-3-46

हेम्न: विकार: = हेममयम्
हेमन् ङस् मयट् 4-3-143, 4-3-135
= हेमन् मय 1-3-3, 1-2-46, 2-4-71
= हेममय 1-4-17, 8-2-7

स्त्रियाम् –
हेममय + ङीप् 4-1-15
= हेममय + ई 1-3-8, 1-3-3
= हेममय् ई 1-4-18, 6-4-148
= हेममयी

समन्तत: = समन्तात्।
तसिप्रकरण आद्यादिभ्य उपसङ्ख्यानम्। 5-4-44 वार्त्तिकम्।

पञ्चदशः सर्गः

शिंशुपाग्रेऽवस्थाय सर्वतश्चक्षुषी प्रचारयन्हनुमांश्चैत्यप्रासादगतां यथावर्णितगुणावस्थोपलक्षितां तां विलोक्य तस्याः सीतात्वं निर्धारयति ।

“Casting his eyes all round while remaining perched on the top of that Śimśapā tree, Hanumān catches sight of Sītā in a temple and recognizes her by virtue of her characteristics and age.”

अवस्थाय 3-4-21, 7-1-37

लोकृँ – [भाषार्थः] १०. ३०७
लोक् + णिच् 3-1-25 = लोक् + इ 1-3-7, 1-3-3 = लोकि 3-1-32
विलोक्य 3-4-21, 2-2-18, 7-1-37, 6-4-51

चरँ गत्यर्थ: १. ६४०
चर् + णिच् 1-3-2, 3-1-26
= चारि 1-3-7, 1-3-3, 7-2-116, 3-1-32

चारि + लँट् 3-2-123
= चारि + शतृँ 3-2-124
= चारि + शप् + शतृँ 3-1-68
= चारि + अ + अत् 1-3-8, 1-3-2, 1-3-3
= चारे अ अत् 7-3-84
= चारयत् 6-1-78, 6-1-97

चारयत् + सुँ 4-1-2
= चारयन्त् + सुँ 1-1-43, 7-1-70, 1-1-47, 1-3-2, 1-3-3
= चारयन् 1-3-2, 6-1-68, 8-2-23. After this 8-2-7 cannot apply because of 8-2-1.

चैत्यप्रासादगताम् 2-1-24

वर्णितमनतिक्रम्य = यथावर्णितम् 2-1-6

सीताया: भाव: = सीतात्वम् 5-1-119

धृञ् धारणे १. १०४७
धृ + णिच् 3-1-25/3-1-26
= धारि 1-3-7, 1-3-3, 7-2-115, 1-1-51, 3-1-32

धारि + लँट् 3-2-123
= धारि + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 3-4-78
= धारि + शप् + तिप् 3-1-68
= धारि अ ति 1-3-8, 1-3-3
= धारयति 7-3-84, 6-1-78

सुखार्हां दुःखसंतप्तां व्यसनानामकोविदाम्।
तां विलोक्य विशालाक्षीमधिकं मलिनां कृशाम्॥५-१५-२६॥
तर्कयामास सीतेति कारणैरुपपादिभिः॥ ५-१५-२७॥

“Beholding that large-eyed woman, who looked very untidy and emaciated, who had never known calamities (before) and who, though deserving of comforts, was stricken with sorrow, Hanumān guessed her to be Sītā on convincing grounds.”

सुखमर्हति = सुखार्हा।
सुख अम् + अर्ह् अच् 2-2-19, 3-1-92, 3-2-12 अर्हः (अणोऽपवादः। स्त्रीलिङ्गे विशेषः। पूजार्हा ब्राह्मणी।), 1-2-43, 2-2-30
= सुख + अर्ह् अ 1-3-3, 1-2-46, 2-4-71
= सुखार्ह 6-1-101
स्त्रियाम् –
सुखार्ह + टाप् 4-1-4 = सुखार्हा 1-3-7, 1-3-3, 6-1-101
Ref. गीता 2-4 पूजार्हौ।

दुःखेन संतप्ता दुःखसंतप्ता 2-1-32, तां दुःखसंतप्ताम्।

न कोविदा = अकोविदा 2-2-6, 6-3-73
अकोविदा = अविज्ञात्री (इति शिरोमणि-व्याख्या)।

विशाले अक्षिणी यस्याः सा विशालाक्षी, तां विशालाक्षीम्।

विशाल औ अक्षि औ 2-2-24, 2-2-35
= विशाल अक्षि 1-2-46, 2-4-71
= विशालाक्षि 6-1-101
= विशालाक्षि + षच् 5-4-113
= विशालाक्षि + अ 1-3-6, 1-3-3
= विशालाक्ष् + अ 1-4-18, 6-4-148
= विशालाक्ष

स्त्रियाम् –
विशालाक्ष + ङीष् 4-1-41 षिद्गौरादिभ्यश्च
= विशालाक्ष + ई 1-3-8, 1-3-3
= विशालाक्ष् + ई 1-4-18, 6-4-148
= विशालाक्षी

तर्कँ भाषार्थः (ऊहेऽप्ययमिति मैत्रेय:)
तर्क् + णिच् 3-1-25. “णिच्” gets आर्धधातुक-सञ्ज्ञा by 3-4-114
= तर्क् + इ 1-3-3, 1-3-7
= तर्कि
“तर्कि” gets धातु-सञ्ज्ञा by 3-1-32
तर्कि + लिँट् 3-2-115
तर्कि आम् + लिँट् 3-1-35
तर्कय् + आम् + लिँट् 6-4-55
तर्कय् + आम् 2-4-81, 1-1-62, 1-2-46
तर्कयाम् + सुँ 4-1-2
तर्कयाम् 2-4-81
तर्कयाम् + अस् + लिँट् 3-1-40
तर्कयाम् + अस् + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 3-4-78
तर्कयाम् + अस् + णल् 3-4-82
तर्कयाम् + अस् + अ 1-3-7, 1-3-3
तर्कयाम् + अस् अस् + अ 6-1-8
तर्कयाम् + अ अस् + अ 7-4-60
तर्कयाम् + आ अस् + अ 7-4-70
तर्कयाम् + आस् + अ 6-1-101 = तर्कयामास।

पदँ गतौ ४. ६५
पद् + णिच् 3-1-26
= पादि 1-3-7, 1-3-3, 7-2-116
“पादि” gets धातु-सञ्ज्ञा by 3-1-32
उप पादि णिनिँ 2-2-19, 3-1-92, 3-2-78
= उप पादि इन् 1-3-7, 1-3-2
= उपपादिन् 6-4-51

उपपादिभि: = सीतात्वनिश्चयोपपादनसमर्थै:।

षोडशः सर्गः

सीतायाः शुभशीललक्षणादि प्रशंसन्हनुमान्यस्याः कृते खरविराधादयो हताः सेयमप्येतादृशीं दुरवस्थामनुभवतीति परिशोचति ।

“Admiring the virtue and propitious bodily marks etc., of Sītā, Hanumān grieves at the thought of that lady, for whose sake Khara, Virādha and others ogres were killed, having been reduced to such a sad plight.”

शीलं च लक्षणानि च = शीललक्षणानि 2-2-29
शुभानि च तानि शीललक्षणानि = शुभशीललक्षणानि 2-1-57
शुभशीललक्षणान्यादीनि यस्य तत् = शुभशीललक्षणादि 2-2-24

शन्सुँ स्तुतौ १. ८२९
शन्स् + लँट् 3-2-123
= शन्स् + शतृँ 3-2-124
= शन्स् + शप् + शतृँ 3-1-68
= शन्स् + अ + अत् 1-3-8, 1-3-2, 1-3-3
= शन्सत् 6-1-97

प्रशन्सत् 2-2-18

प्रशन्सत् + सुँ 4-1-2
= प्रशन्सन्त् + सुँ 1-1-43, 7-1-70, 1-1-47, 1-3-2, 1-3-3
= प्रशन्सन् 1-3-2, 6-1-68, 8-2-23. After this 8-2-7 cannot apply because of 8-2-1.
= प्रशंसन् 8-3-24

कृते – निमित्तार्थे एदन्तो निपात: – included in the चादि-गण: (आकृति-गण:)। 1-4-57
Gets अव्यय-सञ्ज्ञा by 1-1-37.
Ref. गीता 1-35

यस्याः – षष्ठी is by 2-3-26

खरश्च विराधश्च = खरविराधौ 2-2-29
खरविराधावादी येषां ते = खरविराधादय: 2-2-24

एष इव पश्यति (ज्ञानविषयो भवति) = एतादृश:।
दृशिँर् प्रेक्षणे (“इर्” gets the इत्-सञ्ज्ञा by the वार्त्तिकम् – इर इत्-सञ्ज्ञा वाच्या)
एतद् दृश् कञ् 2-2-19, 3-1-92, 3-2-60
= एतद् दृश् अ 1-3-8, 1-3-3
= एतआ दृश 6-3-91, 1-1-52
= एतादृश 6-1-101

स्त्रियाम् –
एतादृश + ङीप् 4-1-15
= एतादृश + ई 1-3-8, 1-3-3
= एतादृश् + ई 1-4-18, 6-4-148
= एतादृशी

दुरावस्था 2-2-18

इमामसितकेशान्तां शतपत्रनिभेक्षणाम् ।
सुखार्हां दुःखितां ज्ञात्वा ममापि व्यथितं मनः ॥ ५-१६-२८॥

My mind too is seized with anguish on finding this lady with dark long hanging hair and lotus-like eyes afflicted, though deserving of happiness.”

न सित: = असित: 2-2-6, 6-3-73

केशानामन्ता: = केशान्ता: 2-2-8

असिता: केशान्ता यस्या: सा = असितकेशान्ता 2-2-24, 4-1-4

शतं पत्राणि यस्य तत् = शतपत्रम् 2-2-24

भा दीप्तौ २. ४६
नि(= नियतम्)भाति = निभम् (सदृशम्)।
नि भा क 2-2-19, 3-1-92, 3-1-136, 3-4-67
= नि भा अ 1-3-8
= नि भ् अ 6-4-64
= निभ

शतपत्रेण निभम् = शतपत्रनिभम् 2-1-31

ईक्षँ दर्शने १.६९४
ईक्ष्यतेऽनेन = ईक्षणम् (नयनम्) 3-3-117

शतपत्रनिभे ईक्षणे (= नयने) यस्या: सा = शतपत्रनिभेक्षणा 2-2-24, 4-1-4, ताम्

सुखमर्हति = सुखार्हा।
सुख अम् + अर्ह् अच् 2-2-19, 3-1-92, 3-2-12 अर्हः (अणोऽपवादः। स्त्रीलिङ्गे विशेषः। पूजार्हा ब्राह्मणी।), 1-2-43, 2-2-30
= सुख + अर्ह् अ 1-3-3, 1-2-46, 2-4-71
= सुखार्ह 6-1-101
स्त्रियाम् –
सुखार्ह + टाप् 4-1-4 = सुखार्हा 1-3-7, 1-3-3, 6-1-101
Ref. गीता 2-4 पूजार्हौ।

सप्तदशः सर्गः

भगवति चन्द्रमस्याकाशमध्यमधिरोहति घोरविकृताननाभी राक्षसीभिः समन्ततो वेष्टितां जानकीं दृष्ट्वा हर्षनिर्भरलोचनो हनूमान्मनसा रामलक्ष्मणावभिवाद्य शिंशुपाग्रे निगूढस्तस्थौ ।

“His eyes filled with joy on beholding Sītā surrounded by ogresses with hideous and deformed faces while the moon was at the meridian, Hanumān mentally bows to Śrī Rāma and Lakṣmaṇa and remains hidden behind the boughs of the Śimśapā tree.”

सत्सप्तमी in भगवति, चन्द्रमसि and आरोहति is by 2-3-37 यस्य च भावेन भावलक्षणम्‌।
गीता examples 1-20, 1-41

रुहँ बीजजन्मनि प्रादुर्भावे च १. ९९५
Derivation of the प्रातिपदिकम् “अधिरोहत्” is similar to that of “प्रशंसत्” above.

घोराणि च विकृतानि च = घोरविकृतानि 2-2-29
घोराण्याननानि यासां ता: = घोरानना:। 2-2-18
विकृतान्याननानि यासां ता: = विकृतानना:। 2-2-18
घोराननाश्च विकृताननाश्च = घोरविकृतानना:। द्वन्द्वगर्भ-बहुव्रीहि: समास:।
“द्वन्द्वान्ते श्रूयमाणं पदं प्रत्येकमभिसम्बध्यते।”

हर्षेण निर्भरे = हर्षनिर्भरे 2-1-32
हर्षनिर्भरे लोचने यस्य स: = हर्षनिर्भरलोचन:। 2-2-18

वदँ व्यक्तायां वाचि १. ११६४
वद् + णिच् 3-1-26
= वादि 1-3-7, 1-3-3, 7-2-116, 3-1-32

वादि + क्त्वा 3-4-21
अभि वादि + क्त्वा 2-2-18
= अभि वादि + ल्यप् 7-1-37
= अभिवाद्य 1-3-8, 1-3-3, 6-4-51

गुहूँ संवरणे १. १०४३
गुह् + क्त 3-2-102, 1-1-26
= गुह् + त 1-3-8. (7-2-15 along with 7-2-44 stops 7-2-35)
= गुढ् + त 8-2-31
= गुढ् + ध 8-2-40
= गुढ् + ढ 8-4-41
= गु + ढ 8-3-13 (वचनसामर्थ्यात्)
= गूढ 6-3-111 (वचनसामर्थ्यात्)
निगूढ 2-2-18

ष्ठा गतिनिवृत्तौ १. १०७७ = स्था 6-1-64, परिभाषा “निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपाय:” (when as cause is gone, it’s effect is also gone)
स्था + लिँट् 3-2-115
= स्था + तिप् 3-4-78 (3-4-115 prevents 3-1-68)
= स्था + णल् 3-4-82
= स्था + स्था + णल् 6-1-8
= स्थ + स्था + णल् 7-4-59
= थ + स्था + णल् 7-4-61
= थ + स्था + औ 7-1-34
= तस्थौ 6-1-88, 8-4-54

नमस्कृत्वाथ रामाय लक्ष्मणाय च वीर्यवान् ।
सीतादर्शनसंहृष्टो हनुमान् संवृतोऽभवत् ॥ ५-१७-३२ ॥

“नमस्” optionally gets the गति-सञ्ज्ञा by 1-4-74 साक्षात्प्रभृतीनि च ।

The form should be नमस्कृत्य (8-3-40), नम: कृत्वा। (ref. गीता 11-35 नमस्कृत्वा = नमस्कृत्य। Also 9-34, 18-65 नमस्कुरु।)

वीर्यमस्यास्तीति वीर्यवान् 5-2-94, 8-2-9

सीताया दर्शनम् = सीतादर्शनम् 2-2-8
सीतादर्शनेन संहृष्ट: = सीतादर्शनसंहृष्ट: 2-1-32

“Having bowed down to Śrī Rāma and Lakṣmaṇa, the powerful Hanumān, who was over-joyed at the sight of Sītā, then went into hiding (once more behind the boughs).”

अष्टादशः सर्गः

शिंशुपाविटपाग्रस्थो हनुमानपररात्रे मदनपरवशं शतशः प्रमदावृतं सीतासविधं प्राप्नुवन्तं रावणं दृष्ट्वा तस्याङ्गप्रत्यङ्गस्फुटावलोकनाय शाखाग्रात्तूष्णीमवरुह्य शाखाधःप्रदेशे गूढं निलीय तस्थौ ।

“Perceiving Rāvaṇa surrounded by hundreds of young women and approaching Sītā towards the close of night, swayed by passion as he was, Hanumān, who was perched on the top of the Śimśapā tree, silently comes down in order to scan the figure of Rāvaṇa and hides himself under the boughs in order to avoid observation.”

शिंशुपाया: (शिंशपाया:) विटपस्याग्रम् = शिंशुपाविटपाग्रम्। 2-2-8

शिंशुपाविटपाग्रे तिष्ठतीति शिंशुपाविटपाग्रस्थ:। (ref. गीता 6-9)
ष्ठा गतिनिवृत्तौ १. १०७७ = स्था (6-1-64, “निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपाय:”)
शिंशुपाविटपाग्र ङि + स्था क 2-2-19, 3-1-92, 3-2-4, 3-4-67, 1-2-43, 2-2-30
= शिंशुपाविटपाग्र ङि + स्था अ 1-3-8
= शिंशुपाविटपाग्र ङि + स्थ् अ 3-4-114, 6-4-64
= शिंशुपाविटपाग्रस्थ 1-2-46, 2-4-71

अपरं रात्रे: = अपररात्र:।
अपर सुँ रात्रि ङस् 2-2-1 पूर्वापराधरोत्तरमेकदेशिनैकाधिकरणे, 1-2-43, 2-2-30
= अपर रात्रि 1-2-46, 2-4-71
= अपर रात्रि अच् (अ 1-3-3) 5-4-87 अहस्सर्वैकदेशसंख्यातपुण्याच्च रात्रेः ।
= अपर रात्र् अ 1-4-18, 6-4-148
= अपररात्र
This compound gets the masculine gender by 2-4-29 रात्राह्नाहाः पुंसि and not the feminine gender (by 2-4-26 परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः)
अपररात्र + सुँ 4-1-2 = अपररात्र: 1-3-2, 8-2-66, 8-3-15

तस्मिन् (अपररात्रे)।

परस्य वश: = परवश: 2-2-8
मदनेन परवश: = मदनपरवश: 2-1-32

शतशः 5-4-43

प्रमदाभिर्वृत: = प्रमदावृत: 2-1-32, तम्।

समाना विधा यस्य तत् = सविधम् (समीपम्) 2-2-24, 1-2-48, 6-3-84 व्याख्यानम्।
सीताया: सविधम् = सीतासविधम् 2-2-8

प्राप्नुवन्तम् is पुंलिङ्गे द्वितीया-एकवचनम् of the प्रातिपदिकम् “प्राप्नुवत्” (derivation is similar to that of “प्रशंसत्” above.)

अङ्गानि च प्रत्यङ्गानि च = अङ्गप्रत्यङ्गानि 2-2-29
स्फुटमवलोकनम् = स्फुटावलोकनम् – miscellaneous/general compound by 2-1-4 सह सुपा।
अङ्गप्रत्यङ्गानां स्फुटावलोकनम् = अङ्गप्रत्यङ्गस्फुटावलोकनम् 2-2-8, तस्मै।

अवरुह्य, निलीय 3-4-21, 2-2-18, 7-1-37

वृतः परमनारीभिस्ताराभिरिव चन्द्रमाः ।
तं ददर्श महातेजास्तेजोवन्तं महाकपिः ॥ ५-१८-२९॥

Surrounded by excellent women as the moon is by stars, the great monkey (Hanumān), who was endowed with extraordinary energy, (thus) beheld the glorious Rāvaṇa.”

परमाश्च ता नार्यश्च = परमनार्य: 2-1-57, 6-3-42

चन्द्रमा: is प्रथमा-एकवचनम् of the पुंलिङ्ग-प्रातिपदिकम् “चन्द्रमस्”। उपधा-दीर्घ: by 6-4-14 अत्वसन्तस्य चाधातोः।

दृशिर् प्रेक्षणे १. ११४३
दृश् + लिँट् 3-2-115
दृश् ल् 1-3-2, 1-3-3
दृश् णल् 3-4-78, 3-4-82 (3-4-115 stops 3-1-68)
दृश् अ 1-3-7, 1-3-3
दृश् दृश् अ 6-1-8
दर् श् दृश् अ 7-4-66, 1-1-51
द दृश् अ 7-4-60
ददर्श 7-3-86, 1-1-51

महत् तेजो यस्य स: = महातेजा: 2-2-24, 6-3-46
Declined like “चन्द्रमस्” in the masculine.

(प्रशस्तं) तेजोऽस्यास्तीति = तेजस्वान्, तं तेजस्वन्तम्।
तेजस् सुँ + मतुँप् 5-2-94
= तेजस् + मतुँप् 1-2-46, 2-4-71
= तेजस् + वतुँप् 8-2-9
= तेजस् + वत् 1-3-2, 1-3-3. Note: By 1-4-19, “तेजस्” gets the भ-सञ्ज्ञा। Hence 8-2-66 does not apply.
= तेजस्वत्। (Declined like “भगवत्”)।

महांश्चासौ कपिश्च = महाकपि: 2-1-57, 6-3-46

Dec 10th 2011

ताराभिश्चन्द्रमा इव नारीभिर्यो वृत:, तं रावणं महाकपिर्ददर्श।

एकोनविंशः सर्गः

रावणभयेन वेपमानायाः परिम्लानायाश्च जानक्यास्तात्कालिकमवस्थाविशेषं वर्णयितुमपारयन्निव कविरनेकोपमानैस्तां विशिनष्टि । प्राप्तो रावणस्तामावर्जयितुमुपक्रमते ।

“Finding himself unable as it were to depict the mental state of Sītā who got withered up and began to shudder at the sight of Rāvaṇa, the poet tries to portray her with the help of similes. Arrived in her presence, Rāvaṇa tries to win her.”

रावणाद्भयम् = रावणभयम् 2-1-37 पञ्चमी भयेन।

टुवेपृँ कम्पने १. ४२५
वेप् + लँट् 1-3-2, 1-3-5, 1-3-9, 3-2-123
= वेप् + शानच् 3-2-124, 1-4-100
= वेप् + शप् + शानच् 3-1-68
= वेप् + अ + आन 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
= वेप मुँक् + आन 7-2-82, 1-1-46
= वेपम् + आन 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9
= वेपमान
स्त्रियाम् –
वेपमान + टाप् 4-1-4
= वेपमाना 1-3-7, 1-3-3, 1-3-9, 6-1-101

म्लै हर्षक्षये १. १०५२
म्ला + क्त 6-1-45, 3-2-102, 1-1-26, 3-4-72
= म्ला + त 1-3-8
= म्लान 8-2-43
स्त्रियाम् –
म्लान + टाप् 4-1-4
= म्लाना 1-3-7, 1-3-3, 1-3-9, 6-1-101

परिम्लाना 2-2-18

जनकस्य अपत्यं स्त्री जानकी, तस्याः जानक्याः।
जनक ङस् + अण् 4-1-112
= जनक + अ 1-3-3, 1-2-46, 2-4-71
= जानक + अ 7-2-117
= जानक् + अ 1-4-18, 6-4-148
= जानक
स्त्रियाम् –
जानक + ङीप् 4-1-15
= जानक + ई 1-3-8, 1-3-3
= जानक् + ई 1-4-18, 6-4-148
= जानकी

अथवा – शेषविवक्षायाम्
जनकस्य इयम् जानकी, तस्याः जानक्याः।
जनक ङस् + अण् 4-1-83, 4-3-120
Remaining steps same as above.

स चासौ कालश्च = तत्काल: 2-1-57
तत्काले भवम् = तात्कालिकम्।
तत्काल ङि + ठञ् by आपदादिपूर्वपदात् कालात् – वार्त्तिकम् under 4-2-116
= तत्काल + ठ 1-3-3, 1-2-46, 2-4-71
= तत्काल + इक 7-3-50
= तात्काल + इक 7-2-117
= तात्काल् + इक 1-4-18, 6-4-148
= तात्कालिक

अवस्थानां विशेष: = अवस्थाविशेष: 2-2-8, तम्।

धातुः √वर्ण (चुरादि-गणः, वर्ण वर्णक्रियाविस्तारगुणवचनेषु, धातु-पाठः # १०. ४८४)

The ending अकारः of “वर्ण” is not a अनुनासिक: and hence does not get the इत्-सञ्ज्ञा by 1-3-2 उपदेशेऽजनुनासिक इत्।

वर्ण + णिच् । By 3-1-25. “णिच्” gets आर्धधातुक-सञ्ज्ञा by 3-4-114 आर्धधातुकं शेषः
= वर्ण् + णिच् । By 6-4-48 अतो लोपः, when an आर्धधातुकम् affix follows, the अकारः at the end of a अङ्गम् is elided if the अङ्गम् ends in a अकार: at the time when the आर्धधातुकम् affix is prescribed.
= वर्ण् + इ । अनुबन्ध-लोपः by 1-3-3 हलन्त्यम्, 1-3-7 चुटू, 1-3-9 तस्य लोपः।
= वर्णि ।
“वर्णि” gets धातु-सञ्ज्ञा by 3-1-32 सनाद्यन्ता धातवः।

वर्णि + तुमुँन् 3-4-65
= वर्णि + इतुम् 7-2-35, 1-1-46, 1-3-2, 1-3-3
= वर्णे + इतुम् 7-3-84
= वर्णयितुम् 6-1-78

शिषॢँ विशेषणे ७. १४
शिष् + लँट् 1-3-2, 1-3-9, 3-2-123
= शिष् + ति 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9, 3-4-78
= शि श्नम् ष् + ति 3-1-78, 1-1-47
= शिनष् + ति 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
= शिनष्टि 8-4-41
“वि” is the उपसर्ग: (ref. 1-4-59)
वि + शिनष्टि = विशिनष्टि 1-4-80

धातुः √पार (चुरादि-गणः, पार कर्मसमाप्तौ, धातु-पाठः # १०. ४८४)
“पारि” is derived similar to “वर्णि”।
पारि + शतृँ 3-2-123, 3-2-124, 1-3-74
पारि + शप् + शतृँ 3-1-68
पारि + अ + अत् 1-3-8, 1-3-3, 1-3-2
पारे + अ + अत् 7-3-84
पारय् + अ + अत् 6-1-78
पारयत् 6-1-97

धातुः √मा (मा माने २. ५७, माङ् माने शब्दे च ३. ७, माङ् माने ४. ३७)
उपमीयतेऽनेनेति = उपमानम्।
उप मा + ल्युट् 3-3-117
= उप मा + अन 1-3-8, 1-3-3, 7-1-1
= उपमान 6-1-101

अनेक 2-2-6, 6-3-73, 6-3-74
अनेकानि च तान्युपमानानि = अनेकोपमानानि 2-1-57, 6-1-87, तै:।

उपक्रमते – आत्मनेपदम् by 1-3-42 प्रोपाभ्यां समर्थाभ्याम्। (प्रोपाभ्यां प्रारम्भे इत्येव सुवचम्)।

वृजीँ वर्जने १०. ३४४
वृज् + णिच् । By 1-3-2, 3-1-25
= वर्ज् + इ । 1-3-3, 1-3-7, 7-3-86, 1-1-51
= वर्जि ।
“वर्जि” gets धातु-सञ्ज्ञा by 3-1-32 सनाद्यन्ता धातवः।
वर्जयितुम् is derived similarly to वर्णयितुम् above.
आवर्जयितुम् 2-2-18

समीक्षमाणां रुदतीमनिन्दितां सुपक्ष्मताम्रायतशुक्ललोचनाम्।
अनुव्रतां राममतीव मैथिलीं प्रलोभयामास वधाय रावणः॥ ५-१९-२२॥

Rāvaṇa, to his (own) destruction, sought to seduce Sītā (the princess of Mithilā), who was looking around weeping, irreproachable as she was, had large reddish and white eyes with beautiful lashes and was excessively devoted to Śrī Rama.”

१.६९४ ईक्षँ दर्शने
ईक्ष् + लँट् 1-3-2, 1-3-9, 3-2-123
ईक्ष् + शानच् 3-2-124, 1-4-100
ईक्ष् + शप् + शानच् 3-1-68
ईक्ष् + अ + आन 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
ईक्ष् + अ मुँक् + आन 7-2-82, 1-1-46
ईक्षम् + आन 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9
ईक् ष् अ म् आ न
ईक्षमाण 8-4-2
स्त्रियाम् –
ईक्षमाण + टाप् 4-1-4
= ईक्षमाणा 1-3-7, 1-3-3, 1-3-9, 6-1-101
समीक्षमाणा 2-2-18

रुदिँर् अश्रुविमोचने २. ६२
“इर्” gets इत्सञ्ज्ञा by the वार्तिकम् – इर इत्सञ्ज्ञा वाच्या।
रुद् + लँट् 1-3-9, 3-2-123
= रुद् + शतृँ 3-2-124
= रुद् + शप् + शतृँ 3-1-68
= रुद् + शतृँ 2-4-72
= रुद् + अत् 1-3-8, 1-3-2
= रुदत्
स्त्रियाम् –
रुदत् + ङीप् 4-1-6 = रुदती 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
Note: 7-1-80/7-1-81 doesn’t apply.

णिदिँ कुत्सायाम् १. ६९
= निद् 6-1-65, 1-3-2, 1-3-9
= निनुँम्द् 7-1-58, 1-1-47
= निन्द् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9
निन्द् + क्त 3-2-102, 1-1-26
= निन्द् + त 1-3-8, 1-3-9
= निन्दित 7-2-35. Note: 6-4-24 does not apply.
स्त्रियाम् –
निन्दित + टाप् 4-1-4
निन्दिता 1-3-7, 1-3-3, 6-1-101
न निन्दिता = अनिन्दिता 2-2-6, 6-3-73, ताम् अनिन्दिताम्

सु (= शोभनानि) पक्ष्माणि यस्य तत् = सुपक्षम (लोचनम्) 2-2-24, 2-2-35
सुपक्ष्मणी (क्रोधेन रोदनेन वा) ताम्रे (ताम्रप्रान्ते) आयते शुक्ले लोचने यस्याः सा = सुपक्ष्मताम्रायतशुक्ललोचना 2-2-24, 2-2-35, 4-1-4, 6-1-101, ताम्।

अनुकूलं व्रतं (कर्म) यस्या: सा = अनुव्रता 2-2-24, 4-1-4

लुभँ विमोहने ६.२५
लुभ् + णिच् 1-3-2, 3-1-26
= लोभि 1-3-3, 1-3-7, 7-3-86, 3-1-32
लोभि + लिँट् 3-2-115
= लोभयामास
Steps are similar to those for ताडयामास shown above.
प्रलोभयामास 1-4-59, 1-4-80

विंशः सर्गः

चाटुवचनोपन्यासै: सीतां प्रति प्रलोभयन्रावण: प्ररोचनपूर्वं स्वाङ्गीकारं प्रार्थयते ।

“Seeking to seduce Sītā by means of coaxing words, Rāvaṇa implores her to accept him.”

चाटुरूपाणि वचनानि = चाटुवचनानि 2-1-60 वार्त्तिकम् – समानाधिकरणाधिकारे शाकपार्थिवादीनाम् उपसङ्ख्यानम् उत्तरपदलोपश्च।
अथवा –
चाटूनां वचनानि = चाटुवचनानि 2-2-8
चाटुवचनानामुपन्यासा: = चाटुवचनोपन्यासा: 2-2-8, 6-1-87
अथवा –
चाटुवचनैरुपन्यासा: = चाटुवचनोपन्यासा: 2-1-32, 6-1-87

तैः चाटुवचनोपन्यासैः।

लुभँ विमोहने ६.२५
लुभ् + णिच् 1-3-2, 3-1-26
= लोभि 1-3-3, 1-3-7, 7-3-86, 3-1-32
लोभि + लँट् 3-2-123
= लोभि + शतृँ 3-2-124
= लोभि + शप् + शतृँ 3-1-68
= लोभि + अ + अत् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
= लोभे + अ + अत् 7-3-84
= लोभय + अत् 6-1-78
= लोभयत् 6-1-97
प्रलोभयत् 2-2-18

प्रलोभयत् + सुँ 4-1-2 = प्रलोभय नुँम् त् + सुँ 7-1-70, 1-1-47
= प्रलोभयन्त् स् 1-3-2, 1-3-3 = प्रलोभयन्त् 6-1-68
= प्रलोभयन् 1-1-62, 1-4-14, 8-2-23 (after this 8-2-7 cannot apply because of 8-2-1.)

स्वस्याङ्गम् = स्वाङ्गम् 2-2-8
अस्वाङ्गं स्वाङ्गं सम्पद्यते तस्य करणम् = स्वाङ्गीकार:।
स्वाङ्ग सुँ + च्विँ 5-4-50
= स्वाङ्ग च्विँ 1-2-46, 2-4-71
= स्वाङ्ग 1-3-2, 1-3-7, 6-1-67
= स्वाङ्गी 7-4-32

स्वाङ्गी gets the गति-सञ्ज्ञा by 1-4-61 ऊर्यादिच्विडाचश्च and अव्यय-सञ्ज्ञा by 1-4-56 प्राग्रीश्वरान्निपाताः, 1-1-37 स्वरादिनिपातमव्ययम्।

स्वाङ्गी कृ + घञ् 3-3-18, 2-2-18
= स्वाङ्गी कृ + अ 1-3-8, 1-3-3
= स्वाङ्गी कार् + अ 7-2-115, 1-1-51
= स्वाङ्गीकार

स्वाङ्गीकार + अम् 4-1-2 = स्वाङ्गीकारम् 6-1-107

अर्थ उपयाच्ञायाम् १०.४४७
अर्थ + णिच् 3-1-25
= अर्थ + इ 1-3-3, 1-3-7, 1-3-9
= अर् थ् + इ 6-4-48
= अर्थि 3-1-32
अर्थि + लँट् 3-2-123
= अर्थि + त 3-4-78, 1-3-74
= अर्थि + ते 3-4-79
= अर्थि + शप् + ते 3-1-68
= अर्थि + अ + ते 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
= अर्थे + अ + ते 7-3-84
= अर्थयते 6-1-78

प्र + अर्थयते 1-4-59, 1-4-80
प्रार्थयते 6-1-101

पिब विहर रमस्व भुङ्क्ष्व भोगान् धननिचयं प्रदिशाभि मेदिनीं च।
मयि लल ललने यथासुखं त्वं त्वयि च समेत्य ललन्तु बान्धवास्ते॥ ५-२०-३५॥

(Therefore) drink, sport, revel and enjoy pleasures. Bestow (on your relatives) the (immense) store of wealth (that you will own from now on wards) as well as the earth (that will now be yours.) Enjoy you life according to your pleasure, depending on me, O beloved one, and, reaching your presence, let your relatives (too) enjoy life.”

पा पाने १.१०७४
पा + लोँट् 3-3-162
= पा + सिप् 3-4-78
= पा + सि 1-3-3, 1-3-9
= पा + हि 3-4-87
= पा + शप् + हि 3-1-68
= पिब + शप् + हि 7-3-78
= पिब + अ + हि 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
= पिब हि 6-1-97
= पिब 6-4-105

हृञ् हरणे १.१०४६
हृ + लोँट् 3-3-162
= हृ + सिप् 3-4-78
= हृ + सि 1-3-3, 1-3-9
= हृ + हि 3-4-87
= हृ + शप् + हि 3-1-68
= हृ + अ + हि 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
= हर् + अ + हि 7-3-84, 1-1-51
= हर 6-4-105
विहर 1-4-59, 1-4-80

रमुँ क्रीडायाम् १.९८९
रम् + लोँट् 3-3-162
= रम् + थास् 3-4-78
= रम् + से 3-4-80
= रम् + स्व 3-4-91
= रम् + शप् + स्व 3-1-68
= रम् + अ + स्व 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
= रमस्व

भुजँ पालनाभ्यवहारयोः ७. १७
भुज् + लोँट् 3-3-162
= भुज् + थास् 3-4-78, 1-3-66
= भुज् + से 3-4-80
= भुज् + स्व 3-4-91
= भुश्नम्ज् + स्व 3-1-78, 1-1-47
= भुनज् + स्व 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
= भुन्ज् + स्व 1-2-4, 6-4-112
= भुन्ग् + स्व 8-2-30
= भुंग् + स्व 8-3-24
= भुंग् + ष्व 8-3-59
= भुंक् + ष्व 8-4-55
= भुङ्क् + ष्व 8-4-58
= भुङ्क्ष्व

धनस्य निचयः धननिचयः 2-2-8, तं धननिचयम्

दिशँ अतिसर्जने ६.३
दिश् + लोँट् 3-3-162
= दिश् + सिप् 3-4-78
= दिश् + हि 1-3-3, 3-4-87
= दिश् + श + हि 3-1-77
= दिश् + अ + हि 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9. 7-3-86 won’t apply due to 1-2-4, 1-1-5
= दिश 6-4-105
प्रदिश 1-4-59, 1-4-80

ललँ विलासे १.४१६
लल् + लोँट् 3-3-162
= लल् + सिप् 3-4-78
= लल् + सि 1-3-3, 1-3-9
= लल् + हि 3-4-87
= लल् + शप् + हि 3-1-68
= लल् + अ + हि 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
= लल 6-4-105

सुखमनतिक्रम्य = यथासुखम् 2-1-6, 2-4-83, 6-1-107

इण् गतौ २.४०
इ + क्त्वा 3-4-21
सम् आ इ ल्यप् 1-4-60, 2-2-18, 7-1-37
= सम् आ इ य 1-3-8, 1-3-3
= समे य 6-1-87
= समेत्य 6-1-86, 6-1-71, 1-1-46

ललँ विलासे १.४१६
लल् + लोँट् 3-3-162
= लल् + झि 3-4-78
= लल + झु 3-4-86
= लल् + शप् + झु 3-1-68
= लल् + अ + झु 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
= लल + अन्तु 7-1-3
= ललन्तु 6-1-97

बन्धुः एव बान्धवः
बन्धु + अण् 5-4-38
= बन्धु + अ 1-3-3, 1-3-9
= बान्धु + अ 7-2-117
= बान्धो + अ 6-4-146
= बान्धव 6-1-78

Dec 24th 2011

एकविंशःसर्गः

मध्ये तृणप्रक्षेपेण दु:संसर्गं निवार्य साम्ना हितोपदेशपूर्वकं रावणं प्रबोधयन्ती सीता रामगुणान्प्रस्तुत्य तेन सख्यविरोधाभ्यां जायमानशुभाशुभफलं प्रदर्श्य तस्मै आत्मसमर्पणेन सख्यं सम्पादयेत्युपदिशति।

“Placing a blade of grass between herself and Rāvaṇa in order to avoid direct contact with a man of evil intentions and expostulating with him by showing him the right path, Sītā praises Śrī Rāma and, impressing on Rāvaṇa the consequences of the latter befriending and antagonizing Śrī Rāma, advises Rāvaṇa to make friends with Śrī Rāma through self-surrender.”

तृणस्य प्रक्षेपणम् = तृणप्रक्षेपणम् 2-2-8
तेन तृणप्रक्षेपणेन

दु: (= दुष्टः) संसर्गः = दुःसंसर्गः 2-2-18
तं दुःसंसर्गम्

वृञ् आवरणे १०.३४५
वृ + णिच् 3-1-25
= वृ + इ 1-3-3, 1-3-7, 1-3-9
= वारि 7-2-115, 1-1-51, 3-1-32
वारि + क्त्वा 3-4-21
= नि वारि + ल्यप् 2-2-18, 7-1-37
= निवारि + य 1-3-8, 1-3-3
= निवार् + य 6-4-51
= निवार्य

हितश्चासावुपदेशश्च = हितोपदेश: 2-1-57
हितोपदेश: पूर्वो यस्य तत् = हितोपदेशपूर्वकम् 2-2-24, 2-2-35. “कप्”-समासान्तप्रत्यय: by 5-4-154. This is an adverb (क्रियाविशेषणम्) for बोधयन्ती। Neuter gender by वार्त्तिकम् (under 2-4-18) – क्रियाविशेषणानां च क्लीबतेष्यते।

बुधँ अवगमने ४. ६८
बुध् + णिच् 3-1-26
= बुध् + इ 1-3-3, 1-3-7, 1-3-9
= बोधि 7-3-86, 3-1-32
बोधि + लँट् 3-2-123
= बोधि + शतृँ 3-2-124
= बोधि + शप् + शतृँ 3-1-68
= बोधि + अ + अत् 1-3-8, 1-3-3, 1-3-2
= बोधे + अ + अत् 7-3-84
= बोधय + अत् 6-1-78
= बोधयत् 6-1-97
स्त्रियाम् –
बोधयत् + ङीप् 4-1-6
= बोधयत् + ई 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
= बोधयनुँम् त् + ई 6-1-85, 7-1-81, 1-1-47
= बोधयन्ती 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9

रामस्य गुणाः रामगुणाः 2-2-8
तान् रामगुणान्

ष्टुञ् स्तुतौ २.३८
स्तु 6-1-64, निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः
स्तु + क्त्वा 3-4-21
= प्र स्तु + ल्यप् 2-2-18, 7-1-37
= प्र स्तु + य 1-3-8, 1-3-3
= प्र स्तु तुँक् + य 6-1-71
= प्रस्तुत्य 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9

सख्युर्भावः कर्म वा सख्यम्
सखि ङस् + य 5-1-126
= सखि + य 1-2-46, 2-4-71
= सख् + य 1-4-18, 6-4-148
= सख्य
सख्य + सुँ 4-1-2 = सख्य + अम् 7-1-24 = सख्यम् 6-1-107

सख्यं च विरोधश्च सख्यविरोधौ 2-2-29, ताभ्यां सख्यविरोधाभ्याम्।

न शुभम् = अशुभम् 2-2-6, 6-3-73
शुभं चाशुभं च = शुभाशुभे 2-2-29
शुभफलं चाशुभफलं च तयो: समाहार: = शुभाशुभफलम् 2-1-57, द्वन्द्वगर्भ-तत्पुरुष-समास:।
“द्वन्द्वान्ते श्रूयमाणं पदं प्रत्येकमभिसम्बध्यते” इति न्याय:।
जायमानं च तत् शुभाशुभफलम् = जायमानशुभाशुभफलम् 2-1-57

दृशिँर् प्रेक्षणे १.११४३
दृश् + णिच् 3-1-26
= दृश् + इ 1-3-3, 1-3-7, 1-3-9
= दर्शि 7-3-86, 1-1-51, 3-1-32

दर्शि + क्त्वा 3-4-21
प्र + दर्शि + ल्यप् 2-2-18, 7-1-37
= प्र + दर्शि + य 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
= प्रदर्श्य 6-4-51

आत्मनः समर्पणम् आत्मसमर्पणम् 2-2-8
तेन आत्मसमर्पणेन

पदँ गतौ ४. ६५
पद् + णिच् 3-1-26
= पादि 1-3-3, 1-3-7, 1-3-9, 7-2-116, 3-1-32 धातु-सञ्ज्ञा
पादि + लोँट् 3-3-162
= पादि + सिप् 3-4-78
= पादि + सि 1-3-3, 1-3-9
= पादि + हि 3-4-87
= पादि + शप् + हि 3-1-68
= पादि + अ + हि 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
= पादे + अ + हि 7-3-84
= पादय + हि 6-1-78
= पादय 6-4-105
सम् + पादय = सम्पादय 1-4-59, 1-4-80

दिशँ अतिसर्जने ६.३
दिश् + लँट् 3-2-123
= दिश् + तिप् 3-4-78
= दिश् + श + तिप् 3-1-77. 7-3-86 won’t apply due to 1-2-4, 1-1-5
= दिश् + अ + ति 1-3-8, 1-3-9
उप दिशति 1-4-59, 1-4-80

नहि गन्धमुपाघ्राय रामलक्ष्मणयोस्त्वया।
शक्यं सन्दर्शने स्थातुं शुना शार्दूलयोरिव ॥ ५-२१-३१॥

“It is not possible for you to stand within the sight of Śrī Rāma and Lakṣmaṇa even on smelling their presence, any more than a dog would tarry within the gaze of a pair of tigers.”

घ्रा गन्धोपादाने (घ्राणे) १.१०७५
घ्रा + क्त्वा 1-3-2, 3-4-21
उप आङ् घ्रा ल्यप् 2-2-18, 7-1-37
उप आ घ्रा य 1-3-8, 1-3-3
उपाघ्राय 6-1-101

शुना – तृतीया-एकवचनम्, प्रातिपदिकम् “श्वन्”। सम्प्रसारणम् by 6-4-133 श्वयुवमघोनामतद्धिते।

स्थातुम् – “तुमुँन्” by 3-4-65 शकधृषज्ञाग्लाघटरभलभक्रमसहार्हास्त्यर्थेषु तुमुन्। ref. गीता 1-30.

द्वाविंशः सर्गः

सीताकृतगर्हणेन क्रुद्धो रावणो मासद्वयं प्रतीक्ष्य त्वां मारयामीति जानकीं भीषयते । ततो रावणस्त्रीभिर्नेत्रसंकेतादिभिः कृताश्वासा पुना रावणं गर्हति । घोरविकृतनानाकृती राक्षसीस्तर्जनसान्त्वनादिना जानक्या आवर्जने विनियुज्य तर्जनोद्यतं रावणं धान्यमालिनी नाम तत्पत्नी ततो निवर्तयति। स च विमोहितः सन्नन्तःपुरिकाभिरन्तर्गृहं प्रविशति ।

“Nettled by the censure uttered by Sītā, Rāvaṇa allows her a time-limit of two months to revise her decision and threatens her with death if she does not listen to reason. Restored to confidence by the glances of Rāvaṇa’s consorts, however, Sītā condemns him once more. Leaving instructions with ogresses of terrible and ugly aspect to bring her to reason by recourse to intimidation and persuasion, Rāvaṇa thereupon leaves the presence of Sītā along with his womenfolk.”

Jan 14th 2012

गर्हँ कुत्सायाम् १.७२३
गर्हँ + ल्युट् 3-3-115
= गर् ह् + यु 1-3-2, 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
= गर् ह् + अन 7-1-1
= गर्हण 8-4-2, 1-2-46

सीतया कृतम् = सीताकृतम् 2-1-32
सीताकृतं च तत् गर्हणं च = सीताकृतगर्हणम् 2-1-57, तेन

क्रुधँ क्रोधे कोपे ४.८६
क्रुधँ + क्त 3-2-102, 1-1-26, 3-4-72
= क्रुध् + त 1-3-2, 1-3-8, 1-3-9. इण्-निषेध: by 7-2-10.
= क्रुध् + ध 8-2-40
= क्रुद् + ध 8-4-53
= क्रुद्ध 1-2-46
क्रुद्ध + सुँ 4-1-2 = क्रुद्धः

द्वाववयवावस्य = द्वयम्।
द्वि औ + तयप् 5-2-42
= द्वि + तय 1-3-3, 1-2-46, 2-4-71
= द्वि + अयच् 5-2-43
= द् व् + अय 1-3-3, 1-4-18, 6-4-148
= द्वय

मासयोः द्वयम् = मासद्वयम् 2-2-8

मृङ् प्राणत्यागे ६.१३
मृङ् + णिच् 3-1-25
= मृ + इ 1-3-7, 1-3-3, 1-3-9
= मारि 7-2-115, 1-1-51, 3-1-32

मारि + लँट् 3-2-123
= मारि + मिप् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9, 3-4-78
= मारि + शप् + मिप् 3-1-68
= मारि + अ + मि 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
= मारे + अ + मि 7-3-84
= मारय् + अ + मि 6-1-78
= मारयामि 7-3-101

ञिभी भये ३.२
भी + णिच् 3-1-25
= भीषुँक् + णिच् 7-3-40
= भीषि 3-1-32
भीषि + लँट् 3-2-123
= भीषि + त 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9, 3-4-78, आत्मनेपदम् by 1-3-68
= भीषि + ते 3-4-79
= भीषि + शप् + ते 3-1-68
= भीषि + अ + ते 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
= भीषे + अ + ते 7-3-84
= भीषय् + अ + ते 6-1-78 = भीषयते

रावणस्य स्त्रियः रावणस्त्रियः 2-2-8
ताभिः रावणस्त्रीभिः

कृत आश्वास: यस्या सा = कृताश्वासा।
कृत सुँ आश्वास सुँ 2-2-24, 2-2-36
= कृत आश्वास 1-2-46, 2-4-71
= कृताश्वास 6-1-101
कृताश्वास + टाप् 4-1-4
= कृताश्वासा 1-3-7, 1-3-3, 6-1-101

नेत्रेण सङ्केतः नेत्रसङ्केतः 2-1-32
नेत्रसङ्केत आदिर्येषां तानि नेत्रसङ्केतादीनि (चेष्टनानि) 2-2-24
तैर्नेत्रसङ्केतादिभिः।

पुना रावणम् 8-3-14, 6-3-111

घोरा विकृता नाना (विविधाः) आकृतयो यासाम् = घोरविकृतनानाकाकृतयः 2-2-24, 6-3-34
ता घोरविकृतनानाकाकृतीः (द्वितीया-बहुवचनम्)।

रक्ष एव राक्षसः।
रक्षस् सुँ अण् (स्वार्थे) 5-4-38 प्रज्ञादिभ्यश्च।
= रक्षस् अण् 1-2-46, 2-4-71
= राक्षस् अ 1-3-3, 7-2-117
= राक्षस
स्त्रियाम् –
राक्षस + ङीप् 4-1-15
= राक्षस् + ई 1-3-8, 1-3-3, 1-4-18, 6-4-148
= राक्षसी

तर्जनं च सान्त्वनं च तर्जनसान्त्वने 2-2-29
तर्जनसान्त्वने आदी यस्य तत् = तर्जनसान्त्वनादि 2-2-24
तेन तर्जनसान्त्वनादिना

तर्जने उद्यतः तर्जनोद्यतः 2-1-40

तस्य पत्नी तत्पन्ती 2-2-8

वृतुँ वर्तने १. ८६२
वृत् + णिच् 3-1-26
= वर्ति 1-3-3, 1-3-7, 1-3-9, 7-3-86, 1-1-51, 3-1-32 धातु-सञ्ज्ञा
वर्ति + लँट् 3-2-123
= वर्ति + शप् + तिप् 3-1-68, 1-3-74 (1-3-87)
= वर्ति + अ + ति 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
= वर्ते + अ + ति 7-3-84
= वर्तय् + अ + ति 6-1-78 = वर्तयति
नि + वर्तयति = निवर्तयति 1-4-59, 1-4-80

अन्त:पुरे नियुक्ता = अन्त:पुरिका।
अन्त:पुर ङि + ठक् 4-4-69 तत्र नियुक्तः
= अन्त:पुर ङि + इक 1-3-3, 7-3-50
= अन्त:पुर + इक 1-2-46, 2-4-71. 7-2-117 should have applied, but “सञ्ज्ञापूर्वो विधिरनित्य:” इति वृद्धेरभाव:।
= अन्त:पुर् + इक 1-4-18, 6-4-148
= अन्त:पुरिक
स्त्रियाम् –
अन्त:पुरिक + टाप् 4-1-4 = अन्त:पुरिका 1-3-7, 1-3-3, 6-1-101

नापसर्तुमहं शक्या तस्य रामस्य धीमतः ।
विधिस्तव वधार्थाय विहितो नात्र संशयः ।। ५-२२-२१ ।।

“Being the consort of that wise Śrī Rāma, I was not capable of being wrested (by you). My abduction is (only) a device ordained (by Providence) for bringing your destruction : there is no doubt about it.”

शक्य 3-1-99

धीमत: 5-2-94
धीमतस्तस्य रामस्य – “भार्या” इति शेष:।

सृ गतौ १.१०८५
सृ + तुमुँन् 3-4-65. इण्-निषेध: by 7-2-10
= सर्तुम् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9, 7-3-84, 1-1-51
अपसर्तुम् 2-2-18

Compare गीता – 11-53, 11-54

वध एव अर्थः 2-1-57, तस्मै।

विधि: 3-3-92 उपसर्गे घोः किः, 6-4-64

विहित: 7-4-42 दधातेर्हिः।

त्रयोविंशः सर्गः

रावणयोजिता एकजटाद्या राक्षस्यो रावणं प्रशंसन्त्यः सीतां प्रति तत्स्वीकारं रोचयन्ते ।

“Extolling Ravaṇa, Ekajaṭā and other ogresses posted in the Aśoka grove coax her to accept his proposal.”

योजिता 6-4-52
रावणेन योजिताः रावणयोजिताः 2-1-32

एका जटा यस्याः सा एकजटा 2-2-24, 6-3-34, 1-2-48, 4-1-4
आदौ भवा = आद्या 4-3-54, 4-1-4
एकजटा आद्या यासां ताः = एकजाटाद्या: (राक्षस्य:) 2-2-24, 1-2-48, 4-1-4

शंसुँ स्तुतौ दुर्गतावपीत्येके १.८२९
शंसुँ + लँट् 3-2-123
शंसुँ + शतृँ 3-2-124
शंसुँ + शप् + शतृँ 3-1-68
शंस् + अ + अत् 1-3-8, 1-3-3, 1-3-2
शंसत् 6-1-97
स्त्रियाम् –
शंसत् + ङीप् 4-1-6
शंसत् + ई 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
शंसनुँम् त् + ई 6-1-85, 7-1-81, 1-1-47
शंसन्ती 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9
प्रकर्षेण शंसन्ती प्रशंसन्ती 2-2-18

स्वी 5-4-50, 7-4-32, 1-4-61
स्वी कृ + घञ् 3-3-18 = स्वीकार: 7-2-115, 1-1-51
तस्य स्वीकार: = तत्स्वीकार: 2-2-8, तम्।

साधु ते तत्वतो देवि कथितं साधु भामिनि ।
गृहाण सुस्मिते वाक्यमन्यथा न भविष्यसि ।। ५-२३-१९ ।।

“Accept cheerfully, O lovely lady with sweet smiles, the advice which has been tendered to you in good spirit and in accordance with facts; or else you shall die.”

सु (= शोभनम्) स्मितं यस्याः सा = सुस्मिता।
सु स्मित सुँ 2-2-24
सुस्मित 1-2-46, 2-4-71
सुस्मित + टाप् 4-1-4 = सुस्मिता 1-3-7, 1-3-3, 6-1-101

देवि, भामिनि, सुस्मिते are all सम्बुद्ध्यन्ताः (vocative singulars.)

साधु ते कथितम्, साधु गृहाण – इति साधुशब्दद्वयस्य निर्वाह:। (गोविन्दराज:)।

साधु has been used here as an adverb as per the वार्त्तिकम् under 2-4-18 क्रियाविशॆषणानां च क्लीबतेष्यते (कर्मत्वं चेष्यते)।

चतुर्विंशः सर्गः

राक्षसीभिस्तर्जिताऽपि दृढहृदया सीता शच्यरुन्धतीप्रमुखाः पतिव्रता दृष्टान्तीकृत्य मरणाप्तेरपि न मे परपुरुषपरिग्रहः स्यादित्यकातरं प्रतिभाषते । परुषभाषणैर्नानायुधोद्यमनैश्च राक्षसीभिर्भीष्यमाणां रुदतीं च सीतां शिंशपास्थो हनुमाञ्छृणोति ।

“Citing the examples of Śacī, Arundhatī and other devoted wives, even though threatened by the ogresses, Sītā with a stout heart boldly proclaims her resolve not to submit to anyone else than her own husband even on pain of death. Hanumān silently watches her being menaced by the ogresses by means of harsh words and show of weapons, and weeping.”

दृढं हृदयं यस्याः सा दृढहृदया
दृढ सुँ + हृदय सुँ 2-2-24
दृढहृदय 1-2-46, 2-4-71
स्त्रियाम् –
दृढहृदय + टाप् 4-1-4
= दृढहृदया 1-3-3, 1-3-7, 1-3-9, 6-1-101

शची च अरुन्धती च शच्यरुन्धत्यौ 2-2-29
शच्यरुन्धत्यौ प्रमुखे यासां ताः शच्यरुन्धतीप्रमुखाः
शच्यरुन्धती औ प्रुमखा औ 2-2-24
शच्यरुन्धतीप्रुमखा 1-2-46, 2-4-71, 1-2-48, 4-1-4
शच्यरुन्धतीप्रुमखा + शस् = शच्यरुन्धतीप्रुमखाः

अदृष्टान्तं दृष्टान्तं संपद्यमानं कृत्वा = दृष्टान्तीकृत्य

दृष्टान्त अम् च्विँ 5-4-50 = दृष्टान्त 1-3-7, 1-3-2, 6-1-67, 1-2-46, 2-4-71 = दृष्टान्ती 7-4-32, 1-1-52 then
दृष्टान्तीकृत्य 1-4-61, 2-2-18, 3-4-21, 7-1-37, 6-1-71, 1-1-40

मरणस्य आप्तिः मरणाप्तिः 2-2-8
तस्या: मरणाप्तेः (पञ्चमी-एकवचनम्)

परश्चासौ पुरुषश्च परपुरुषः 2-1-57
ग्रह् + अप् 3-3-58 (अपवादः to घञ्)
= ग्रह 1-3-3
परिग्रहः 2-2-18
परपुरुषस्य परिग्रहः = परपुरुषपरिग्रहः 2-2-8

परुषाणि च तानि भाषणानि परुषभाषणानि 2-1-57
तैः परुषभाषणैः

नाना (विविधानि) च तानि आयुधानि च नानायुधानि 2-1-57
नानायुधानाम् उद्यमनम् = नानायुधोद्यमनम् 2-2-8
तैः नानायुधोद्यमनैः

ञिभी भये ३.२
भी + णिच् 3-1-26
भीषुँक् + णिच् 7-3-40, 1-1-46
भीष् + इ = भीषि 3-1-32
भीषि + लँट् 3-2-123
भीषि + शानच् 3-2-124, 1-3-13, 1-4-100
भीषि + यक् + शानच् 3-1-67
भीषि + य + आन 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
भीष् + य + आन 6-4-51
भीष्यम् आन 7-2-82, 1-1-46
भीष्यमाण 8-4-2, 1-2-46
स्त्रियाम् –
भीष्यमाण + टाप् 4-1-4
भीष्यमाणा 1-3-3, 1-3-7, 1-3-9, 6-1-101

शिंशपायां तिष्ठति = शिंशपास्थ: 3-2-4, 6-4-64

verse 1:

मानुषं मांसमास्वाद्य नृत्यामोऽथ निकुम्भिलाम् ।
एवं निर्भर्त्स्यमाना सा सीता सुरसुतोपमा ।
राक्षसीभिर्विरूपाभिर्धैर्यमुत्सृज्य रोदिति ।। ५-२४-४७ ।।

“Having enjoyed human flesh, we shall then dance in the presence of Goddess Bhadrakālī installed in the western quarter of Laṅkā (known by the name of Nikumbhilā)”. Losing her patience while being threatened thus by the monstrous ogresses, the said Sītā, who resembled the daughter of a god, began to cry.

“निकुम्भिला नाम लङ्कायाः पश्चिमभागवर्तिनी भद्रकाली तां नृत्यामस्तत्समीपं गत्वा नृत्याम:।” तिलक-टीका।

मनोरपत्यम् = मनुष्यः। जाताविति वचनादिह अपत्यग्रहणं व्युत्पत्तिमात्रार्थम्।
मनुषुँक् ङस् + यत् 4-1-161, 1-1-46
मनुषुँक् + यत् 1-2-46, 2-4-71
मनुष्य 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9

मनुष्यस्य इदं मानुषम् (adjective to मांसम्)
मनुष्य ङस् + अण् 4-1-83, 4-3-120
= मनुष्य + अ 1-3-3, 1-2-46, 2-4-71
= मानुष्य + अ 7-2-117
= मानुष्य् + अ 1-4-18, 6-4-148
= मानुष् + अ 6-4-151
= मानुष

ष्वदँ आस्वादने १०.३३६
स्वद् + णिच् 3-1-25
= स्वादि 7-2-116, 3-1-32
स्वादि + क्त्वा 3-4-21
= आङ् स्वादि ल्यप् 1-4-60, 2-2-18, 7-1-37
= आ स्वादि य 1-3-8, 1-3-3
= आस्वाद्य 6-4-51

नृतीँ गात्रविक्षेपे ४.१०
नृत् + लँट् 3-2-123
= नृत् + तिप् 3-4-78
= नृत् + श्यन् + मस् 3-1-69. Note: Since the सार्वधातुक-प्रत्यय: “श्यन्” is अपित्, by 1-2-4 it behaves ङिद्वत् – as if it has ङकार: as a इत्। This allows 1-1-5 to prevent 7-3-86 from applying.
= नृत् + य + मस् 1-3-8, 1-3-3, 1-3-4
= नृत्यामः 7-3-101, 8-2-66, 8-3-15

भर्त्सँ सन्तर्जने १०.२०२
भर् त् स् + णिच् 3-1-25
= भर्त्सि 3-1-32
भर्त्सि + लँट् 3-2-123
= भर्त्सि + शानच् 3-2-124, 1-3-13
= भर्त्सि + यक् + शानच् 3-1-67
= भर्त्सि + य + आन 1-3-8, 1-3-3
= भर् त् स् + य + आन 6-4-51
= भर्त्स्यमाण 7-2-82, 1-1-46, 8-4-2
स्त्रियाम् –
भर्त्स्यमाण + टाप् = भर्त्स्यमाणा 4-1-4, 6-1-101

सुरस्य सुता सुरसुता 2-2-8
सुरसुता उपमा यस्याः सा सुरसुतोपमा 2-2-24, 1-2-48, 4-1-4

सृजँ विसर्गे
सृज् + क्त्वा 1-3-2, 3-4-21
= वि सृज् ल्यप् 2-2-18, 7-1-37
= विसृज्य 1-3-8, 1-3-3

रुदिँर् अश्रुविमोचने २.६२ (“इर्” gets the इत्-सञ्ज्ञा by the वार्त्तिकम् – इर इत्-सञ्ज्ञा वाच्या)
रुद् + लँट् 1-3-9, 3-2-123
= रुद् + तिप् 3-2-78
= रुद् + शप् + तिप् 3-1-68
= रुद् + तिप् 2-4-72
= रुद् + ति 1-3-3
= रुद् + इति 7-2-76 रुदादिभ्यः सार्वधातुके, 1-1-46
= रोदिति 7-3-86

पञ्चविंशः सर्गः

राक्षसीगणसन्तर्जनं सोढुमसमर्था जानक्यशोकशाखामालम्ब्य रामादीनाक्रोशन्त्यश्रुधाराभिराप्लुतनेत्रा प्ररोदिति ।

“Unable to endure the threats of the ogresses and calling aloud Śrī Rāma and others, Sītā bursts into a wail.”

राक्षसीनां गणः राक्षसीगणः 2-2-8
राक्षसीगणानां (2-3-65) सन्तर्जनम् = राक्षसीगणसन्तर्जनम् 2-2-8

षहँ मर्षणे १.९८८
सह् + तुमुँन् 6-1-64, 3-4-65
= सह् + तुम् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9. इड्-विकल्प: by 7-2-48
= सढ् + तुम् 8-2-31
= सढ् + धुम् 8-2-40
= सढ् + ढुम् 8-4-41
= स + ढुम् 8-3-13 (वचनसामर्थ्यात् ष्टुत्वस्य असिद्धत्त्वं न)
= सोढुम् 6-3-112 (वचनसामर्थ्यात् ढकारलोपस्य असिद्धत्त्वं न)

अशोकस्य शाखा अशोकशाखा 2-2-8
ताम् अशोकशाखाम्

लबिँ शब्दे अवस्रंसने च १. ४३९
लन्ब् 1-3-2, 7-1-58, 1-1-47
लन्ब् + क्त्वा 3-4-21
= आङ् लन्ब् ल्यप् 2-2-18, 7-1-37
= आलन्ब्य 1-3-8, 1-3-3
= आलम्ब्य 8-3-24, 8-4-58

राम आदिर्येषां ते = रामादय: 2-2-24, तान्।

क्रुशँ आह्वाने रोदने च १.९९२
क्रुश् + लँट् 3-2-123
क्रुश् + शतृँ 3-2-124
क्रुश् + शप् + शतृँ 3-1-68
क्रुश् + अ + अत् 1-3-8, 1-3-3, 1-3-2
क्रोश + अत् 7-3-86
क्रोशत् 6-1-97
स्त्रियाम् –
क्रोशत् + ङीप् 4-1-6
क्रोशत् + ई 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
क्रोशनुँम् त् + ई 6-1-85, 7-1-81, 1-1-47
क्रोशन्ती 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9
आक्रोशन्ती 2-2-18

आप्लुते नेत्रे यस्याः सा = आप्लुतनेत्रा 2-2-24

धिगस्तु खलु मानुष्यं धिगस्तु परवश्यताम् ।
न शक्यं यत् परित्यक्तुमात्मच्छन्देन जीवितम् ।। ५-२५-२० ।।

“Shame indeed be upon the human state and shame upon dependence on others, due to which it is not possible for me (even) to yield up life of my own (free) will !”

द्वितीया विभक्ति: in मानुष्यम् and परवश्यताम् is by the व्याख्यानम् under 2-3-2
उभसर्वतसोः कार्या धिगुपर्यादिषु त्रिषु।

मनुष्यस्य भाव: मानुष्यम् = मनुष्यत्वम्।
मनुष्य ङस् + ष्यञ् 5-1-124
= मनुष्य + य 1-2-46, 2-4-71, 1-3-3, 1-3-6
= मानुष्य + य 7-2-117
= मानुष्य् + य 1-4-18, 6-4-148
= मानुष्य 6-4-151

परेषां वश: = परवश:। 2-2-8
परवशं गत: = परवश्य:।
परवश अम् + यत् 4-4-86
= परवश + य 1-2-46, 2-4-71, 1-3-3
= परवश्य 1-4-18, 6-4-148

परवश्यस्य भावः परवश्यता 5-1-119, तां परवश्यताम्

यत् is a अव्ययम् here – stands for यस्मात् or यत्र (मनुष्यदेहे)

त्यजँ हानौ १.११४१
त्यज् + तुमुँन् 3-4-65. इण्-निषेध: by 7-2-10
= त्यज् + तुम् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9
= त्यग् + तुम् 8-2-30
= त्यक्तुम् 8-4-55
परित्यक्तुम् 2-2-18

आत्मनः छन्दः आत्मच्छन्दः 2-2-8, 8-2-7, 8-2-2, 6-1-73, 8-4-40
तेन आत्मच्छन्देन = आत्मेच्छया।

षड्विंशः सर्गः

राक्षसीभिस्तर्ज्यमाना जानकी मारणेऽपि नैवाहं तदङ्गीकारमनुमंस्ये इति प्रतिजानाना स्वनयनार्थं रामानागमने कारणानि विकल्पयन्ती बहुशो विलपति ।

“Making up her mind not to submit to the advances of Rāvaṇa even on pain of death, when menaced by the ogresses, and indulging in speculation as to why Śrī Rāma was not turning up to rescue her, Sītā wails in various ways.”

तर्जँ भर्त्सने १.२५९
तर् ज् + लँट् (कर्मणि) 3-2-123, 3-4-69
= तर् ज् + यक् + शानच् 3-1-67, 3-2-124
= तर् ज् + य + आन 1-3-3, 1-3-8
= तर् ज् + यमुँक् आन 7-2-82, 1-1-46
= तर् ज् + यम् आन 1-3-2, 1-3-3
= तर्ज्यमान
स्त्रियाम् –
तर्ज्यमान + टाप् 4-1-4
= तर्ज्यमाना 1-3-3, 1-3-7, 1-3-9, 6-1-101

मृङ् प्राणत्यागे ६.१३९
मृ + णिच् 3-1-26
= मारि 7-2-115, 1-1-51, 1-3-3, 1-3-7, 3-1-32
मारि + ल्युट् 3-3-115
= मारि + अन 7-1-1, 1-3-8, 1-3-3
= मार् + अन 6-4-51
= मारण 8-4-2, 1-2-46

“अङ्गी” इति च्व्यन्तमव्ययम्। तत्पूर्वात्कृञो भावे घञ्।
अनङ्गम् अङ्गं सम्पद्यते
अङ्ग सुँ + च्विँ 5-4-50
= अङ्ग च्विँ 1-2-46, 2-4-71
= अङ्ग 1-3-2, 1-3-7, 6-1-67
= अङ्गी 7-4-32

अङ्गी gets the गति-सञ्ज्ञा by 1-4-61 ऊर्यादिच्विडाचश्च and अव्यय-सञ्ज्ञा by 1-4-56 प्राग्रीश्वरान्निपाताः, 1-1-37 स्वरादिनिपातमव्ययम्।

अङ्गी कृ + घञ् 3-3-18, 2-2-18
= अङ्गी कृ + अ 1-3-8, 1-3-3
= अङ्गी कार् + अ 7-2-115, 1-1-51
= अङ्गीकार

तस्य अङ्गीकार: तदङ्गीकार: 2-2-8, तम्

मनँ ज्ञाने ४.७३
मन् + लृँट् 3-3-13
= मन् + इट् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9, 3-4-78
= मन् + ए 1-3-3, 1-3-9, 3-4-79
= मन् + स्य + ए 3-1-33
= मन् + स्ये 6-1-97
= मंस्ये 8-3-24
अनु + मंस्ये 1-4-59, 1-4-80

ज्ञा अवबोधने ९.४३
ज्ञा + लँट् 3-2-123
= ज्ञा + शानच् 3-2-124, 1-3-46, 1-4-100
= ज्ञा + श्ना + शानच् 3-1-81
= जा + श्ना + शानच् 7-3-79
= जा + ना + आन 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9. (मुँक् by 7-2-82 not applicable)
= जानान 6-1-101, 1-2-46
स्त्रियाम् –
जानान + टाप् 4-1-4 = जानाना 1-3-3, 1-3-7, 1-3-9, 6-1-101
प्रतिजानाना 2-2-18

कृपूँ सामर्थ्ये १.८६६
कृप् + णिच् 3-1-26
= कल्पि 7-3-86, 1-1-51, 1-3-3, 1-3-7, 3-1-32, 8-2-18
कल्पि + लँट् 3-2-123
= कल्पि + शतृँ 3-2-124, 1-3-88, 1-4-99, 1-4-100
= कल्पि + शप् + शतृँ 3-1-68
= कल्पे + अ + अत् 1-3-8, 1-3-3, 1-3-2, 7-3-84
= कल्पय् + अत् 6-1-78
= कल्पयत् 6-1-97
स्त्रियाम् –
कल्पयत् + ङीप् 4-1-6
= कल्पयत् + ई 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
= कल्पयनुँम्त् त् + ई 6-1-85, 7-1-81, 1-1-47
= कल्पयन्ती 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9
विकल्पयन्ती 2-2-18

गमॢँ गतौ १.११३७
गम् + ल्युट् (भावे) 3-3-115 = गमनम् 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9, 7-1-1
आङ् + गमनम् = आगमनम् 1-3-3, 1-3-9, 2-2-18
न आगमनम् अनागमनम् 2-2-6, 6-3-73, 6-3-74
रामस्य अनागमनम् = रामानागमनम् 2-2-8, 6-1-101. तस्मिन् रामानागमने

धन्याः खलु महात्मानो मुनयः सत्यसम्मताः ।
जितात्मानो महाभागा येषां न स्तः प्रियाप्रिये ।। ५-२६-४७ ।।

“Happy indeed are the magnanimous and highly blessed hermits by whom the (hightest) Reality has been fully recognized as their (very) self and who have subdued the self and in whose eyes the pleasing and the displeasing do not exist.”

महान् आत्मा येषां ते महात्मानः 2-2-24, 6-3-46

सत्यं (= ब्रह्म) सम्मतम् (आत्मत्वेन) येषां ते = सत्यसम्मता: 2-2-24, 2-2-37

जितः आत्मा यैः ते जितात्मानः 2-2-24

भजँ सेवायाम् १. ११५३
भज्यते इति भाग:। “भागो भाग्यैकदेशयो:।”
महान् भागो येषां ते = महाभागा: 2-2-24, 6-3-46

प्रियं च अप्रियं च प्रियाप्रिये 2-2-29

सप्तविंशः सर्गः

स्वापोद्बुद्धा त्रिजटा सीतां तर्जयन्ती राक्षसीः प्रति मयाद्य रामाभ्युदयरावणापकर्षसूचकः स्वप्नो दृष्टोऽतो निवर्तध्वं सीतातर्जनादिति ता अपसारयति । अथ ताभिः प्रार्थिता सा स्वप्नवृत्तं निवेद्य सीताविजयाशंसकं शुभशकुनं दर्शयति ।।


Risen from sleep, an ogress, Trijaṭā by name, speaks to her companions, intimidating Sītā, of a dream she saw only a few minutes before, revealing the triumph of Śrī Rāma and the discomfiture of Rāvaṇa, and stops them from molesting Sītā. Pressed by them, she relates the dream to them and also speaks of the omens portending the triumph of Sītā.

रामस्य अभ्युदयः रामाभ्युदयः 2-2-8, 6-1-101
रावणस्य अपकर्षः रावणापकर्षः 2-2-8, 6-1-101
रामाभ्युदयश्च रावणापकर्षश्च रामाभ्युदयरावणापकर्षौ 2-2-29

सूचयति इति सूचकः
सूचँ पैशुन्ये १०.४१२
सूच् + णिच् 3-1-25
= सूचि 3-1-32
सूचि + ण्वुल् 3-1-133
= सूचि + वु 1-3-7, 1-3-3, 1-3-9
= सूचि + अक 7-1-1
= सूच् + अक 6-4-51 = सूचक

रामाभ्युदयरावणापकर्षयोः सूचकः = रामाभ्युदयरावणापकर्षसूचकः 2-2-8

वृतुँ वर्तने १.८६२
वृत् + लोँट् 3-3-162
= वृत् + ध्वम् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9, 3-4-78
= वृत् + ध्वे 3-4-79
= वृत् + ध्वम् 3-4-91
= वृत् + शप् + ध्वम् 3-1-68
= वृत् + अ + ध्वम् 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
= वर् त् + अ + ध्वम् 7-3-86, 1-1-51
= वर्तध्वम्
नि + वर्तध्वम् = निवर्तध्वम् 1-4-59, 1-4-80

सृ गतौ १.१०८५
सृ + णिच् 3-1-26
सारि 7-2-115, 1-1-51, 1-3-3, 1-3-7, 1-3-9, 3-1-32

= सारि + लँट् 3-2-123
= सारि + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9, 3-4-78
= सारि + शप् + तिप् 3-1-68
= सारि + अ + ति 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
= सारे + अ + ति 7-3-84
= सारयति 6-1-78
अप + सारयति = अपसारयति 1-4-59, 1-4-80

स्वप्ने वृत्तं स्वप्नवृत्तम् 2-1-40/2-1-41

सीतायाः विजयः सीताविजयः 2-2-8
सीताविजयस्य आशंसकम् (adjective to स्वप्तवृत्तम्) = सीताविजयाशंसकम् 2-2-8

शुभं शकुनम् = शुभशकुनम् 2-1-57

कृष्यमाणः स्त्रिया मुण्डो दृष्टः कृष्णाम्बरः पुनः ।
रथेन खरयुक्तेन रक्तमाल्यानुलेपनः ।। ५-२७-२४ ।।

“He was seen (in a dream) once more with a shaven head and robed in black, wearing a red garland and smeared with red sandal-paste and being pulled by a woman on a chariot drawn by asses”

कृषँ विलेखने ६.६
कृष् + लँट् 1-3-2, 1-3-9, 3-2-123
= कृष् + शानच् 3-2-124, 1-3-13, 1-4-100
= कृष् + यक् + शानच् 3-1-67
= कृष्य + आन 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
= कृष्य मुँक् + आन 7-2-82, 1-1-46
= कृष्यमाण 8-4-2

स्त्रिया 6-4-79

कृष्णमम्बरं यस्य स कृष्णाम्बरः 2-2-24

खरैर्युक्तः खरयुक्तः 2-1-32
तेन खरयुक्तेन

लिपँ उपदेहे ६.१६९
लिप् + ल्युट् 3-3-117
लिप् + अन 1-3-8, 1-3-9, 7-1-1
लेपन 1-2-46
अनुलेपन 2-2-18

मालैव माल्यम् by वार्त्तिकम् – 5-1-124 वार्त्तिकम् – चातुर्वर्ण्यादीनां स्वार्थ उपसङ्ख्यानम्।
चत्वार एव वर्णाः चातुर्वर्ण्यम्। (गीता 4-13)
सुखमेव सौख्यम्। (सौख्यं वा?)

माल्यं च अनुलेपनं च माल्यानुलेपने 2-2-29
रक्ते (रक्तवर्णे) माल्यानुलेपने यस्य स: = रक्तमाल्यानुलेपनः 2-2-24

ref. गीता 11-11

अष्टाविंशः सर्गः

रावणराक्षसीगणविहितभर्त्सनतर्जनाद्यसहिष्णुः सीता बहु विलप्य यावद्वेण्युद्बन्धनेनासुमोक्षण उद्युङ्क्ते तावदननुभूतपूर्वः शुभशकुन आविरासीत् ।।


The moment Sītā, who was unable to bear the reproaches and threats of the ogresses, endeavors after wailing a good deal to strangle herself to death with the cord used for tying her hair, a propitious omen never seen before appears on her person.

सहिष्णुः 3-2-136

नूनं स कालो मृगरूपधारी मामल्पभाग्यां लुलुभे तदानीम् ।
यत्रार्यपुत्रौ विससर्ज मूढा रामानुजं लक्ष्मणपूर्वजं च ।। ५-२८-१० ।।

It was surely the Time-Spirit who, having assumed the form of a deer, beguiled me, a woman of scanty fortune (that I am), at that time and to whom I, a stupid woman, despatched the two sons of my father-in-law, Lakṣmaṇa (a younger half-brother of Śrī Rāma) and Śrī Rāma (the eldest half-brother of Lakṣmaṇa).”

मृगस्य रूपं मृगरूपम् 2-2-8
मृगरूपं धरतीति मृगरूपधारी

धृञ् धारणे १.१०४७
मृगरूप अम् + धृ णिनिँ 2-2-19, 3-2-78
= मृगरूप धृ इन् 1-3-7, 1-3-2, 1-3-9, 1-2-46, 2-4-71
= मृगरूप धार् इन् 7-2-115, 1-1-51
= मृगरूपधारिन्

मृगरूपधारिन् + सुँ 4-1-2 = मृगरूपधारी 6-4-13

अल्पं भाग्यं यस्याः सा = अल्पभाग्या 2-2-24, 4-1-4
तामल्पभाग्याम्

लुभँ विमोहने ६.२५ इति परस्मैपदिधातुः। “लुलुभे” इत्यत्र तङार्ष:।

सृजँ विसर्गे ६.१५०
= सृज् + लिँट् 3-2-115, 1-3-2
= सृज् + मिप् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9, 3-4-78
= सृज् + णल् 3-4-82
= सृज् + अ 1-3-7, 1-3-3, 1-3-9
= सृज् सृज् + अ 6-1-8, 1-1-59
= सर् ज् सृज् + अ 7-4-66, 1-1-51
= स सृज् + अ 7-4-60
= स सर् ज् + अ 7-3-86
= ससर्ज
वि + ससर्ज = विससर्ज 1-4-59, 1-4-80

अनु जातः इति अनुजः
= अनु + जन् ड 3-2-101
= अनु + जन् अ 1-3-7, 1-3-9
= अनु + ज् अ 6-4-143. डित्वसामर्थ्यादभस्यापि टेर्लोपः।
= अनुज

रामस्य अनुजः रामानुजः 2-2-8
तं रामानुजम्

पूर्वं जातः इति पूर्वजः (प्रक्रिया प्राग्वत्)
लक्ष्मणस्य पूर्वजः लक्ष्मणपूर्वजः 2-2-8
तं लक्ष्मणपूर्वजम्

तदानीम् 5-3-19, 5-3-1, 7-2-102

एकोनत्रिंशः सर्गः

कविः शुभशकुनान्निर्दिशति । पुरोपलब्धपुलकशकुनसाजात्यात्तेषां शुभत्वं निर्धारयन्ती सीता प्रहर्षमनुभवति ।।

The omens described. Concluding them to be auspicious from the thrill that ran through her body at their sight, Sītā experiences great joy.

शुभा: शकुनाः शुभशकुनाः 2-1-57
तान् शुभशकुनान्

दिशँ अतिसर्जने ६.३
दिश् + लँट् 3-2-123
= दिश् + तिप् 3-4-78
= दिश् + श + तिप् 3-1-77. 7-3-86 won’t apply due to 1-2-4, 1-1-5
= दिश् + अ + ति 1-3-8, 1-3-9
निर् दिशति 1-4-59, 1-4-80

पुरा उपलब्ध: = पुरोपलब्ध: 2-1-4 or 2-1-72
पुरोपलब्धपुलक: 2-1-57
पुरोपलब्धपुलक: च शकुनानि च = पुरोपलब्धपुलकशकुनानि 2-2-29

समाना जाति: यस्य स: = सजातिः 2-2-24, 6-3-84 (योगविभाग:)

सजातेः भावः साजात्यम्
सजाति ङस् + ष्यञ् 5-1-124
= सजाति य 1-2-46, 2-4-71, 1-3-6, 1-3-3, 1-3-9
= साजाति य 7-2-117
= साजात्य 1-4-18, 6-4-148

पुरोपलब्धपुलकशकुनानां साजात्यम् = पुरोपलब्धपुलकशकुनसाजात्यम् 2-2-8

तस्मात् पुरोपलब्धपुलकशकुनसाजात्यात् 2-3-25

निर्धारयन्ती derived similar to बोधयन्ती above.

तस्याः पुनर्बिम्बफलोपमोष्ठं स्वक्षिभ्रुकेशान्तमरालपक्ष्म ।
वक्त्रं बभासे सितशुक्लदंष्ट्रं राहोर्मुखाच्चन्द्र इव प्रमुक्तः ।। ५-२९-७ ।।


Again, her countenance with its lips resembling a (ripe) Bimba fruit (in color) and its beautiful eyes, shapely brows, lovely locks, curved eyelashes and set white teeth shone like the (full) moon released from the mouth of (the demon) Rahu.

बिम्बं च तत् फलं च बिम्बफलम् 2-1-57
बिम्बफलम् उपमा यस्य स बिम्बफलोपमः (adjective to ओष्ठः) 2-2-24, 1-2-48
बिम्बफलोपमौ ओष्ठौ यस्मिन् = बिम्बफलोपमोष्ठम् (वक्त्रम्) 2-2-24

सु (= शोभने) अक्षिणी भ्रुवौ केशान्ता: (अलका:) च यस्मिन् = स्वक्षिभ्रुकेशान्तम् (वक्त्रम्) 2-2-24, 6-3-61

अरालानि (= वक्राणि) पक्ष्माणि यस्मिन् = अरालपक्ष्म (वक्त्रम्) 2-2-24

सिता: (= स्वच्छा: अथवा नीरन्धत्वेन संसक्ता:) शुक्लदंष्ट्रा: यस्मिन् = सितशुक्लदंष्ट्रम् (वक्त्रम्) 2-2-24

षिञ् बन्धने ५. २, ९. ५

सि + क्त 6-1-64, 3-2-102, 1-1-26
= सित 1-3-8, 1-3-9. 7-2-10 stops 7-2-35.

भासृँ दीप्तौ १.७११
भास् + लिँट् 3-2-115, 1-3-2
= भास् + त 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9, 3-4-78, 1-3-12
= भास् + एश् 3-4-81, 1-1-55
= भास् + ए 1-3-3, 1-3-9
= भास् भास् + ए 6-1-8
= भा भास् + ए 7-4-60
= भ भास् + ए 7-4-59
= ब भास् + ए 8-4-54
= बभासे

मुचॢँ मोचने ६.१६६
मुच् + क्त 3-2-102, 1-1-26
= मुच् + त 1-3-8, 1-3-9. 7-2-10 stops 7-2-35. 1-1-5 stops 7-3-86.
= मुक्त 8-2-30

त्रिंशः सर्गः

प्रत्यक्षदर्शनेनावगतसकलसीतावृत्तः शिंशपास्थ एव हनुमान्सीतायाः समाश्वासनानाश्वासनयोर्गुणदोषौ विमृशन्समुचितसमये समाश्वासनमेवावश्यं कार्यमिति निश्चिनोति ।।

Weighing the pros and cons of comforting Sītā or remaining mum, now that he had come to know everything about Sītā at first hand, Hanumān decides upon the former course at the psychological moment.

अक्षि अक्षि (2-3-8) प्रति = प्रत्यक्षम्‌।
प्रति + अक्षि अम् 2-1-6 (यथार्थे – वीप्सार्थे), 1-4-90, 2-3-8, 1-2-43, 2-2-30
= प्रति + अक्षि 1-2-46, 2-4-71
= प्रत्यक्षि 6-1-77
= प्रत्यक्षि + टच् 5-4-107 गणसूत्रम् – प्रतिपरसमनुभ्योऽक्ष्ण:।
= प्रत्यक्षि + अ 1-3-3, 1-3-7
= प्रत्यक्ष 1-4-18, 6-4-148
प्रत्यक्ष + सुँ 4-1-2
= प्रत्यक्ष + अम् 2-4-83
= प्रत्यक्षम् 6-1-107

प्रत्यक्षं दर्शनम् प्रत्यक्षदर्शनम् 2-1-4 or 2-1-72
तेन प्रत्यक्षदर्शनेन

सीतायाः वृत्तम् = सीतावृत्तम् 2-2-8
सकलं च तत् सीतावृत्तम् = सकलसीतावृत्तम् 2-1-57
अवगतं सकलसीतावृत्तं येन स: = अवगतसकलसीतावृत्तः 2-2-24

शिंशपायां तिष्ठति = शिंशपास्थ: 3-2-4, 6-4-64

न आश्वासनम् = अनाश्वासनम् 2-2-6, 6-3-73, 6-3-74
समाश्वासनं च अनाश्वासनम् = समाश्वासनानाश्वासने 2-2-29
तयोः समाश्वासनानाश्वासनयोः

गुणश्च दोषश्च गुणदोषौ 2-2-29

विमृशति इति विमृशन्
मृशँ आमर्शने ६.१६१
मृश् + लँट् 3-2-123
= मृश् + शतृँ 3-2-124
= मृश् + श + शतृँ 3-1-77
= मृश् अ अत् 1-3-2, 1-3-8 (7-3-86 is stopped by 1-1-5 because the श-प्रत्यय: is ङिद्वत् by 1-2-4)
= मृशत् 6-1-97, 1-2-46
वि + मृशन् = विमृशन् 2-2-18

ref. गीता 18-63

समुचितश्चासौ समयश्च = समुचितसमयः 2-1-57
तस्मिन् समुचितसमये

कृ + ण्यत् 3-1-124
= कार्य 7-2-115, 1-1-51, 1-3-3, 1-3-7, 1-3-9, 1-2-46

निस् + चिनोति = निश्चिनोति 1-4-59, 1-4-80, 8-2-66, 8-3-15, 8-3-34, 8-4-40

ओ३म्
सुन्दरकाण्डम्

Here we will use a selection of verses from each chapter in the सुन्दरकाण्डम् of श्रीमद्वाल्मीकि-रामायणम्। The English translation is from the GitaPress book.

Saturday, March 26, 2011

प्रथमः सर्गः

Summary: सीतामन्वेष्टुं लङ्कां जिगमिषुर्हनुमान् महेन्द्रशिखरादुत्प्लुत्य जलमध्यादुद्गत्य स्वशिखरे विश्राममर्थयमानं मैनाकं करतलसंस्पर्शनेन संमान्य देवैः प्रेषितां निट्चरीरूपधारिणीं सुरसां मुखं व्यादाय ग्रसितुं प्रतिपालयन्तीं धृतसूक्ष्मरूपस्तदुदरं प्रविश्यापि अहिंसित्वैव बहिर्निरगच्छत् । तथैव सिंहिकाख्यनिट्चरीं मुखं व्यादाय ग्रसितुं प्रतिपालयन्तीं स्वीकृतसूक्ष्मदेहस्तदुदरं प्रविश्य विदारणपूर्वकं व्यापादयत् । अथ च राक्षसजनसंभ्रमं वारयिष्यन्निजदेहं तनूकृत्य लङ्काबहिःस्थगिरिशिखरे न्यपतत्।

“Desirous of reaching Laṅkā in order to discover Sītā, Hanumān takes a leap from a peak of Mount Mahendra and honoring with the touch of his hand Mount Maināka, which rose from the bottom of the sea to provide rest on its peak to Hanumān, encounters Surasā (mother of Nāgas), sent by the gods in the form of an ogresswho was waiting for Hanumān with her mouth open to devour him—enters her belly assuming a minute form and comes out without killing her. Further he is met by another ogress, Siṁhikā by name, standing with her mouth wide open to gulp Hanumān. He enters her mouth after assuming a minute form and comes out after splitting her belly open and killing her. Then contracting his body into a minute form again in order to preclude the fear of the ogres, he descends on a mountain peak outside Laṅkā.”

जिगमिषु: 3-1-7, 7-2-58, 6-1-9, 7-4-79, 3-2-168

उत्प्लुत्य 6-1-71 “तुँक्”

सम्मान्य 6-4-51

Saturday, April 9, 2011

निट्चरी 3-2-16, 4-1-15

आ + ख्या + अङ् 3-3-106 = आ ख्य् अ 6-4-64 = आख्य + टाप् 4-1-4 = आख्या 6-1-101

सिंहिका आख्या यस्या: सा = सिंहिकाख्य 1-2-48 = सिंहिकाख्या 4-1-4, 6-1-101

सिंहिकाख्यनिट्चरी 6-3-42

पालयन्ती 4-1-6, 7-1-81

स्वीकृत 5-4-50, 7-4-32, 1-4-61, 2-2-18

पद् + णिच् 3-1-26 = पादि 7-2-116, by 3-1-32 धातु-सञ्ज्ञा

अपादयत् 3-2-111, 3-4-78, 3-4-100, 3-1-68, 7-3-84, 6-1-78, 6-4-71

वि दॄ + णिच् 3-1-26 = वि दारि 7-2-115, 1-1-51

विदारणम् 3-3-115, 7-1-1, 6-4-51, 8-4-2

तनूकृत्य 5-4-50, 7-4-26

वारयिष्यत् 3-2-127, 3-3-14

लङ्काबहि:स्थ 3-2-4, 6-4-64

verse1:
ततो रावणनीतायाः सीतायाः शत्रुकर्षणः ।
इयेष पदमन्वेष्टुं चारणाचरिते पथि ।। ५-१-१।।

“In order to discover the whereabouts of Sītā, who had been taken away by Rāvaṇa, Hanumān (the scourge of his foes) wished to course through the heavens (the path of the Cāraṇas or celestial bards).”

इष् + णल् 3-4-82 = इ एष् अ 1-1-59, 6-1-8, 7-4-60 = इय् एष 6-4-78

रावणनीता 2-1-32

कर्शन:/कर्षण: 3-1-134, 7-1-1, 7-3-86, 1-1-51, 8-4-2

Saturday, April 23, 2011

verse 2:
एवमुक्तः कपिश्रेष्ठस्तं नगोत्तममब्रवीत् ।
प्रीतोऽस्मि कृतमातिथ्यं मन्युरेषोऽपनीयताम् ।। ५-१-१३०।।

“Spoken to as above (by Maināka), Hanumān (the foremost of monkeys) replied (as follows) to the aforesaid jewel among mountains: – I am pleased (with you) and homage has been done (by you in the form of kind words). Let this sad thought that your hospitality has not been accepted by me be banished (from your mind).”

ब्रू + लँङ् 3-2-111 = ब्रू + त् 3-4-78, 3-4-100 = ब्रू + त् 3-1-68, 2-4-72, 1-1-63 = ब्रू + ईत् 7-3-93 = अ ब्रव् ईत् 7-3-84, 6-1-78, 6-4-71

उक्त 7-2-10, 6-1-15, 6-1-108, 8-2-30

(अप) नी + लोँट् (कर्मणि) = नी ताम् 3-4-78, 3-4-79, 3-4-90 = नी य ताम् 3-1-67

आतिथ्यम् 5-4-26, 1-3-7, 7-2-117, 1-4-18, 6-4-148

verse 3:
प्रविष्टोऽस्मि हि ते वक्त्रं दाक्षायणि नमोऽस्तु ते ।
गमिष्ये यत्र वैदेही सत्यश्चासीद् वरस्तव ।। ५-१-१६९ ।।

“Indeed I have entered your mouth and the boon granted to you has been honored. My salutation be to you, O daughter of Dakṣa! I shall (now) move to the place where Sītā (a princess of the Videha territory) is.”

अस् + लँङ् 3-2-111 = अस् + त् 3-4-78, 3-4-100 = अस् + त् 3-1-68, 2-4-72 = अस् + ईत् 7-3-96 = आ अस् + ईत् 6-4-72 then 6-1-90

‘प्रविष्ट’ 3-4-72 active

verse 4:
हृतहृत्सा हनुमता पपात विधुराम्भसि ।
स्वयम्भुवैव हनुमान् सृष्टस्तस्या निपातने ।। ५-१-१९८ ।।

“With her heart (the very seat of her life) torn asunder by Hanumān, she fell down dead into the water. Hanumān was created as an instrument for her destruction by the self-born creator himself.”

स्वयम्भू + टा = स्वयम्भुवा 6-4-77

पपात 3-4-78, 3-4-82, 6-1-8, 7-4-60, 7-2-116

Saturday, May 14, 2011

verse 5:
ततस्तु सम्प्राप्य समुद्रतीरं समीक्ष्य लङ्कां गिरिवर्यमूर्ध्नि ।
कपिस्तु तस्मिन् निपपात पर्वते विधूय रूपं व्यथयन्मृगद्विजान् ।। ५-१-२१२ ।।

“Duly reaching the seashore and perceiving from there Laṇkā perched on a summit of the Trikūṭa mountain (the foremost of mountains), the monkey for his part descended on that mountain (Trikūṭa), abandoning his (assumed colossal) form and agitating the beasts and birds (inhabiting that mountain with his gigantic monkey form).”

मूर्ध् अन् + ङि (इ 1-3-8) = मूर्धनि/मूर्ध्नि 6-4-136 – गीता 8-12

व्यथ् + णिच् 3-1-26 = व्यथि 7-2-116, 6-4-92, 3-1-32
व्यथि + लँट् 3-2-123 = व्यथि + शतृँ 3-2-124, 1-3-74 = व्यथि + शप् + शतृँ 3-1-68 = व्यथे + अ + अत् 7-3-84 = व्यथय् + अ + अत् 6-4-78 = व्यथयत् 6-1-97

द्वितीयः सर्गः

Summary: रक्षोगणपरिरक्षितलङ्काया दुष्प्रवेशत्वं विचिन्तयन्हनुमान्देहं संकोचयंश्चन्द्रोदयसमये तां प्रविवेश ।

“Reflecting on the difficulty of penetrating into Laṇkā, which was strongly guarded by ogres, Hanumān further contracts his body and enters it at moonrise.”

संकोचयन् + चन्द्रोदयसमये = संकोचयंश्चन्द्रोदयसमये 8-3-7, 8-3-4, 8-3-15, 8-3-34, 8-4-40

दुस् + प्रविश् + खल् (अ 1-3-8, 1-3-3) 3-3-126 = दुस् + प्रवेश् + अ 7-3-86 = दु: + प्रवेश् + अ 8-2-66, 8-3-15 = दुष् + प्रवेश् + अ 8-3-41

दुष्प्रवेशत्वम् use 5-1-119 for त्व-प्रत्ययः

विवेश 3-4-78, 3-4-82, 6-1-8, 7-4-60, 7-3-86

verse 1:
पालितां राक्षसेन्द्रेण निर्मितां विश्वकर्मणा ।
प्लवमानामिवाकाशे ददर्श हनुमान् कपिः ।। ५-२-२० ।।

“(Nay) the monkey, Hanumān, beheld the city constructed by Viśwakarmā (the architect of gods) and protected by Rāvaṇa (the king of the ogres) as though it was sailing in the air.”

ददर्श 3-4-78, 3-4-82, 6-1-8, 7-4-60, 7-4-66, 1-1-51, 7-4-60, 7-3-86, 1-1-51

पा (रक्षणे) + णिच् 3-1-26 = पालि 7-3-37 वा., 3-1-32

पाल् + णिच् 3-1-25 = पालि 3-1-32

पालि त 3-2-102 = पालि इत 7-2-35 = पाल् इत 6-4-52

मित 7-4-40

प्लु + शानच् 3-2-123, 3-2-124 = प्लु + शप् + शानच् 3-1-68 = प्लव् अ आन 7-3-84, 6-1-78 then use 7-2-82

Saturday, May 28, 2011
verse 2:
तदहं स्वेन रूपेण रजन्यां ह्रस्वतां गतः ।
लङ्कामभिपतिष्यामि राघवस्यार्थसिद्धये ।। ५-२-४६ ।।

“Therefore, reduced to a small size, I shall penetrate into Laṇkā by night in my own form for carrying through the purpose of my master.”

व्यथ् + णिच् (3-1-26) = व्याथ् इ 7-2-116 = व्यथि 6-4-92, 3-1-32

तत् – निपात: – चादिगण: (आकृति-गण:) – 1-1-37 अव्ययम्

गम् + क्त 3-2-102, 1-1-26 = गत 6-4-37, 3-4-72 active voice

ह्रस्व + ङस् + तल् 5-1-119 = ह्रस्व + तल् 1-2-46, 2-4-71 = ह्रस्वता 1-3-3, 4-1-4, 6-1-101

पत् + लृँट् 3-3-13 = पत् + इ स्य + मि 3-4-78, 3-1-33, 7-2-35 = पतिष्यामि 7-3-101, 8-3-59

verses 3 & 4:
प्रदोषकाले हनुमांस्तूर्णमुत्पत्य वीर्यवान् ।
प्रविवेश पुरीं रम्यां सुविभक्तमहापथाम् ।। ५-२-५० ।।

प्रासादमालाविततां स्तम्भैः काञ्चनसंनिभैः ।
शातकुम्भनिभैर्जालैर्गन्धर्वनगरोपमाम् ।। ५-२-५१ ।।

“Springing up quickly at eventide, the powerful Hanumān proceeded to penetrate deep into the lovely city, whose highways had been symmetrically aligned, which was filled with rows of mansions, and with its golden pillars and golden lattice windows looked like the city of Gandharvas.”

विश् + लिँट् 3-4-115 = विश् + णल् (अ 1-3-7, 1-3-3) 3-4-78, 3-4-82 = वि वेश् अ 6-1-8, 7-4-60, 7-3-86

रम्य 3-1-98

सुविभक्तमहापथा 6-3-46, 5-4-74, 1-4-18, 7-1-88, 4-1-4, 6-1-101

नि भा क (अ 1-3-8) 3-1-136, 3-4-67 = नि भ् अ 6-4-64

Saturday, June 11, 2011

तृतीयः सर्गः

Summary: निशि लङ्कां प्रविशन्तं हनुमन्तं लङ्काभिमानिनी महाराक्षसी प्रत्यक्षीभूय पाणितलेनाभिहत्य प्रत्यषेधत्। अथो हनुमता नारीति वाममुष्टिना मन्दं ताडिताऽपि विह्वला कपिना त्वयि पराजितायां लङ्काविनाशसमयः संप्राप्त इति विद्धीति ब्रह्मणो वचो निवेदयन्ती पुरःप्रवेशमन्वजानात्।

“Appearing in person before Hanumān, while he was making his way into Laṇkā at night, the mighty ogress presiding over the city stops him, striking him with the palm of her hand. Getting unnerved, even though gently smitten with his left fist by Hanumān – thinking “she is a woman”, she permits the monkey to enter, repeating the words of Brahmā (the creator) that the destruction of Laṇkā should be concluded as imminent when she is overpowered by a monkey.”

निशा + ङि 4-1-2 = निश् + इ 6-1-63, 1-3-8
विश् + श (अ 1-3-8) + शतृँ 3-2-124, 3-1-77 = विशत् 1-2-4, 1-1-5, 6-1-97

लङ्काभिमान + इनिँ (इन् 1-3-2) 5-2-115 = लङ्काभिमान् + इन् 1-4-18, 6-4-148, 1-1-52 then use 4-1-5

महाराक्षसी 6-3-46, 1-1-52, 6-1-101

प्रत्यक्ष सुँ च्विँ 5-4-50 = प्रत्यक्ष 1-3-7, 1-3-2, 6-1-67, 1-2-46, 2-4-71 = प्रत्यक्षी 7-4-32, 1-1-52 then
प्रत्यक्षीभूय 1-4-61, 2-2-18, 3-4-21, 7-1-37

अभिहन् य 3-4-21, 7-1-37 = अभिह य 6-4-38 = अभिहत् य 6-1-71 – गीता 1-36

प्रति + असेध् अ त् 6-1-64, 3-2-111, 3-4-78, 3-4-100, 3-1-68, 7-3-86, 6-4-71 then use 8-3-63
मन्दम् used adverbially 2-4-18 वा.

तडँ आघाते १०. ६४ |
तड् + णिच् (इ 1-3-7, 1-3-3) 3-1-25 = ताडि 3-1-32, 7-2-116
ताडि + क्त 3-2-102, 1-1-26, 3-4-70 = ताडि + इत 1-3-8, 7-2-35 then use 6-4-52 then 4-1-4, 6-1-101

त्वयि पराजितायाम् – सप्तमी by 2-3-37 (सत्सप्तमी)

सम्प्राप्त – कर्तरि क्त: 3-4-72

विद् + सिप् 3-4-78, 3-1-68, 2-4-72 = विद्धि 3-4-87, 6-4-101

नि वेदि 3-1-26, 7-3-86
वेदि + शप् + शतृँ 3-2-124, 3-1-68 = वेदय अत् 7-3-84, 6-1-78 = वेदय अत् ङीप् 4-1-6 then use 7-1-81

अनु अजानात् 3-2-111, 3-4-100, 3-1-81, 7-3-79, 6-4-71

Saturday, June 25, 2011

verse 1:
ततः कृत्वा महानादं सा वै लङ्का भयंकरम्।
तलेन वानरश्रेष्ठं ताडयामास वेगिता ।। ५-३-३८ ।।

“Raising a loud and frightful cry, Laṇkā then actually struck with impetuosity that jewel among the monkeys with the palm of her hand.”

कृत्वा 3-4-21

महांश्चासौ नादश्च = महानाद:
महत् सुँ नाद सुँ 2-1-57, 1-2-43, 2-2-30
= महत् नाद 1-2-46, 2-4-71
= महआ नाद 6-3-46
= महानाद 6-1-101

भयं करोति इति भयंकर:
भय अम् कृ खच् 2-2-19, 3-1-92, 3-2-43 (default would have been 3-2-1)
= भय कृ अ 1-2-46, 2-4-71, 1-3-8, 1-3-3
= भय कर् अ 7-3-84, 1-1-51
= भयमुँम् कर 6-3-67, 1-1-47
= भयम् कर 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9
Then use 8-3-23, 8-4-59 to get भयंकर:, भयङ्कर:।

वानराणां श्रेष्ठ: = वानरश्रेष्ठ: 2-2-8, 1-2-43, 2-2-30

तडँ आघाते १०. ६४
तड् + णिच् 3-1-25
= ताडि 7-2-116, धातु-सञ्ज्ञा by 3-1-32
ताडि + लिँट् 3-2-115
= ताडि + आम् + लिँट् 3-1-35
= ताडय् + आम् + लिँट् 6-4-55 (otherwise 6-4-51 would have applied)
= ताडयाम् 2-4-81
= ताडयाम् सुँ 3-1-93, 1-1-62, 1-2-46, 4-1-2
= ताडयाम् 2-4-81
= ताडयाम् अस् लिँट् 3-1-40
= ताडयाम् अस् णल् 1-3-2, 1-3-3, 3-4-78, 3-4-82
= ताडयाम् अस् अ 1-3-7, 1-3-3
= ताडयाम् अस् अस् अ 1-1-59, 6-1-8
= ताडयाम् अ अस् अ 7-4-60
= ताडयाम् आ अस् अ 7-4-70
= ताडयाम् आ आस् अ 7-2-116
= ताडयामास 6-1-101

वेगिता = सञ्जातवेगा
वेग + सुँ + इतच् 5-2-36
= वेग + इत 1-3-3, 1-2-46, 2-4-71
= वेगित 1-4-18, 6-4-148
वेगित + टाप् 4-1-4 = वेगिता 1-3-7, 1-3-3, 6-1-101

verse 2:
स्त्री चेति मन्यमानेन नातिक्रोधः स्वयं कृतः।
सा तु तेन प्रहारेण विह्वलाङ्गी निशाचरी।
पपात सहसा भूमौ विकृताननदर्शना ।। ५-३-४१ ।।

“No violent anger, however, was exhibited by him of his own accord, inasmuch as he looked upon her as a woman. Her limbs having been overpowered by that blow, that ogress fell precipitately to the ground, displaying her ugly features.”

मनँ ज्ञाने ४. ७३
मन् + लँट् 3-2-123
= मन् + शानच् 3-2-124, 1-4-100
= मन् + श्यन् + शानच् 3-1-69
= मन् य + आन 1-3-8, 1-3-3
= मन् यमुँक् + आन 7-2-82, 1-1-46
= मन् यम् + आन 1-3-2, 1-3-3

विह्वलानि अङ्गानि यस्या: सा = विह्वलाङ्गी
विह्वल जस् अङ्ग जस् 2-2-24, 2-2-35
= विह्वल अङ्ग 1-2-46, 2-4-71
= विह्वलाङ्ग 6-1-101
विह्वलाङ्ग + ङीष् 4-1-54 वार्त्तिकम् – “अङ्गगात्रकण्ठेभ्य इति वक्तव्यम्।”
= विह्वलाङ्ग + ई 1-3-8, 1-3-3
= विह्वलाङ्गी 1-4-18, 6-4-148

निशायां चरति इति निशाचरी
निशा ङि चर् ट 2-2-19, 3-1-92, 3-2-16
= निशा चर् अ 1-3-7, 1-2-46, 2-4-71
निशाचर + ङीप् 4-1-15
= निशाचर + ई 1-3-8, 1-3-3
= निशाचर् + ई 1-4-18, 6-4-148

पतॢँ गतौ १. ९७९
पत् + लिँट् 3-2-115
= पत् + णल् 1-3-2, 1-3-3, 3-4-78, 3-4-82
= पत् + अ 1-3-7, 1-3-3
= पत् पत् अ 1-1-59, 6-1-8
= प पत् अ 7-4-60
= प पात् अ 7-2-116

विकृताननम् – कर्मधारय-समास:
विकृत सुँ आनन सुँ 2-1-57, 1-2-43, 2-2-30
= विकृतानन 1-2-46, 2-4-71, 6-1-101
विकृताननं दर्शयति = विकृताननदर्शना
दृश् + णिच् 3-1-26 = दर्शि 1-3-7, 1-3-3, 7-3-86, 1-1-51, 3-1-32
विकृतानन ङस् दर्शि ल्यु 3-1-134, 2-3-65
= विकृतानन दर्शि अन 1-2-46, 2-4-71, 1-3-8, 7-1-1
= विकृतानन दर्श् अन 6-4-51
विकृताननदर्शन + टाप् 4-1-4
= विकृताननदर्शन + आ 1-3-7, 1-3-3 = विकृताननदर्शना 6-1-101

verse 3:
यदा त्वां वानरः कश्चिद् विक्रमाद् वशमानयेत् ।
तदा त्वया हि विज्ञेयं रक्षसां भयमागतम् ।। ५-३-४७ ।।

“Surely at the time when some monkey subdues you by dint of his prowess, destruction of the ogres should be concluded by you to be imminent.”

ज्ञा + यत् 3-1-97 = ज्ञा य 1-3-3 = ज्ञी य 6-4-65 = ज्ञेय 7-3-84

गम् + क्त 3-2-102, 1-1-26, 3-4-72
= ग + त 1-3-8, 7-2-10, 6-4-37

Saturday, July 09, 2011

चतुर्थः सर्गः

Summary: लङ्कायां प्रविशन्हनुमान्नगरान्तर्वाद्यमाननानावादित्रादि शृण्वन्‌ननेकविधायुधधारिमूलबलं विलोकयंश्चान्तःपुरमाविवेश।
“Entering Laṇkā and hearing the music of various instruments being played upon inside, and also observing the enemy’s forces armed with various weapons, Hanumān finds his way into the royal gynaeceum.”

विशँ प्रवेशने ६. १६०

विश् + लँट् 3-2-123 = विश् + शतृँ 3-2-124
= विश् + श + शतृँ 3-1-77 = विश् अ अत् 1-3-2, 1-3-8 (7-3-86 is stopped by 1-1-5 because the श-प्रत्यय: is ङिद्वत् by 1-2-4)
= विशत् 6-1-97

प्रविशत् + सुँ 4-1-2 = प्रविश नुँम् त् + सुँ 7-1-70, 1-1-47
= प्रविशन्त् स् 1-3-2, 1-3-3 = प्रविशन्त् 6-1-68
= प्रविशन् 8-2-23 (after this 8-2-7 cannot apply because of 8-2-1.)

Similarly,

श्रु श्रवणे १. १०९२

श्रु + लँट् 3-2-123 = श्रु + शतृँ 3-2-124
= शृ + श्नु + शतृँ 3-1-74 = शृ नु अत् 1-3-2, 1-3-8 (1-1-5 prevents 7-3-84 from acting on the ऋकार: of “शृ” because the श्नु-प्रत्यय: is ङिद्वत् by 1-2-4. Similarly, 1-1-5 prevents 7-3-84 from acting on the उकार: of “श्नु” because the शतृँ-प्रत्यय: is ङिद्वत् by 1-2-4.)
= शृन्वत् 6-4-87
= शृण्वत् by वार्त्तिकम् (under 8-4-1) – ऋवर्णान्नस्य णत्वं वाच्यम्।

शृण्वन् is पुंलिङ्गे प्रथमा-एकवचनम् – steps are similar to those for प्रविशन् shown above.

Similarly,

लोकृँ – [भाषार्थः]१०. ३०७

लोक् + णिच् 3-1-25 = लोक् + इ 1-3-7, 1-3-3 = लोकि 3-1-32
लोकि + लँट् 3-2-123 = लोकि + शतृँ 3-2-124
= लोकि + शप् + शतृँ 3-1-68 = लोकि अ अत् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-8
= लोके अ अत् 7-3-84 = लोकय् अ अत् 6-1-78
= लोकयत् 6-1-97

विलोकयन् is पुंलिङ्गे प्रथमा-एकवचनम् – steps are similar to those for प्रविशन् shown above.
ref. गीता 6-13

नगरे अन्तर् = नगरान्तर् 2-1-40, 1-2-43, 2-2-30 (meaning is नगरमध्ये)

वदँ व्यक्तायां वाचि १. ११६४

वद् + णिच् 3-1-26 = वादि 1-3-7, 1-3-3, 7-2-116, 3-1-32

वादि + लँट् (कर्मणि) 3-2-123, 3-4-69 = वादि + शानच् 3-2-124, 1-3-13, 1-4-100
= वादि + यक् + शानच् 3-1-67
= वाद् + य + आन 6-4-51, 1-3-3, 1-3-8
= वाद्यम् आन 7-2-82, 1-1-46, 1-3-2, 1-3-3

नाना is an अव्ययम् by 1-1-37. Used in गीता 1-9

वाद्यते तद् वादित्रम्
वादि + णित्रन् (उणादि-सूत्रम् 4-172 भूवादिगॄभ्यो णित्रन्)
= वादि इत्र 1-3-7, 1-3-3
= वाद् इत्र 6-4-51 = वादित्र

डुधाञ् धारणपोषणयोः
वि धा + अङ् 3-3-106 = वि ध् अ 1-3-3, 6-4-64
= विध + टाप् 4-1-4 = विध आ 1-3-7, 1-3-3 = विधा 6-1-101

अनेक 2-2-6, 6-3-73, 6-3-74

युधँ सम्प्रहारे ४. ६९
आ युध्यन्ते अनेन इति आयुधम्। अमरकोश: २-८-८२॥
घञर्थे कविधानं स्थास्नापाव्यधिहनियुध्यर्थम्। वार्त्तिकम् under 3-3-58.
(Similarly विहन्यन्ते अस्मिन् इति वघ्न:)

अनेका: विधा: येषाम् तानि अनेकविधानि आयुधानि
अनेका जस् विधा जस् 2-2-24
= अनेका विधा 1-2-46, 2-4-71
= अनेक विधा 6-3-34
= अनेकविध 1-2-48

धृञ् धारणे १. १०४७
आयुध शस् धृ + णिनिँ 2-2-19, 3-2-78
= आयुध धृ इन् 1-2-46, 2-4-71, 1-3-7, 1-3-2
= आयुध धार् इन् 7-2-115, 1-1-51

विशँ प्रवेशने ६. १६०

विश् + लिँट् 3-2-115 = विश् + ल् 1-3-2, 1-3-3
= विश् तिप् 3-4-78 = विश् + णल् 3-4-82
= विश् + अ 1-3-7, 1-3-3 (3-1-68 cannot apply because of 3-4-115)
= विश् विश् अ 1-1-59, 6-1-8 = वि विश् अ 7-4-60
= विवेश 7-3-86

मूलँ प्रतिष्ठायाम् १. ६०७
मूलति इति मूलम्
मूल् क 3-1-135 = मूल् अ 1-3-8

मूलम् च तत् बलम् च = मूलबलम् 2-1-57

अन्तःपुरम् [अन्तः अभ्यन्तरं पुरं गृहम्, or पुरस्यान्तःस्थितम्] – inner apartment of a palace

verse 1:
स हेमजाम्बूनदचक्रवालं महार्हमुक्तामणिभूषितान्तम् ।
परार्ध्यकालागुरुचन्दनार्हं स रावणान्तःपुरमाविवेश ।। ५-४-३० ।।

“The celebrated Hanumān (finally) entered the gynaeceum of Rāvaṇa, which was encircled with walls of refined gold and pure gold (so-called because it was found in the olden days in the bed of the Jāmbū river, now known by the name of Jammu); whose inside was embellished with pearls and gems of great value and which was (daily) sprinkled with water containing superb Agallocum and Sandalwood.”

हेमसहितेन जाम्बूनदेन निर्मितम् चक्रवालम् (प्राकारमण्डलम्) यस्य तत् (अन्त:पुरम्) = हेमजाम्बूनदचक्रवालम्

जम्बूनद्याम् भवम् = जाम्बूनदम्
जम्बूनदी + ङि + अण् 4-1-83, 4-3-53
= जम्बूनदी + अ 1-2-46, 2-4-71, 1-3-3
= जाम्बूनदी + अ 7-2-117
= जाम्बूनद् + अ 1-4-18, 6-4-148
= जाम्बूनद

हेम(सहित)जाम्बूनदम् – वार्तिकम् on 2-1-60 समानाधिकरणाधिकारे शाकपार्थिवादीनाम् उपसङ्ख्यानम् उत्तरपदलोपश्च।

हेमजाम्बूनदेन निर्मितम् चक्रवालम् (प्राकारमण्डलम्) यस्य तत् 2-2-24

चक्रवालं तु मण्डलम्॥ अमरकोश: १-३-६॥
चक्राकारेण वलते। वलँ-[संवरणे सञ्चलने च] १. ५६४। अच् (३-१-१३४)। अन्येषामपि दृश्यते (६-३-१३७) इति दीर्घ:। यद्वा भावे घञि वाल:। चक्रमिव वालो यस्य। अथवा चक्राकारेण वाडते। वाडृँ [आप्लाव्ये] इत्येके १. ३२१, अच् (३-१-१३४), चक्रवाडम्। डलयोरेकत्वस्मरणाच्चक्रवालम्।

महान् अर्ह: (मूल्यम्) येषाम् ते महार्हा: मुक्तामणय:।
तै: भूषित: अन्त: शिरोभाग: यस्य तत् (अन्त:पुरम्)।

परस्मिन्नर्धे भव: परार्ध्य:। अमरकोश: ३-१-५८॥
परार्ध + ङि + यत् 4-3-5, 4-3-53
= परार्ध + य 1-2-46, 2-4-71, 1-3-3
= परार्ध् + य 1-4-18, 6-4-148

परार्ध्याभ्याम् (उत्तमाभ्याम्) कालागुरुचन्दनाभ्याम् अर्ह: (अर्हणम् = पूजा) यस्य तत् (अन्त:पुरम्)।

कालागुरु n. a kind of sandal tree, black kind of aloe

पञ्चमः सर्गः

Summary: गगनाङ्गणमारोहति भगवति शीतभानौ नानाविधान्निट्चरान्निशाचरीश्च विलोकयन्नपि सीतामपश्यन्हनुमांश्चिन्तां प्रपेदे ।

“Even though seeing ogres and ogresses of various grades and orders while the moon was ascending the heavens, Hanumān gives way to anxiety on his not being able to find Sītā.”

पदँ गतौ ४. ६५
पद् + लिँट् 3-2-115 = पद् ल् 1-3-2, 1-3-3
= पद् + त 3-4-78 = पद् + ए 3-4-81, 1-1-55
= पद् पद् ए 6-1-8 = पेदे 6-4-120

निशायां चरति इति निशाचरी
निशा ङि चर् ट 2-2-19, 3-1-92, 3-2-16
= निशा चर् अ 1-3-7, 1-2-46, 2-4-71
निशाचर + ङीप् 4-1-15
= निशाचर + ई 1-3-8, 1-3-3
= निशाचर् + ई 1-4-18, 6-4-148

Similarly निशि चरति इति निट्चर:

शीता: भानव: (किरणा:) यस्य स: (चन्द्रमा:) 2-2-24

रुहँ बीजजन्मनि प्रादुर्भावे च १. ९९५
आरोहति is not a तिङन्तम् पदम् but a सुबन्तम् पदम् (सप्तमी-एकवचनम् of the शतृँ-प्रत्ययान्त-प्रातिपदिकम् “आरोहत्”)। सत्सप्तमी is prescribed by 2-3-37 यस्य च भावेन भावलक्षणम्‌ ।

Saturday, July 23, 2011

verse 1:
ततः प्रियान् प्राप्य मनोऽभिरामान् सुप्रीतियुक्ताः सुमनोऽभिरामाः।
गृहेषु हृष्टाः परमाभिरामा हरिप्रवीरः स ददर्श रामाः ।। ५-५-२१ ।।

“The said Hanumān (the foremost hero among the monkeys) then saw the most charming young women happy in their homes and filled with great delight to meet their beloved ones – who were highly pleasing to their mind – and lovely with flowers (on their person).”

सुप्रीतियुक्ताः, सुमनोऽभिरामाः, हृष्टाः, परमाभिरामाः and रामाः are all द्वितीया-विभक्ति-बहुवचनान्ताः (like रमाम् रमे रमाः)

आपॢँ व्याप्तौ ५. १६
आप् + क्त्वा 1-3-2, 3-4-21
प्र आप् ल्यप् 7-1-37
प्र आप् य 1-3-8, 1-3-3
प्राप्य 6-1-101

प्रगत: वीरः = प्रवीरः 2-2-18 कुगतिप्रादयः। प्रादयो गताद्यर्थे प्रथमया। (Example – प्रगत: आचार्यः = प्राचार्यः।)
हरीणां प्रवीरः = हरिप्रवीरः 2-2-8

सुप्रीति: = अत्यन्तप्रीति: 2-1-57
सुप्रीत्या युक्ता = सुप्रीतियुक्ता 2-1-32

अभिरमते मनोऽत्र = अभिराम: (adjective)
अभि रम् + घञ् (आधारे) 3-3-19 = अभिराम 1-3-8, 1-3-3, 7-2-116

मनस: अभिरामान् (प्रियान्) = मनोऽभिरामन् 2-2-8

सुमनोभि: (पुष्पै:) अभिरामा = सुमनोऽभिरामा: 2-1-32

परमया (शोभया) अभिरामा: = परमाभिरामा: 2-1-32
अथवा –
परमा: च ता: अभिरामा: = परमाभिरामा: (अतिसुन्दरा:) 2-1-57

दृशिर् प्रेक्षणे १. ११४३
दृश् + लिँट् 3-2-115
दृश् ल् 1-3-2, 1-3-3
दृश् णल् 3-4-78, 3-4-82 (3-4-115 stops 3-1-68)
दृश् अ 1-3-7, 1-3-3
दृश् दृश् अ 6-1-8
दर् श् दृश् अ 7-4-66, 1-1-51
द दृश् अ 7-4-60
ददर्श 7-3-86, 1-1-51

हृषँ तुष्टौ ४. १४२
हृष्ट 7-2-29

रमते इति रामा
रमुँ क्रीडायाम् | रमँ इति माधवः १. ९८९
रम् + ण 3-1-140 = रम् + अ 1-3-7
= राम् अ 7-2-116 = राम + टाप् 4-1-4
= राम + आ 1-3-7, 1-3-3 = रामा 6-1-101

verse 2:
सीतामपश्यन्मनुजेश्वरस्य रामस्य पत्नीं वदतां वरस्य ।
बभूव दुःखोपहतश्चिरस्य प्लवङ्गमो मन्द इवाचिरस्य ।। ५-५-२७ ।।

“The monkey (Hanumān) at once turned languid (as it were), afflicted as he was with sorrow, on not finding, even after (striving for) a long time, Sītā, the consort of Śrī Rāma – a ruler of men, the best of speakers.”

चिरस्य = चिरमित्यर्थेऽव्ययम् stated in तिलक-टीका

मनोः जाताः मनुजाः
मनु + ङसिँ + जन् + ड 2-2-19, 3-2-98
= मनु + जन् + अ 1-2-46, 2-4-71, 1-3-7
= मनु + ज् + अ 6-4-143 (डिति अभस्य अपि अनुबन्धकरणसामर्थ्यात् टिलोपो भवति।)

मनुजानाम् ईश्वरः मनुजेश्वरः 2-2-8, तस्य मनुजेश्वरस्य

दःखेन उपहतः दुःखोपहतः 2-1-32

भू सत्तायाम् १.१
भू + लिँट् 3-2-115
भू ल् 1-3-2, 1-3-3
भू णल् 3-4-78, 3-4-82. (3-4-115 stops 3-1-68)
भू अ 1-3-7, 1-3-3
भूव् अ 6-4-88, 1-1-46
भूव् भूव् अ 6-1-8
भू भूव् अ 7-1-60
भु भूव् अ 7-4-59
भ भूव् अ 7-4-73
बभूव 8-4-54

प्लुङ् गतौ १. १११२
प्लव: = प्लवनम् (भावे)
प्लु + अप् 3-3-57 (अपवाद: for “घञ्”)
प्लो + अ 1-3-3, 7-3-84
= प्लव 6-1-78
प्लवेन गच्छति इति प्लवङ्गम:।
प्लव + टा + गम् + खच् 2-2-19, 3-2-47
= प्लव + गम् + अ 1-2-46, 2-4-71, 1-3-8, 1-3-3
= प्लवमुँम् + गम् + अ 6-3-67, 1-1-47
= प्लवम् + गम् + अ 1-3-2, 1-3-3

प्लवम्गम + सुँ 4-1-2 = प्लवम्गम: 1-3-2, 8-2-66, 8-3-15
= प्लवंगम: 8-3-24 = प्लवङ्गम: 8-4-58

षष्ठः सर्गः

Summary: हनुमान्पुनर्लङ्कालङ्करणभूतं रावणनिवासमेत्य तदन्तिकस्थप्रहस्तादिभवनेषु वैदेहीमन्विष्य रावणगृहं प्राविशत् ।

“Reaching the palace of Rāvaṇa, which served as an adornment to Laṅkā, and having looked for Sītā in the adjoining mansions of Prahasta and others, Hanumān now enters the palace of Rāvaṇa.”

लङ्कायाः अलङ्करणम् = लङकालङ्करणम् 2-2-8

उत्तरपदस्थ-भूत-शब्द: स्वरूपार्थोऽपि
लङकालङ्करणम् स्वरूपम् यस्य स: (रावणनिवास:)

रावणस्य निवासम् = रावणनिवासम्

अन्तिके तिष्ठति इति अन्तिकस्थम्
अन्तिक ङि स्था क 2-2-19, 3-2-4
= अन्तिक स्था अ 1-2-46, 2-4-71, 1-3-8
= अन्तिक स्थ् अ 6-4-64

इण् गतौ २. ४०
इ + क्त्वा 3-4-21
आ इ ल्यप् 7-1-37
आ इ य 1-3-8, 1-3-3
ए य 6-1-87
एत्य 6-1-86, 6-1-71, 1-1-46

इषुँ इच्छायाम् ६. ७८
इष् + क्त्वा 1-3-2, 3-4-21
अनु इष् ल्यप् 7-1-37
अनु इष् य 1-3-8, 1-3-3
अन्विष्य 6-1-77

विशँ प्रवेशने ६. १६०
प्र विश् + लङ् 3-2-111
प्र विश् ल् 1-3-2, 1-3-3
प्र विश् ति 3-4-78
प्र विश् त् 3-4-100
प्र विश् श त् 3-1-77 (1-2-4, 1-1-5 stop 7-3-86)
प्र विश् अ त् 1-3-8
प्र अविशत् 6-4-71
प्राविशत् 6-1-101

Saturday, August 13, 2011

verse 1:
गृहाद् गृहं राक्षसानामुद्यानानि च सर्वशः।
वीक्षमाणोऽप्यसंत्रस्तः प्रासादांश्च चचार सः ।। ५-६-१६ ।।

“Moving from house to house belonging to the ogres and even observing all the gardens as well as the palaces, he ranged undaunted everywhere.”

१.६९४ ईक्षँ दर्शने
वि ईक्ष् + लँट् 1-3-2, 1-3-9, 3-2-123
वि ईक्ष् + शानच् 3-2-124, 1-4-100
वि ईक्ष् + शप् + शानच् 3-1-68
वि ईक्ष् + अ + आन 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
वि ईक्ष मुँक् + आन 7-2-82, 1-1-46
वि ईक्षम् + आन 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9
वि ईक् ष् अ म् आ न
वि ईक्षमाण 8-4-2
वीक्षमाण 6-1-101

४.११ त्रसीँ उद्वेगे
सम् त्रसीँ + क्त 3-2-102, 1-1-26, 7-2-14
सम् त्रस् + त 1-3-8, 1-3-2, 1-3-9
संत्रस्त/सन्त्रस्त 8-3-23, 8-4-59

१.६४० चरँ गत्यर्थ: | चरतिर्भक्षणार्थोऽपि
चर् + लिँट् 3-2-115, 1-3-2
चर् + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9, 3-4-78
चर् + णल् 3-4-82
चर् + अ 1-3-7, 1-3-3, 1-3-9
चर् चर् + अ 6-1-8, 1-1-59
च चर् + अ 7-4-60
च चार् + अ 7-2-116
चचार

प्रासादान् + च
प्रासादारुँ + च 8-3-7
प्रासादांर् + च 8-3-4, 1-3-2, 1-3-9
प्रासादां: + च 8-3-15
प्रासादांस् + च 8-3-34
प्रासादांश्च 8-4-40

सर्वश: 5-4-42

verse 2:
सर्वेषां समतिक्रम्य भवनानि समन्ततः ।
आससादाथ लक्ष्मीवान् राक्षसेन्द्रनिवेशनम् ।। ५-६-२८ ।।

“Passing clearly beyond the residences of all (the aforesaid principal ogres) on every side, Hanumān (endowed with riches in the form of virility) once more reached the palace of Rāvaṇa (the ruler of ogres).”

बहुलमन्यत्रापि। उणादि-सूत्रम् 2-79.
अन्यधातुभ्योऽपि बहुलं युच् प्रत्ययो भवति।

भवन्त्यत्र इति भवनम्। अधिकरणे युच्।
भू + युच् = भू + अन 1-3-3, 7-1-1
= भो + अन 7-3-84
= भव् अन 6-1-78 = भवन

Similarly निविशन्त्यत्र इति निवेशनम्।

राक्षसेन्द्रनिवेशनम्।
राक्षसानाम् इन्द्रः राक्षसेन्द्रः, राक्षसेन्द्रस्य निवेशनम् राक्षसेन्द्रनिवेशनम्।

६.१६३ षदॢँ विशरणगत्यवसादनेषु
आ सद् 6-1-64, 1-3-2, 1-3-9
आ सद् + लिँट् 3-2-115
आ सद् + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9, 3-4-78
आ सद् + णल् 3-4-82
आ सद् + अ 1-3-7, 1-3-3, 1-3-9
आ सद् सद् + अ 6-1-8, 1-1-59
आ स सद् + अ 7-4-60
आ स साद् + अ 7-2-116
आससाद।

लक्ष्मीः अस्य अस्ति इति लक्ष्मीवान्।
लक्ष्मी + सुँ + मतुँप् 5-2-94
लक्ष्मी + मतुँप् 1-2-46, 2-4-71
लक्ष्मी + मत् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9
लक्ष्मी + वत् 8-2-9

समन्तत: = समन्तात्।
तसिप्रकरण आद्यादिभ्य उपसङ्ख्यानम्। 5-4-44 वार्त्तिकम्।

सप्तमः सर्गः

Summary: प्रसङ्गाद्रावणभवनं तत्रस्थं पुष्पकविमानं च कविर्वर्णयति ।

“The poet incidentally draws a pen-picture of Rāvaṇa’s palace and his aerial car known by the name of Puṣpaka.”

तत्र तिष्ठति इति तत्रस्थम्।
तत्र + स्था + क 2-2-19, 3-2-4
= तत्र + स्था + अ 1-3-8
= तत्र + स्थ् + अ 6-4-64

पुष्पकविमानम् 2-1-57

१०.४८४ वर्ण वर्णक्रियाविस्तारगुणवचनेषु (अदन्त:)
वर्ण + णिच् 3-1-25
वर् ण् + इ 1-3-7, 1-3-3, 1-3-9, 6-4-48
वर्णि 3-1-32
वर्णि + लँट् 3-2-123
वर्णि + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9, 3-4-78
वर्णि + शप् + तिप् 3-1-68
वर्णि + अ + ति 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
वर्णे + अ + ति 7-3-84
वर्णय् + अ + ति 6-1-77 = वर्णयति

Saturday, August 27, 2011

verse 1:
यथा नगाग्रं बहुधातुचित्रं यथा नभश्च ग्रहचन्द्रचित्रम् |
ददर्श युक्तीकृतचारुमेघचित्रं विमानं बहुरत्नचित्रम् ।। ५-७-८ ।।

“Hanumān (also) beheld (in that palace) an aerial car decked with numerous precious stones and charming like a beautiful cloud endowed with many hues (by the rays of the sun), which resembled a mountain-peak, looking picturesque with numerous minerals, and the firmament illumined by planets including the moon.”

न गच्छति इति नग:।
गमॢ- [गतौ] १. ११३७
न गम् + ड 2-2-19, 3-2-48 वार्त्तिकम् (अन्येष्वपि दृश्यते) or 3-2-101 वार्त्तिकम् (अन्येभ्योऽपि दृश्यते)
= न गम् + अ 1-3-7
= न ग् अ 6-4-143 (डिति अभस्य अपि अनुबन्धकरणसामर्थ्यात् टिलोपो भवति।)
= नग

नगस्य अग्रम् नगाग्रम् (2-2-8) = शैलाग्रम्।
बहवः धातवः बहुधातवः (2-1-57)
बहुधातुभिः चित्रं बहुधातुचित्रम् (2-1-32)

ग्रहै: युक्त: चन्द्र: ग्रहचन्द्र: (2-1-60 वार्त्तिकम् – समानाधिकरणाधिकारे शाकपार्थिवादीनाम् उपसङ्ख्यानम् उत्तरपदलोपश्च)
ग्रहचन्द्रेण चित्रं ग्रहचन्द्रचित्रम् (2-1-32)

बहूनि रत्नानि बहुरत्नानि (2-1-57)
बहुरत्नैः चित्रं बहुरत्नचित्रम् (2-1-32)

दृशिर् प्रेक्षणे १. ११४३
दृश् + लिँट् 3-2-115
दृश् ल् 1-3-2, 1-3-3
दृश् णल् 3-4-78, 3-4-82 (3-4-115 stops 3-1-68)
दृश् अ 1-3-7, 1-3-3
दृश् दृश् अ 6-1-8
दर् श् दृश् अ 7-4-66, 1-1-51
द दृश् अ 7-4-60
ददर्श 7-3-86, 1-1-51

नानावर्णैरयुक्तोऽपि तद्युक्त: कृत: = युक्तीकृत:।
युक्त + च्विँ (सर्वापहार-लोप: 1-3-7, 1-3-2, 6-1-67) 5-4-50 = युक्त = युक्ती 7-4-32, 1-1-52. युक्ती gets the गति-सञ्ज्ञा by 1-4-61.
युक्ती कृ + क्त 3-2-102, 1-1-26, 2-2-18
= युक्तीकृत 1-3-8. 7-2-10 stops 7-2-35. And 1-1-5 stops 7-3-84.

युक्तीकृत: चासौ चारुमेघश्च (2-1-57) तद्वद्विचित्रम् (2-1-55) विमानं पुष्पकाख्यम्।

The above is from तिलक-टीका।

गोविन्दराज: comments as follows:

युक्तीकृतमेघचित्रं पुञ्जीकृतमेघचित्रं चित्रमेघसङ्घातसदृशमित्यर्थ:।

अष्टमः सर्गः

Summary: पुनः पुष्पकविमानं विस्तरतो वर्णयति ।

“A further description of the aerial car Puṣpaka.”

विस्तरत: = विस्तरेण 5-4-44 वार्त्तिकम् – तसिप्रकरण आद्यादिभ्य उपसङ्ख्यानम्। This is referred to as सार्वविभक्तिकस्तसि:।

verse 1:
वसन्तपुष्पोत्करचारुदर्शनं वसन्तमासादपि चारुदर्शनम् ।
स पुष्पकं तत्र विमानमुत्तमं ददर्श तद् वानरवीरसत्तमः ।। ५-८-८ ।।

“That prince among monkey heroes saw in that palace the excellent aerial car, Puṣpaka, which with its bunches of vernal flowers was charming to look at and was lovelier even than the vernal month.”

उत्कीर्यते इति उत्कर:।
कॄ विक्षेपे (निक्षेपे) ६. १४५
उद् कॄ + अप् 3-3-57
= उद् कर् + अ 1-3-3, 7-3-84, 1-1-51
= उत्कर 8-4-55

वसन्तपुष्पोत्करचारुदर्शनम् = वसन्तकालिकपुष्पसमूहेन चारुदर्शनम्।

The above is from तिलक-टीका।

शिरोमणि-टीका comments as follows:

वसन्तपुष्पोत्करेण वसन्तकालिकपुष्पसमूहेन (2-1-60 वार्त्तिकम् – समानाधिकरणाधिकारे शाकपार्थिवादीनाम् उपसङ्ख्यानम् उत्तरपदलोपश्च।, 2-2-8, 2-1-32) चारु दर्शनं यस्य (2-2-24)
अत एव वसन्तमासात् (2-1-57) = वसन्तकालादपि चारु दर्शनं यस्य (2-2-24) तत् विमानसत्तमं पुष्पकं वानरवीरसत्तमो हनूमान् ददर्श।

वानराणां वीरः वानरवीरः 2-2-8, वानरवीराणां सत्तम: (उत्तम:) = वानरवीरसत्तमः (2-2-8)

असँ भुवि २. ६०
अस् + लँट् 3-2-123
= अस् + शतृँ 3-2-124, 1-4-99 = अस् + शप् + शतृँ 3-1-68 = अस् + अत् 2-4-72, 1-3-8, 1-3-2 = सत् 1-2-4, 6-4-111

अतिशयेन सन् = सत्तम:।
सत् सुँ तमप् 5-3-55 अतिशायने तमबिष्ठनौ
= सत् तमप् 1-2-46, 2-4-71
= सत्तम 1-3-3

नवमः सर्गः

Summary: रावणभवने सीतामन्वेषयन्हनुमांस्तत्र स्थितपुष्पकविमानमारुह्यानेकावस्थापन्नप्रसुप्तनारीगणान्विलोकयति।

“Leaping up the Puṣpaka in the course of his quest for Sītā in the palace of Rāvaṇa, Hanumān gazes from that vantage-ground on the hosts of women lying asleep in the women’s apartments in diverse states.”

रावणस्य भवनम् = रावणभवनम् 2-2-8

इषँ (इषुँ) इच्छायाम् ६. ७८
इष् + णिच् 3-1-26
= एषि 1-3-7, 1-3-3, 7-3-86, 3-1-32

अनु + एषि + लँट् 3-2-123
= अनु + एषि + शतृँ 3-2-124, 1-4-99 = अनु + एषि + शप् + शतृँ 3-1-68 = अनु + एषे + अ + अत् 7-3-84, 1-3-8, 1-3-3, 1-3-2
= अनु + एषय् + अ + अत् 6-1-78
= अनु + एषय् + अत् 6-1-97
= अन्वेषयत् 6-1-77

पुष्पकविमानम् 2-1-57
स्थितं च तत् पुष्पकविमानं च स्थितपुष्पकविमानम् 2-1-57

रुह् + क्तवा 3-4-21
आ रुह् + ल्यप् 7-1-37
आरुह् + य 1-3-8, 1-3-3 = आरुह्य 1-1-5 stops 7-3-86.

न एका = अनेका 2-2-6, 6-3-73, 6-3-74
अनेकावस्था 2-1-57
अनेकावस्थापन्ना 2-1-24
प्रसुप्तनारी 2-1-57, 6-3-42
अनेकावस्थापन्नप्रसुप्तनारी 2-1-57, 6-3-42
अनेकावस्थापन्नप्रसुप्तनारीगणान् 2-2-8

लोक् + णिच् 3-1-25 = लोक् + इ 1-3-7, 1-3-3 = लोकि 3-1-32
लोकि + लँट् 3-2-123 = लोकि + तिप् 3-4-78
= लोकि + शप् + तिप् 3-1-68 = लोकि अ ति 1-3-3, 1-3-8
= लोके अ ति 7-3-84 = लोकय् अ ति 6-1-78
= लोकयति

verse 1:
न चाकुलीना न च हीनरूपा नादक्षिणा नानुपचारयुक्ता ।
भार्याभवत् तस्य न हीनसत्त्वा न चापि कान्तस्य न कामनीया ।। ५-९-७१ ।।

“Again, no consort of his was low-born, nor devoid of beauty nor clumsy nor unadorned nor feeble nor repulsive to her husband.”

कुल ङस् + ख 4-1-139
= कुल + ख 1-2-46, 2-4-71
= कुल + ईन 7-1-2
= कुल् + ईन 1-4-18, 6-4-148
= कुलीन।

न कुलीना = अकुलीना 2-2-6, 6-3-73

ओँहाक् त्यागे ३. ९
हा + क्त 1-3-2, 1-3-3, 3-2-102, 1-1-26, 3-4-70
= हा + त 1-3-8 (7-2-10 stops 7-2-35.)
= ही त 6-4-66
= हीन 8-2-45

हीनं रूपं यस्या: सा हीनरूपा 2-2-24, 6-3-34

Similarly,
हीनसत्त्वा = हीनबला

कमुँ कान्तौ १. ५११
कम् + णिङ् 3-1-31 = कामि 7-2-116
कामि + अनीयर् 3-1-96 = कामनीय 1-3-3, 6-4-51

कम् + क्त (णिङ्-अभावपक्षे) 3-2-102, 1-1-26 = कम् + त 1-3-8, 7-2-15 (along with 7-2-56) stops 7-2-35
= काम् त 6-4-15
= कान्त 8-3-24, 8-4-58

उपचार: = उत्तमाम्बरभूषणमालादि:।
उपचारै: युक्ता = उपचारयुक्ता 2-1-32
न उपचारयुक्ता = अनुपचारयुक्ता 2-2-6, 6-3-73, 6-3-74

दक्षते वर्धते शीघ्रकारी भवति वा स दक्षिण:।
दक्षँ वृद्धौ शीघ्रार्थे च १. ६९२
दक्ष् + इनन् by उणादि-सूत्रम् 2-51 द्रुदक्षिभ्यामिनन्
= दक्षिन 1-3-3
= दक्षिण 8-4-2

दशमः सर्गः

Summary: हनुमान्पुष्पकविमाने नानालंकरणोपशोभितोपकरणभासुरशयनोत्तमशायिनं बहुविधाभरणविभूषितवपुषं रावणं ददर्श । तदविदूरतः पणवमृदङ्गवेणुवीणाढक्कादिनानातोद्यालिङ्गितवपुषां सुप्त्यनवस्थाङ्गप्रत्यङ्गानां शैलूषीणां मध्येऽद्भुतशयनशायिनीमुज्ज्वलाभरणोपशोभितां मन्दोदरीं दृष्ट्वा सेयं सीतेति मत्वा संजातहर्षः पुच्छचुम्बनादि कापेयमाविश्चकार ।

“Hanumān catches sight of Rāvaṇa reposing on an excellent couch decked with various ornaments, himself adorned with jewels of every description. Perceiving Mandodarī graced with bright jewels and lying asleep on a wonderful couch not far from her husband in the midst of dancing girls lying in a disorderly state with diverse musical instruments clasped to their bosom, and taking her to be Sītā, Hanumān gets enraptured and exhibits his joy through various simian gestures such as kissing the end of his tail.”

पुष्पकविमान 2-1-57

भासृँ दीप्तौ १. ७११
भास् + घुरच् 3-2-161 भञ्जभासमिदो घुरच् ।
= भास् + उर 1-3-8, 1-3-3
= भासुर

नानालंकरण 2-1-57
नानालंकरणोपशोभित 2-1-32
नानालंकरणोपशोभितोपकरण 2-1-57
नानालंकरणोपशोभितोपकरणभासुर 2-1-32
शयनोत्तम 2-2-8
नानालंकरणोपशोभितोपकरणभासुरशयनोत्तम 2-1-57
नानालंकरणोपशोभितोपकरणभासुरशयनोत्तमे शेते तच्छील: = नानालंकरणोपशोभितोपकरणभासुरशयनोत्तमशायी, तम्।
शीङ् स्वप्ने २. २६
शयनोत्तम ङि + शी णिनिँ 2-2-19, 3-2-78
= शयनोत्तम + शी इन् 1-2-46, 2-4-71, 1-3-7, 1-3-2
= शयनोत्तम + शै इन् 7-2-115
= शयनोत्तम + शाय् इन् 6-1-78

बहुविध 2-2-24
बहुविधाभरण 2-1-57
बहुविधाभरणविभूषित 2-1-32
बहुविधाभरणविभूषितवपुस् 2-2-24

अविदूर 2-2-6, 6-3-73
तदविदूर 2-2-8
तदविदूरतः = तदविदूरे 5-4-44 वार्त्तिकम् – तसिप्रकरण आद्यादिभ्य उपसङ्ख्यानम्। This is referred to as सार्वविभक्तिकस्तसि:।

पणवमृदङ्गवेणुवीणाढक्क 2-2-29
पणवमृदङ्गवेणुवीणाढक्कादि 2-2-24
नानातोद्य 2-1-57
पणवमृदङ्गवेणुवीणाढक्कादिनानातोद्य 2-1-57
पणवमृदङ्गवेणुवीणाढक्कादिनानातोद्यालिङ्गित 2-1-32
पणवमृदङ्गवेणुवीणाढक्कादिनानातोद्यालिङ्गितवपुस् 2-2-24

प्रतिगतमङ्गमिति प्रत्यङ्गम् (2-2-18 वार्त्तिकम् – अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयया) = करादिकम्।

अनवस्थ 2-2-24 वार्त्तिकम्, 6-3-73, 6-3-74, 1-2-48
सुप्त्यनवस्थ 2-1-32
अङ्गप्रत्यङ्ग 2-2-29
सुप्त्यनवस्थाङ्गप्रत्यङ्ग 2-2-24

शिलूषस्य ऋषेरपत्यम् = शैलूष:।
शिलूष ङस् अण् 4-1-114 (overrules 4-1-95)
= शिलूष अ 1-2-46, 2-4-71, 1-3-3
= शैलूष अ 7-2-117
= शैलूष् अ 1-4-18, 6-4-148
= शैलूष

In the feminine –
शैलूष + ङीप् 4-1-15 = शैलूष + ई 1-3-8, 1-3-3
= शैलूष् + ई 1-4-18, 6-4-148
= शैलूषी

अद्भुतशयन 2-1-57
अद्भुतशयनशायिनी 2-2-19, 3-2-78, 4-1-5

शुभँ दीप्तौ १. ८५३
शुभ् + णिच् 3-1-26
= शोभि 1-3-7, 1-3-3, 7-3-86, 3-1-32
शोभि + क्त 3-2-102, 1-1-26
= शोभि इत 1-3-8, 7-2-35
= शोभित 6-4-52

उज्ज्वलाभरण 2-1-57
उज्ज्वलाभरणोपशोभित 2-1-32

संजातहर्ष 2-2-24

पुच्छचुम्बन 2-2-8
पुच्छचुम्बनादि 2-2-24

चकार 3-2-115, 3-4-78, 3-4-82, 6-1-8, 7-4-66, 1-1-51, 7-4-60, 7-4-62, 7-2-115, 1-1-51

आविस् gets गति-सञ्ज्ञा by 1-4-61, 1-4-74
आविस् चकार 1-4-80. Not a compound.
आविश्चकार 8-2-66, 1-3-2, 8-3-15, 8-3-34, 8-4-40

कपेर्भाव: कर्म वा = कापेयम्।
कपि ङस् + ढक् 5-1-127
= कपि + ढक् 1-2-46, 2-4-71
= कपि + एय 1-3-3, 7-1-2
= कापि + एय 7-2-118
= काप् + एय 1-4-18, 6-4-148
= कापेय।

verse 1:
स तां दृष्ट्वा महाबाहुर्भूषितां मारुतात्मजः ।
तर्कयामास सीतेति रूपयौवनसम्पदा ।
हर्षेण महता युक्तो ननन्द हरियूथपः ।। ५-१०-५३ ।।

“Seeing her adorned and endowed with wealth of beauty and exuberance of youth, the mighty-armed Hanumān (sprung from the loins of the wind-god) inferred her to be Sītā; filled with great delight, that leader of monkey hordes felt transported with joy.”

दृशिँर् प्रेक्षणे (“इर्” gets the इत्-सञ्ज्ञा by the वार्त्तिकम् – इर इत्-सञ्ज्ञा वाच्या)
दृश् + क्त्वा 3-4-21
दृश् + त्वा 1-3-8. 7-2-10 stops 7-2-35.
दृष् + त्वा 8-2-36
दृष्ट्वा 8-4-41

महान्तौ बाहू यस्य सः महाबाहुः 2-2-24

१०.३११ तर्कँ भाषार्थः (ऊहेऽप्ययमिति मैत्रेय:)
तर्क् + णिच् 3-1-25
तर्क् + इ 1-3-7, 1-3-3
तर्कि 3-1-32

तर्कि + लिँट् 3-2-115
तर्कि आम् + लिँट् 3-1-35
तर्कय् + आम् + लिँट् 6-4-55
तर्कय् + आम् 2-4-81, 1-1-62, 1-2-46
तर्कयाम् + सुँ 4-1-2
तर्कयाम् 2-4-81
तर्कयाम् + अस् + लिँट् 3-1-40
तर्कयाम् + अस् + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 3-4-78
तर्कयाम् + अस् + णल् 3-4-82
तर्कयाम् + अस् + अ 1-3-7, 1-3-3
तर्कयाम् + अस् अस् + अ 6-1-8
तर्कयाम् + अ अस् + अ 7-4-60
तर्कयाम् + आ अस् + अ 7-4-70
तर्कयाम् + आस् + अ 6-1-101 = तर्कयामास

म्रियन्ते अनेन वृद्धेन विना वा इति मरुत्।
मृङ् प्राणत्यागे ६. १३९
मृ + उत् by उणादिसूत्रम् 1-94
= मरुत् 7-3-84, 1-1-51

मरुत् एव मारुत:।
मरुत् + अण् 5-4-38
= मरुत् + अ 1-3-3
= मारुत 7-2-117

आत्मनः जातः आत्मजः।
आत्मन् ङसिँ + जन् ड 2-2-19, 3-2-98
= आत्मन् + जन् अ 1-2-46, 2-4-71, 1-3-7
= आत्मन् + ज् अ 6-4-143 व्याख्यानम् – डिति अभस्य अपि अनुबन्धकरणसामर्थ्यात् टिलोपो भवति।
= आत्मज 1-1-62, 1-4-14, 8-2-7

मारुतस्य आत्मजः = मारुतात्मजः 2-2-8

यूनो भाव: = यौवनम्।
युवन् ङस् अण् 5-1-130 हायनान्तयुवादिभ्योऽण् ।
= युवन् अण् 1-2-46, 2-4-71
= युवन् अ 1-3-3. Note: 6-4-167 अन् stops the टि-लोप: which would have otherwise taken place by 6-4-144 नस्तद्धिते ।
= यौवन् अ 7-2-117

रूपं च यौवनं च रूपयौवने 2-2-29
रूपयौवने एव सम्पद् 2-1-57, तया

७.७ युजिँर् योगे (“इर्” gets the इत्-सञ्ज्ञा by the वार्त्तिकम् – इर इत्-सञ्ज्ञा वाच्या)
युज् + क्त 3-2-102, 1-1-26
युज् + त 1-3-8. (7-2-10 stops 7-2-35. 1-1-5 stops 7-3-86.)
युग् + त 8-2-30 = युक्त 8-4-55

१.७० टुनदिँ समृद्धौ
न + नुँम् + द् 1-3-5, 1-3-2, 7-1-58, 1-1-47
नन्द् + लिँट् 1-3-2, 1-3-3, 3-2-115
नन्द् + तिप् 3-4-78
नन्द् + णल् 3-4-82
नन्द् + अ 1-3-7, 1-3-3
नन्द् नन्द् अ 6-1-8
न नन्द् अ 7-4-60 = ननन्द 8-3-24, 8-4-58

हरीणां यूथम् = हरियूथम्
हरियूथं पाति इति हरियूथपः।
हरियूथ अम् + पा क 2-2-19, 3-2-3
= हरियूथ + पा अ 1-2-46, 2-4-71, 1-3-8
= हरियूथ + प् अ 6-4-64 = हरियूथप

verse 2:
आस्फोटयामास चुचुम्ब पुच्छं ननन्द चिक्रीड जगौ जगाम ।
स्तम्भानरोहन्निपपात भूमौ निदर्शयन्स्वां प्रकृतिं कपीनाम् ।। ५-१०-५४ ।।

“Demonstrating his simian nature, he clapped his arms and kissed his tail, rejoiced, frolicked, sang and paced, climbed up the pillars and dropped (back) on the ground.”

१०. २४७ स्फुटँ भेदने
स्फुट् + णिच् 3-1-25
स्फुट् + इ 1-3-3, 1-3-7
स्फोट् + इ 7-3-86
स्फोटि 3-1-32
स्फोटि + लिँट् 3-2-115
स्फोटि + आम् + लिँट् 3-1-35
स्फोटय् + आम् + लिँट् 6-4-55
स्फोटय् + आम् 2-4-81, 1-1-62, 1-2-46
स्फोटयाम् + सुँ 4-1-2
स्फोटयाम् 2-4-81
स्फोटयाम् + अस् + लिँट् 3-1-40
स्फोटयाम् + अस् + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 3-4-78
स्फोटयाम् + अस् + णल् 3-4-82
स्फोटयाम् + अस् + अ 1-3-7, 1-3-3
स्फोटयाम् + अस् अस् + अ 6-1-8
स्फोटयाम् + अ अस् + अ 7-4-60
स्फोटयाम् + आ अस् + अ 7-4-70
स्फोटयाम् + आस् + अ 6-1-101 = स्फोटयामास

१.४९५ चुबिँ वक्त्रसंयोगे
चु नुँम् ब् 1-3-2, 7-1-58, 1-1-47
= चुन्ब् 1-3-2, 1-3-3
चुन्ब् + लिँट् 3-2-115
चुन्ब् + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 3-4-78
चुन्ब् + णल् 3-4-82
चुन्ब् + अ 1-3-7, 1-3-3
चुन्ब् चुन्ब् + अ 6-1-8
चु चुन्ब् + अ 7-4-60
चुचुंब 8-3-24 = चुचुम्ब 8-4-58

१.४०५ क्रीडृँ विहारे
क्रीड् + लिँट् 3-2-115
क्रीड् + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 3-4-78
क्रीड् + णल् 3-4-82
क्रीड् + अ 1-3-7, 1-3-3
क्रीड् क्रीड् + अ 6-1-8
की क्रीड् + अ 7-4-60
कि क्रीड् + अ 7-4-59
चि क्रीड् + अ 7-4-62 = चिक्रीड

१.१०६५ गै शब्दे
गा + लिँट् 6-1-45, 3-2-115
गा + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 3-4-78
गा + णल् 3-4-82
गा गा + णल् 6-1-8
ग गा + णल् 7-4-59
ज गा + णल् 7-4-62
ज गा + औ 7-1-34
जगौ 6-1-88

१.११३७ गमॢँ गतौ
गम् + लिँट् 3-2-115
गम् + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 3-4-78
गम् + णल् 3-4-82
गम् + अ 1-3-7, 1-3-3
गम् गम् + अ 6-1-8
ग गम् + अ 7-4-60
ज गम् + अ 7-4-62
जगाम 7-2-116

१.५७९ रुहँ बीजजन्मनि प्रादुर्भावे च
रुह् + लङ् 3-2-111
रुह् + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 3-4-78
रुह् + त् 1-3-3, 3-4-100
रुह् + शप् + त् 3-1-68
रोह् + शप् + त् 7-3-86
रोह् + अ + त् 1-3-8, 1-3-3
अ रोह् + अ + त् 6-4-71, 1-1-46, 1-3-3
अरोहत्

१.९७९ पतॢँ गतौ |
पत् + लिँट् 3-2-115
पत् + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 3-4-78
पत् + णल् 3-4-82
पत् + अ 1-3-7, 1-3-3
पत् पत् + अ 6-1-8
प पत् + अ 7-4-60
प पात् + अ 7-2-116 = पपात

दृशिँर् प्रेक्षणे (“इर्” gets the इत्-सञ्ज्ञा by the वार्त्तिकम् – इर इत्-सञ्ज्ञा वाच्या)
दृश् + णिच् 3-1-26
दर्शि 7-3-86, 1-1-51, 3-1-32
दर्शि + शतृँ 3-2-123, 3-2-124
दर्शि + शप् + शतृँ 3-1-68
दर्शि + अ + अत् 1-3-8, 1-3-3, 1-3-2
दर्शे + अ + अत् 7-3-84
दर्शय् + अ + अत् 6-1-78
दर्शयत् 6-1-97

दर्शयत् + सुँ 4-1-2
= दर्शयत् + स् 1-3-2
= दर्शयनुँम् त् + स् 7-1-70, 1-1-47
= दर्शयन् त् + स् 1-3-2, 1-3-3
= दर्शयन् त् 6-1-68
= दर्शयन् 8-2-23. After this 8-2-7 does not apply because of 8-2-1.

एकादशः सर्गः

Summary: मन्दोदर्यां जातां सीतात्वबुद्धिं युक्तिपर्यालोचनेन निवर्तयन्हनुमान्पानभूमिगतं रावणं परितः प्रसुप्ता नानावस्थाः स्त्रियोऽनेकविधपानपात्रादिकं चावालोकयत्। परदारदर्शनजन्यदुरितं विशङ्क्य वशीकृतमनस्कत्वात्तत्संसर्गं निराकुर्वन्नन्यत्रान्वेषणञ्चोपक्रमते ।।

“Banishing by recourse to reason the thought that the lady (Mandodarī) whom he had seen was Sītā, Hanumān sees women in various states lying around Rāvana in the drinking room, as well as various kinds of drinking vessels etc. He is seized with fear of having incurred the sin of gazing on other’s wives; but the thought that he had looked on them with a lust-free mind eases his conscience and he begins to search elsewhere.”

सीतायाः भावः सीतात्वम् 5-1-119
सीतात्वे बुद्धिः सीतात्वबुद्धिः 2-1-40 (योगविभाग:), ताम्

युक्त्या पर्यालोचनम् 2-1-32, तेन युक्तिपर्यालोचनेन

जायते इति जन्यम्।
जनीँ प्रादुर्भावे ४. ४४
जन्य 3-4-68

परदारदर्शनजन्यदुरितम्
परेषां दारा: = परदारा: 2-2-8
परदाराणां दर्शनम् = परदारदर्शनम् 2-2-8
परदारदर्शनेन जन्यम् = परदारदर्शनजन्यम् 2-1-32
परदारदर्शनजन्यं च तद् दुरितं च = परदारदर्शनजन्यदुरितम् 2-1-57

वशी 5-4-50, 7-4-32, 1-4-61
वशीकृतं (2-2-18) मनो यस्य स: = वशीकृतमनस्क:। 2-2-24
कप्-प्रत्यय: by 5-4-154
सकारादेश: by 8-3-38

ref. गीता 18-67 अतपस्काय

verse 1:
तदिदं मार्गितं तावच्छुद्धेन मनसा मया ।
रावणन्तःपुरं सर्वं दृश्यते न च जानकी ।। ५-११-४५ ।।

“Therefore with a pure mind only has this entire gynaeceum of Rāvaṇa been ransacked by me; Janaka’s daughter, however, is not to be seen.”

१०. ३८४ मार्गँ अन्वेषणे
मार्ग् + णिच् 1-3-2, 3-1-25
मार्गि 3-1-32
मार्गि + क्त 3-2-102, 1-1-26
मार्गि + इत 1-3-8, 7-2-35 (7-2-10 doesn’t apply)
मार्ग् + इत 6-4-52 = मार्गित

मार्गित + सुँ 4-1-2 = मार्गितम् 7-1-24, 6-1-107 (adjective to रावणन्तःपुरम्)

तावत् + शुद्धेन
तावद् + शुद्धेन 8-2-39
तावज् + शुद्धेन 8-4-40
तावच् + शुद्धेन 8-4-55
तावच् + छुद्धेन 8-4-63 = तावच्छुद्धेन

रावणस्य अन्तःपुरम् = रावणान्तःपुरम् 2-2-8

१.११४३ दृशिर् प्रेक्षणे (“इर्” gets the इत्-सञ्ज्ञा by the वार्त्तिकम् – इर इत्-सञ्ज्ञा वाच्या)
दृश् + त 3-2-123, 1-3-13, 3-4-78
दृश् + ते 3-4-79
दृश् + यक् + ते 3-1-67 (Note: 7-3-78 doesn’t apply because यक् is not a शित्-प्रत्यय:)
दृश् + य + ते 1-3-3, 1-3-9. (Note: 1-1-5 ग्क्ङिति च stops 7-3-86 पुगन्तलघूपधस्य च)
दृश्यते

द्वादशः सर्गः

Summary: चित्रगृहनिकुञ्जादिनानास्थानेष्वन्विष्याप्यप्राप्तसीतादर्शनो हनुमांस्तस्या रावणेन प्रमापणादि संभाव्याकृतकार्यतया स्वयत्नवैफल्यं मन्वानः सुग्रीवदर्शनादिषु निर्विण्णोऽपि निर्वेदस्यानर्थापादकत्वं विचिन्त्यानिर्वेदस्यैव फलोत्पादकत्वं निश्चिन्वन्पुनरप्यन्वेष्टुमारभते। अन्विष्टाखिलप्रदेशोऽप्यलब्धसीतादर्शनः पुनश्च विषीदति ।

“Having failed to discover Sītā even after searching for her in the picture gallery and other places, Hanumān suspects that she might have been disposed of by Rāvaṇa and, thus meeting with frustration, falls into the quagmire of despair. On second thought, however, he deprecates despair as harmful and, falling back upon self-reliance, resumes the search. But, failing to find her even on searching for her all round, he becomes despondent again.”

चित्रै: भूषितं गृहम् = चित्रगृहम् – वार्तिकम् on 2-1-60 समानाधिकरणाधिकारे शाकपार्थिवादीनाम् उपसङ्ख्यानम् उत्तरपदलोपश्च।

चित्रगृहाणि च निकुञ्जानि च = चित्रगृहनिकुञ्जानि 2-2-29
नाना (विविधानि) च तानि स्थानानि = नानास्थानानि 2-1-57

चित्रगृहनिकुञ्जानि आदीनि येषां तानि = चित्रगृहनिकुञ्जादीनि 2-2-24

चित्रगृहनिकुञ्जादीनि च तानि नानास्थानानि = चित्रगृहनिकुञ्जादिनानास्थानानि। 2-1-57

न प्राप्तम् = अप्राप्तम् 2-2-6, 6-3-73
सीतायाः दर्शनम् = सीतादर्शनम् 2-2-8
अप्राप्तं सीतादर्शनं येन स: = अप्राप्तसीतादर्शन: 2-2-24

६.७८ इषुँ इच्छायाम्
इष् + क्त्वा 3-4-21, 1-3-2
अनु इष् ल्यप् 2-2-18, 7-1-37
अनु इष् य 1-3-8, 1-3-3
अन्विष्य 6-1-77

मीञ् हिंसायाम् ९. ४
मा + णिच् (स्वार्थे) 1-3-3, 6-1-50
= मा + इ 1-3-7, 1-3-3
= मापि 7-3-36, 1-1-46

मापि + ल्युट् 3-3-115
= मापि + अन 1-3-8, 1-3-3, 7-1-1
= माप् अन 6-4-51

प्रमापणम् 2-2-18, 8-4-29

प्रमापणम् आदि यस्य तत् प्रमापणादि 2-2-24

भू + णिच् 3-1-26
भौ + इ 7-2-115, 1-3-7, 1-3-3, 1-3-9
भावि 6-1-78, 3-1-32

भावि + क्त्वा 3-4-21
सम् + भावि + ल्यप् 2-2-18, 7-1-37
सम् + भावि + य 1-3-8, 1-3-3
सम् + भाव् + य 6-4-51
संभाव्य 8-3-23
= संभाव्य, सम्भाव्य 8-4-59

कृतानि कार्याणि येन स कृतकार्यः 2-2-24
न कृतकार्यः अकृतकार्यः 2-2-6, 6-3-73
अकृतकार्यस्य भावः अकृतकार्यता 5-1-119, 4-1-4
तया अकृतकार्यतया 2-3-23

स्वस्य यत्नं स्वयत्नम् 2-2-8

विगतं फलम् यस्य/यस्मात् तत् = विफलम् 2-2-24 वा.
विफलस्य भाव: = वैफल्यम्
विफल ङस् + ष्यञ् 5-1-124
= विफल + य 1-3-6, 1-3-3, 1-2-46, 2-4-71
= वैफल + य 7-2-117
= वैफल् + य 1-4-18, 6-4-148

स्वयत्नस्य वैफल्यम् = स्वयत्नवैफल्यम् 2-2-8

८.९ मनुँ अवबोधने
मन् + शानच् 1-3-2, 1-3-9, 3-2-123, 3-2-124
मन् + उ + आन 3-1-79, 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
मन्वान 6-1-77. Note: 7-2-82 doesn’t apply because the अङ्गम् “मनु” does not end in a अकार:।
मन्वान + सुँ 4-1-2 = मन्वानः 1-3-2, 8-2-66, 8-3-15

सुग्रीवस्य दर्शनम् = सुग्रीवदर्शनम् 2-2-8
सुग्रीवदर्शनम् आदि येषाम् तानि = सुग्रीवदर्शनादीनि 2-2-24, तेषु सुग्रीवदर्शनादिषु

४. ६७ विदँ सत्तायाम्
निर् विद् + क्त 3-2-102, 1-1-26, 2-2-18
निर् विन् + न 1-3-8, 8-2-42
निर् विन् + ण 8-4-29 वार्त्तिकम् – निर्विण्णस्योपसङ्ख्यानम्
निर् विण् + ण 8-4-41 = निर्विण्ण

अविद्यमान: अर्थ: यस्य तत् = अनर्थम् 2-2-24 वा., 6-3-73, 6-3-74

पदँ गतौ ४. ६५
पद् + णिच् 1-3-2, 3-1-26
= पादि 1-3-7, 1-3-3, 7-2-116, 3-1-32

पादि + ण्वुल् 3-1-133
= पादि + अक 1-3-7, 1-3-3, 7-1-1
= पाद् अक 6-4-51

आपादक 2-2-18

अनर्थस्य आपादक: = अनर्थापादक: 2-2-8
अनर्थापादकस्य भाव: = अनर्थापादकत्वम् 5-1-119

५.५ चिञ् चयने
चि + शतृँ 3-2-123, 3-2-124
चि श्नु शतृँ 3-1-73
चि नु अत् 1-3-8, 1-3-2, 1-3-9
चिन्वत् 6-4-87

चिन्वत् + सुँ 4-1-2
चिन्व नुँम् त् + सुँ 1-1-43, 7-1-70, 1-1-47
चिन्वन्त् स् 1-3-2, 1-3-3
चिन्वन्त् 6-1-68
चिन्वन् 8-2-23 (after this 8-2-7 cannot apply because of 8-2-1.)

निस् + चिन्वन् 2-2-18 = निश्चिन्वन् 8-2-66, 1-3-2, 8-3-15, 8-3-34, 8-4-40

६.७८ इषुँ इच्छायाम्
अनु + इष् + तुमुँन् 1-3-2, 3-4-65, 2-2-18
अनु + एष् + तुम् 7-3-86, 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9
अन्वेष् + तुम् 6-1-77
अन्वेष्टुम् 8-4-41

१.११२९ रभँ राभस्ये
आङ् + रभ् + त 3-2-123, 1-3-2, 1-3-12, 3-4-78
आङ् + रभ् + ते 3-4-79
आङ् + रभ् + शप् + ते 3-1-68
आ + रभ् + अ + ते 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
आरभते

१.११३० डुलभँष् प्राप्तौ
लभ् + क्त 1-3-2, 1-3-3, 1-3-5, 3-2-102, 1-1-26
लभ् + त 1-3-8. 7-2-10 stops 7-2-35.
लभ् + ध 8-2-40
लब् + ध 8-4-53

न लब्धम् = अलब्धम् 2-2-6, 6-3-73

सीतायाः दर्शनम् सीतादर्शनम् 2-2-8
अलब्धं सीतादर्शनं येन सः = अलब्धसीतादर्शनः 2-2-24

१. ९९० षदॢँ विशरणगत्यवसादनेषु
वि सद् लँट् 1-3-2, 6-1-64, 3-2-123
वि सद् + तिप् 1-3-78, 3-4-78
वि सद् + शप् + तिप् 3-1-68
वि सद् + अ + ति 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
वि सीद + अ + ति 7-3-78
वि सीदति 6-1-97
विषीदति 8-3-66

verse 1:
अवतीर्य विमानाच्च हनूमान् मारुतात्मजः ।
चिन्तामुपजगामाथ शोकोपहतचेतनः ।। ५-१२-२५ ।।

“Nay, descending from the aerial car, Hanumān, sprung from the loins of the wind-god, now fell a brooding, his understanding having been clouded by grief.”

१.६८४ तॄ प्लवनतरणयोः
तॄ + क्त्वा 3-4-21
अव + तॄ + ल्यप् 2-2-18, 7-1-37
अव + तॄ + य 1-3-8, 1-3-3. Note: 1-1-5 stops 7-3-84.
अव + तिर् + य 7-1-100, 1-1-51
अव + तीर् + य 8-2-77
अवतीर्य

१.११३७ गमॢँ गतौ
उप + गम् + लिँट् 3-2-115
उप + गम् + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 3-4-78
उप + गम् + णल् 3-4-82
उप + गम् + अ 1-3-7, 1-3-3
उप + गम् गम् + अ 6-1-8
उप + ग गम् + अ 7-4-60
उप + ज गम् + अ 7-4-62
उपजगाम 7-2-116

शोकेन उपहता = शोकोपहता 2-1-32
चितँ सञ्चेतने १०. १९२
चित् + णिच् 3-1-25 = चेति 7-3-86, 1-3-7, 1-3-3, 3-1-32
चेति + युच् 3-3-107
चेति + यु 1-3-3
चेति + अन 7-1-1
चेत् + अन 6-4-51

चेतन + टाप् 4-1-4 = चेतना 1-3-7, 1-3-3, 6-1-101

शोकोपहता चेतना यस्य स: = शोकोपहतचेतनः।
पुंवद्भाव: for the पूर्वपदम् by 6-3-34
ह्रस्वादेश: at the end by 1-2-48.

त्रयोदशः सर्गः

पुष्पकविमानान्निर्गतो हनुमान्विद्युद्वेगेन सर्वतोऽन्विष्याप्यलब्धसीतादर्शनस्तस्या विनाशमेवादर्शने हेतुत्वेनोत्प्रेक्षते। जानक्या अनुपलब्धी रामे निवेदितानिवेदिताप्यनेकमहानर्थापादिकेति विचिन्त्य प्रतिप्रयाणान्निवृत्तः प्रायोपवेशनं प्राणमोक्षणं रावणमारणं वा यावद्विचिन्तयति तावदेकां वनवाटिकामनन्वेषितां निर्धार्य तामन्वेष्टुमुपक्रान्तः स्वोद्योगसाफल्यापादनार्थमृषिदेवगणब्रह्मादीन्प्रार्थयते ।

“Coming out of the aerial car, Puṣpaka, and not finding Sītā even on searching for her on all sides. Hanumān concludes her to have been killed. Believing that her untraceability, no matter whether it is reported to Śrī Rāma or not, may lead to disastrous consequences. Hanumān decides not to return to the mainland. Meanwhile, while he contemplates fasting till death or suicide or the killing of Rāvaṇa, he catches sight of a groove which he does not remember to have seen and before proceeding to explore it mentally invokes the succour of Rṣis and gods for success in his undertaking.”

विद्युतो वेग: = विद्युद्वेग: 2-2-8, तेन

सर्वत: 5-3-7

अन्विष्य 3-4-21, 2-2-18, 7-1-37

हेतुत्वम् 5-1-119

१.६९४ ईक्षँ दर्शने

उद् + प्र + ईक्ष् + लँट् 3-2-123
उद् + प्र + ईक्ष् + त 3-4-78, 1-3-12
उद् + प्र + ईक्ष् + ते 3-4-79
उद् + प्र + ईक्ष् + शप् + ते 3-1-68
उद् + प्र + ईक्ष् + अ + ते 1-3-8, 1-3-3
उत्प्रेक्षते 6-1-87, 8-4-55

विदँ चेतनाख्याननिवासेषु १०. २३२
विद् + णिच् 1-3-2, 3-1-25
= वेदि 1-3-7, 1-3-3, 7-3-86, 3-1-32
वेदि + क्त 3-2-102, 1-1-26
= वेदि + इत 1-3-8, 7-2-35 (7-2-10 does not apply)
= वेदित 6-4-52
निवेदित 2-2-18

चितिँ स्मृत्याम् १०. २
चि नुँम् त् + णिच् 1-3-2, 7-1-58, 1-1-47, 3-1-25
= चिन्ति 1-3-2, 1-3-3, 1-3-7, 3-1-32
चिन्ति + क्त्वा 3-4-21
वि चिन्ति + क्त्वा 2-2-18
= वि चिन्ति + ल्यप् 7-1-37
= वि चिन्त्य 1-3-8, 1-3-3, 6-4-51

Similarly निर्धार्य

इण् गतौ २. ४०
प्र + इ + अच् 1-3-3, 3-3-56, 2-2-18
= प्र + ए + अ 1-3-3, 7-3-84
= प्र + अय 6-1-78
= प्राय 6-1-101

प्राय: = मरणार्थम् अनशनम्
प्रायेण उपवेशनम् = प्रायोपवेशनम् 2-1-32, 6-1-87

verse 1:
अशोकवनिका चापि महतीयं महाद्रुमा।
इमामधिगमिष्यामि नहीयं विचिता मया ।। ५-१३-५५ ।।

“Here is a large grove too of Aśoka trees, containing gigantic trees. I shall (now) explore it since it has not been scoured by me (so far).”

By the उणादि-सूत्रम् “वर्तमाने पृषद्-बृहन्महज्जगद् शतृँवच्च।” the प्रातिपदिकम् “महत्” will undergo the same operations as a शतृँ-प्रत्ययान्त-शब्द:। This makes it उगित् (one that has an उक् letter as an इत्) and hence in the feminine 4-1-6 उगितश्च applies.
महत् + ङीप् 4-1-6
= महती 1-3-8, 1-3-3

महान्तो द्रुमा यस्यां सा = महाद्रुमा (अशोकवनिका)
महत् जस् द्रुम जस् 2-2-24
= महत् द्रुम 1-2-46, 2-4-71
= मह आ द्रुम 6-3-46
= महाद्रुम 6-1-101
In the feminine –
महाद्रुम + टाप् 4-1-4
= महाद्रुमा 1-3-7, 1-3-3, 6-1-101

“इट्”-आगम: in the form गमिष्यामि is by 7-2-70 ऋद्धनोः स्ये।

चतुर्दशः सर्गः

अशोकवनिकाप्राकारमवप्लुत्य प्राकारस्थ एव वनरामणीयकं पश्यन्वनं प्रविश्य वृक्षाद्वृक्षान्तरेष्ववप्लुत्य सीतां विचिन्वानो हनुमान् कंचिच्छिंशुपावृक्षं ददर्श । तदुपान्ताद्वहन्तीं सरितं दृष्टवा संध्योपास्त्याद्यर्थमत्र सीतागमनं भवेदिति संभावयञ्छिंशुपामधिरुह्य पर्णनिबिडविटपेषु निलीयावस्थितोऽभूत्।

“Leaping down to the enclosure of the Aśoka grove and watching the loveliness of the grove from the top of the wall, Hanumān enters the grove and, leaping from tree to tree in the course of his search for Sītā, catches sight of a Śiṁśupā tree. Espying a stream running beside it and expecting that Sītā might turn up on the bank of the stream to say her Sandhyā prayers, he takes up his position on that Aśoka tree, hiding himself behind its leafy boughs.”

अवप्लुत्य 3-4-21, 2-2-18, 7-1-37, 6-1-71
अधिरुह्य, निलीय 3-4-21, 2-2-18, 7-1-37

ष्ठा गतिनिवृत्तौ १. १०७७ = स्था (6-1-64, “निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपाय:”)
प्राकारे तिष्ठति इति प्राकारस्थ:। (ref. गीता 6-9)
प्राकार ङि + स्था क 2-2-19, 3-1-92, 3-2-4, 3-4-67, 1-2-43, 2-2-30
= प्राकार ङि + स्था अ 1-3-8
= प्राकार ङि + स्थ् अ 3-4-114, 6-4-64
= प्राकारस्थ 1-2-46, 2-4-71

रमणीय 3-1-96, 8-4-2
रमणीयस्य भाव: (कर्म वा) = रामणीयकम् (= रमणीयत्वम्)।
रमणीय ङस् + वुञ् 5-1-132
= रमणीय + अक 1-3-3, 1-2-46, 2-4-71
= रामणीय + अक 7-2-117
= रामणीय् + अक 1-4-18, 6-4-148
= रामणीयक

अन्यो वृक्ष: = वृक्षान्तरम् 2-1-72
(ref. गीता 2-13 – देहान्तरम्)
अन्यो राजा = राजान्तरम् (सिद्धान्तकौमुदी)

चिञ् चयने ५. ५
चि + शानच् 3-2-123, 3-2-124, 1-3-72, 1-4-100
चि + नु + आन 3-1-73, 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
चिन्वान 6-1-87. Note: 7-2-82 doesn’t apply because the अङ्गम् “चिनु” does not end in a अकार:।
चिन्वान + सुँ 4-1-2 = चिन्वानः 1-3-2, 8-2-66, 8-3-15
विचिन्वानः 2-2-18

दृशिर् प्रेक्षणे १. ११४३
दृश् + लिँट् 3-2-115
दृश् ल् 1-3-2, 1-3-3
दृश् णल् 3-4-78, 3-4-82 (3-4-115 stops 3-1-68)
दृश् अ 1-3-7, 1-3-3
दृश् दृश् अ 6-1-8
दर् श् दृश् अ 7-4-66, 1-1-51
द दृश् अ 7-4-60
ददर्श 7-3-86, 1-1-51

वहन्ती – “नुँम्”-आगम: by 7-1-81

उपगतोऽन्तम् = उपान्त: (adjective) – 2-2-18 वार्त्तिकम् – अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयया।

verse 1:
लताप्रतानैर्बहुभिः पर्णैश्च बहुभिर्वृताम् ।। ५-१४-३६।।
काञ्चनीं शिंशुपामेकां ददर्श स महाकपिः।
वृतां हेममयीभिस्तु वेदिकाभिः समन्ततः ।। ५-१४-३७।।

“That mighty monkey (then) sighted a singular golden Śimśapā (Aśoka) tree intertwined with numerous clusters of climbers and clothed with abundant leaves, and actually surrounded on all sides by golden daisies.”

लतानां प्रताना: = लताप्रताना: 2-2-8, तै:

एकाम् = मुख्याम् = वृक्षान्तरसम्बन्धरहिताम्

महाकपिः 6-3-46

हेम्न: विकार: = हेममयम्
हेमन् ङस् मयट् 4-3-143, 4-3-135
= हेमन् मय 1-3-3, 1-2-46, 2-4-71
= हेममय 1-4-17, 8-2-7

स्त्रियाम् –
हेममय + ङीप् 4-1-15
= हेममय + ई 1-3-8, 1-3-3
= हेममय् ई 1-4-18, 6-4-148
= हेममयी

समन्तत: = समन्तात्।
तसिप्रकरण आद्यादिभ्य उपसङ्ख्यानम्। 5-4-44 वार्त्तिकम्।

पञ्चदशः सर्गः

शिंशुपाग्रेऽवस्थाय सर्वतश्चक्षुषी प्रचारयन्हनुमांश्चैत्यप्रासादगतां यथावर्णितगुणावस्थोपलक्षितां तां विलोक्य तस्याः सीतात्वं निर्धारयति ।

“Casting his eyes all round while remaining perched on the top of that Śimśapā tree, Hanumān catches sight of Sītā in a temple and recognizes her by virtue of her characteristics and age.”

अवस्थाय 3-4-21, 7-1-37

लोकृँ – [भाषार्थः] १०. ३०७
लोक् + णिच् 3-1-25 = लोक् + इ 1-3-7, 1-3-3 = लोकि 3-1-32
विलोक्य 3-4-21, 2-2-18, 7-1-37, 6-4-51

चरँ गत्यर्थ: १. ६४०
चर् + णिच् 1-3-2, 3-1-26
= चारि 1-3-7, 1-3-3, 7-2-116, 3-1-32

चारि + लँट् 3-2-123
= चारि + शतृँ 3-2-124
= चारि + शप् + शतृँ 3-1-68
= चारि + अ + अत् 1-3-8, 1-3-2, 1-3-3
= चारे अ अत् 7-3-84
= चारयत् 6-1-78, 6-1-97

चारयत् + सुँ 4-1-2
= चारयन्त् + सुँ 1-1-43, 7-1-70, 1-1-47, 1-3-2, 1-3-3
= चारयन् 1-3-2, 6-1-68, 8-2-23. After this 8-2-7 cannot apply because of 8-2-1.

चैत्यप्रासादगताम् 2-1-24

वर्णितमनतिक्रम्य = यथावर्णितम् 2-1-6

सीताया: भाव: = सीतात्वम् 5-1-119

धृञ् धारणे १. १०४७
धृ + णिच् 3-1-25/3-1-26
= धारि 1-3-7, 1-3-3, 7-2-115, 1-1-51, 3-1-32

धारि + लँट् 3-2-123
= धारि + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 3-4-78
= धारि + शप् + तिप् 3-1-68
= धारि अ ति 1-3-8, 1-3-3
= धारयति 7-3-84, 6-1-78

सुखार्हां दुःखसंतप्तां व्यसनानामकोविदाम्।
तां विलोक्य विशालाक्षीमधिकं मलिनां कृशाम्॥५-१५-२६॥
तर्कयामास सीतेति कारणैरुपपादिभिः॥ ५-१५-२७॥

“Beholding that large-eyed woman, who looked very untidy and emaciated, who had never known calamities (before) and who, though deserving of comforts, was stricken with sorrow, Hanumān guessed her to be Sītā on convincing grounds.”

सुखमर्हति = सुखार्हा।
सुख अम् + अर्ह् अच् 2-2-19, 3-1-92, 3-2-12 अर्हः (अणोऽपवादः। स्त्रीलिङ्गे विशेषः। पूजार्हा ब्राह्मणी।), 1-2-43, 2-2-30
= सुख + अर्ह् अ 1-3-3, 1-2-46, 2-4-71
= सुखार्ह 6-1-101
स्त्रियाम् –
सुखार्ह + टाप् 4-1-4 = सुखार्हा 1-3-7, 1-3-3, 6-1-101
Ref. गीता 2-4 पूजार्हौ।

दुःखेन संतप्ता दुःखसंतप्ता 2-1-32, तां दुःखसंतप्ताम्।

न कोविदा = अकोविदा 2-2-6, 6-3-73
अकोविदा = अविज्ञात्री (इति शिरोमणि-व्याख्या)।

विशाले अक्षिणी यस्याः सा विशालाक्षी, तां विशालाक्षीम्।

विशाल औ अक्षि औ 2-2-24, 2-2-35
= विशाल अक्षि 1-2-46, 2-4-71
= विशालाक्षि 6-1-101
= विशालाक्षि + षच् 5-4-113
= विशालाक्षि + अ 1-3-6, 1-3-3
= विशालाक्ष् + अ 1-4-18, 6-4-148
= विशालाक्ष

स्त्रियाम् –
विशालाक्ष + ङीष् 4-1-41 षिद्गौरादिभ्यश्च
= विशालाक्ष + ई 1-3-8, 1-3-3
= विशालाक्ष् + ई 1-4-18, 6-4-148
= विशालाक्षी

तर्कँ भाषार्थः (ऊहेऽप्ययमिति मैत्रेय:)
तर्क् + णिच् 3-1-25. “णिच्” gets आर्धधातुक-सञ्ज्ञा by 3-4-114
= तर्क् + इ 1-3-3, 1-3-7
= तर्कि
“तर्कि” gets धातु-सञ्ज्ञा by 3-1-32
तर्कि + लिँट् 3-2-115
तर्कि आम् + लिँट् 3-1-35
तर्कय् + आम् + लिँट् 6-4-55
तर्कय् + आम् 2-4-81, 1-1-62, 1-2-46
तर्कयाम् + सुँ 4-1-2
तर्कयाम् 2-4-81
तर्कयाम् + अस् + लिँट् 3-1-40
तर्कयाम् + अस् + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 3-4-78
तर्कयाम् + अस् + णल् 3-4-82
तर्कयाम् + अस् + अ 1-3-7, 1-3-3
तर्कयाम् + अस् अस् + अ 6-1-8
तर्कयाम् + अ अस् + अ 7-4-60
तर्कयाम् + आ अस् + अ 7-4-70
तर्कयाम् + आस् + अ 6-1-101 = तर्कयामास।

पदँ गतौ ४. ६५
पद् + णिच् 3-1-26
= पादि 1-3-7, 1-3-3, 7-2-116
“पादि” gets धातु-सञ्ज्ञा by 3-1-32
उप पादि णिनिँ 2-2-19, 3-1-92, 3-2-78
= उप पादि इन् 1-3-7, 1-3-2
= उपपादिन् 6-4-51

उपपादिभि: = सीतात्वनिश्चयोपपादनसमर्थै:।

षोडशः सर्गः

सीतायाः शुभशीललक्षणादि प्रशंसन्हनुमान्यस्याः कृते खरविराधादयो हताः सेयमप्येतादृशीं दुरवस्थामनुभवतीति परिशोचति ।

“Admiring the virtue and propitious bodily marks etc., of Sītā, Hanumān grieves at the thought of that lady, for whose sake Khara, Virādha and others ogres were killed, having been reduced to such a sad plight.”

शीलं च लक्षणानि च = शीललक्षणानि 2-2-29
शुभानि च तानि शीललक्षणानि = शुभशीललक्षणानि 2-1-57
शुभशीललक्षणान्यादीनि यस्य तत् = शुभशीललक्षणादि 2-2-24

शन्सुँ स्तुतौ १. ८२९
शन्स् + लँट् 3-2-123
= शन्स् + शतृँ 3-2-124
= शन्स् + शप् + शतृँ 3-1-68
= शन्स् + अ + अत् 1-3-8, 1-3-2, 1-3-3
= शन्सत् 6-1-97

प्रशन्सत् 2-2-18

प्रशन्सत् + सुँ 4-1-2
= प्रशन्सन्त् + सुँ 1-1-43, 7-1-70, 1-1-47, 1-3-2, 1-3-3
= प्रशन्सन् 1-3-2, 6-1-68, 8-2-23. After this 8-2-7 cannot apply because of 8-2-1.
= प्रशंसन् 8-3-24

कृते – निमित्तार्थे एदन्तो निपात: – included in the चादि-गण: (आकृति-गण:)। 1-4-57
Gets अव्यय-सञ्ज्ञा by 1-1-37.
Ref. गीता 1-35

यस्याः – षष्ठी is by 2-3-26

खरश्च विराधश्च = खरविराधौ 2-2-29
खरविराधावादी येषां ते = खरविराधादय: 2-2-24

एष इव पश्यति (ज्ञानविषयो भवति) = एतादृश:।
दृशिँर् प्रेक्षणे (“इर्” gets the इत्-सञ्ज्ञा by the वार्त्तिकम् – इर इत्-सञ्ज्ञा वाच्या)
एतद् दृश् कञ् 2-2-19, 3-1-92, 3-2-60
= एतद् दृश् अ 1-3-8, 1-3-3
= एतआ दृश 6-3-91, 1-1-52
= एतादृश 6-1-101

स्त्रियाम् –
एतादृश + ङीप् 4-1-15
= एतादृश + ई 1-3-8, 1-3-3
= एतादृश् + ई 1-4-18, 6-4-148
= एतादृशी

दुरावस्था 2-2-18

इमामसितकेशान्तां शतपत्रनिभेक्षणाम् ।
सुखार्हां दुःखितां ज्ञात्वा ममापि व्यथितं मनः ॥ ५-१६-२८॥

My mind too is seized with anguish on finding this lady with dark long hanging hair and lotus-like eyes afflicted, though deserving of happiness.”

न सित: = असित: 2-2-6, 6-3-73

केशानामन्ता: = केशान्ता: 2-2-8

असिता: केशान्ता यस्या: सा = असितकेशान्ता 2-2-24, 4-1-4

शतं पत्राणि यस्य तत् = शतपत्रम् 2-2-24

भा दीप्तौ २. ४६
नि(= नियतम्)भाति = निभम् (सदृशम्)।
नि भा क 2-2-19, 3-1-92, 3-1-136, 3-4-67
= नि भा अ 1-3-8
= नि भ् अ 6-4-64
= निभ

शतपत्रेण निभम् = शतपत्रनिभम् 2-1-31

ईक्षँ दर्शने १.६९४
ईक्ष्यतेऽनेन = ईक्षणम् (नयनम्) 3-3-117

शतपत्रनिभे ईक्षणे (= नयने) यस्या: सा = शतपत्रनिभेक्षणा 2-2-24, 4-1-4, ताम्

सुखमर्हति = सुखार्हा।
सुख अम् + अर्ह् अच् 2-2-19, 3-1-92, 3-2-12 अर्हः (अणोऽपवादः। स्त्रीलिङ्गे विशेषः। पूजार्हा ब्राह्मणी।), 1-2-43, 2-2-30
= सुख + अर्ह् अ 1-3-3, 1-2-46, 2-4-71
= सुखार्ह 6-1-101
स्त्रियाम् –
सुखार्ह + टाप् 4-1-4 = सुखार्हा 1-3-7, 1-3-3, 6-1-101
Ref. गीता 2-4 पूजार्हौ।

सप्तदशः सर्गः

भगवति चन्द्रमस्याकाशमध्यमधिरोहति घोरविकृताननाभी राक्षसीभिः समन्ततो वेष्टितां जानकीं दृष्ट्वा हर्षनिर्भरलोचनो हनूमान्मनसा रामलक्ष्मणावभिवाद्य शिंशुपाग्रे निगूढस्तस्थौ ।

“His eyes filled with joy on beholding Sītā surrounded by ogresses with hideous and deformed faces while the moon was at the meridian, Hanumān mentally bows to Śrī Rāma and Lakṣmaṇa and remains hidden behind the boughs of the Śimśapā tree.”

सत्सप्तमी in भगवति, चन्द्रमसि and आरोहति is by 2-3-37 यस्य च भावेन भावलक्षणम्‌।
गीता examples 1-20, 1-41

रुहँ बीजजन्मनि प्रादुर्भावे च १. ९९५
Derivation of the प्रातिपदिकम् “अधिरोहत्” is similar to that of “प्रशंसत्” above.

घोराणि च विकृतानि च = घोरविकृतानि 2-2-29
घोराण्याननानि यासां ता: = घोरानना:। 2-2-18
विकृतान्याननानि यासां ता: = विकृतानना:। 2-2-18
घोराननाश्च विकृताननाश्च = घोरविकृतानना:। द्वन्द्वगर्भ-बहुव्रीहि: समास:।
“द्वन्द्वान्ते श्रूयमाणं पदं प्रत्येकमभिसम्बध्यते।”

हर्षेण निर्भरे = हर्षनिर्भरे 2-1-32
हर्षनिर्भरे लोचने यस्य स: = हर्षनिर्भरलोचन:। 2-2-18

वदँ व्यक्तायां वाचि १. ११६४
वद् + णिच् 3-1-26
= वादि 1-3-7, 1-3-3, 7-2-116, 3-1-32

वादि + क्त्वा 3-4-21
अभि वादि + क्त्वा 2-2-18
= अभि वादि + ल्यप् 7-1-37
= अभिवाद्य 1-3-8, 1-3-3, 6-4-51

गुहूँ संवरणे १. १०४३
गुह् + क्त 3-2-102, 1-1-26
= गुह् + त 1-3-8. (7-2-15 along with 7-2-44 stops 7-2-35)
= गुढ् + त 8-2-31
= गुढ् + ध 8-2-40
= गुढ् + ढ 8-4-41
= गु + ढ 8-3-13 (वचनसामर्थ्यात्)
= गूढ 6-3-111 (वचनसामर्थ्यात्)
निगूढ 2-2-18

ष्ठा गतिनिवृत्तौ १. १०७७ = स्था 6-1-64, परिभाषा “निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपाय:” (when as cause is gone, it’s effect is also gone)
स्था + लिँट् 3-2-115
= स्था + तिप् 3-4-78 (3-4-115 prevents 3-1-68)
= स्था + णल् 3-4-82
= स्था + स्था + णल् 6-1-8
= स्थ + स्था + णल् 7-4-59
= थ + स्था + णल् 7-4-61
= थ + स्था + औ 7-1-34
= तस्थौ 6-1-88, 8-4-54

नमस्कृत्वाथ रामाय लक्ष्मणाय च वीर्यवान् ।
सीतादर्शनसंहृष्टो हनुमान् संवृतोऽभवत् ॥ ५-१७-३२ ॥

“नमस्” optionally gets the गति-सञ्ज्ञा by 1-4-74 साक्षात्प्रभृतीनि च ।

The form should be नमस्कृत्य (8-3-40), नम: कृत्वा। (ref. गीता 11-35 नमस्कृत्वा = नमस्कृत्य। Also 9-34, 18-65 नमस्कुरु।)

वीर्यमस्यास्तीति वीर्यवान् 5-2-94, 8-2-9

सीताया दर्शनम् = सीतादर्शनम् 2-2-8
सीतादर्शनेन संहृष्ट: = सीतादर्शनसंहृष्ट: 2-1-32

“Having bowed down to Śrī Rāma and Lakṣmaṇa, the powerful Hanumān, who was over-joyed at the sight of Sītā, then went into hiding (once more behind the boughs).”

अष्टादशः सर्गः

शिंशुपाविटपाग्रस्थो हनुमानपररात्रे मदनपरवशं शतशः प्रमदावृतं सीतासविधं प्राप्नुवन्तं रावणं दृष्ट्वा तस्याङ्गप्रत्यङ्गस्फुटावलोकनाय शाखाग्रात्तूष्णीमवरुह्य शाखाधःप्रदेशे गूढं निलीय तस्थौ ।

“Perceiving Rāvaṇa surrounded by hundreds of young women and approaching Sītā towards the close of night, swayed by passion as he was, Hanumān, who was perched on the top of the Śimśapā tree, silently comes down in order to scan the figure of Rāvaṇa and hides himself under the boughs in order to avoid observation.”

शिंशुपाया: (शिंशपाया:) विटपस्याग्रम् = शिंशुपाविटपाग्रम्। 2-2-8

शिंशुपाविटपाग्रे तिष्ठतीति शिंशुपाविटपाग्रस्थ:। (ref. गीता 6-9)
ष्ठा गतिनिवृत्तौ १. १०७७ = स्था (6-1-64, “निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपाय:”)
शिंशुपाविटपाग्र ङि + स्था क 2-2-19, 3-1-92, 3-2-4, 3-4-67, 1-2-43, 2-2-30
= शिंशुपाविटपाग्र ङि + स्था अ 1-3-8
= शिंशुपाविटपाग्र ङि + स्थ् अ 3-4-114, 6-4-64
= शिंशुपाविटपाग्रस्थ 1-2-46, 2-4-71

अपरं रात्रे: = अपररात्र:।
अपर सुँ रात्रि ङस् 2-2-1 पूर्वापराधरोत्तरमेकदेशिनैकाधिकरणे, 1-2-43, 2-2-30
= अपर रात्रि 1-2-46, 2-4-71
= अपर रात्रि अच् (अ 1-3-3) 5-4-87 अहस्सर्वैकदेशसंख्यातपुण्याच्च रात्रेः ।
= अपर रात्र् अ 1-4-18, 6-4-148
= अपररात्र
This compound gets the masculine gender by 2-4-29 रात्राह्नाहाः पुंसि and not the feminine gender (by 2-4-26 परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः)
अपररात्र + सुँ 4-1-2 = अपररात्र: 1-3-2, 8-2-66, 8-3-15

तस्मिन् (अपररात्रे)।

परस्य वश: = परवश: 2-2-8
मदनेन परवश: = मदनपरवश: 2-1-32

शतशः 5-4-43

प्रमदाभिर्वृत: = प्रमदावृत: 2-1-32, तम्।

समाना विधा यस्य तत् = सविधम् (समीपम्) 2-2-24, 1-2-48, 6-3-84 व्याख्यानम्।
सीताया: सविधम् = सीतासविधम् 2-2-8

प्राप्नुवन्तम् is पुंलिङ्गे द्वितीया-एकवचनम् of the प्रातिपदिकम् “प्राप्नुवत्” (derivation is similar to that of “प्रशंसत्” above.)

अङ्गानि च प्रत्यङ्गानि च = अङ्गप्रत्यङ्गानि 2-2-29
स्फुटमवलोकनम् = स्फुटावलोकनम् – miscellaneous/general compound by 2-1-4 सह सुपा।
अङ्गप्रत्यङ्गानां स्फुटावलोकनम् = अङ्गप्रत्यङ्गस्फुटावलोकनम् 2-2-8, तस्मै।

अवरुह्य, निलीय 3-4-21, 2-2-18, 7-1-37

वृतः परमनारीभिस्ताराभिरिव चन्द्रमाः ।
तं ददर्श महातेजास्तेजोवन्तं महाकपिः ॥ ५-१८-२९॥

Surrounded by excellent women as the moon is by stars, the great monkey (Hanumān), who was endowed with extraordinary energy, (thus) beheld the glorious Rāvaṇa.”

परमाश्च ता नार्यश्च = परमनार्य: 2-1-57, 6-3-42

चन्द्रमा: is प्रथमा-एकवचनम् of the पुंलिङ्ग-प्रातिपदिकम् “चन्द्रमस्”। उपधा-दीर्घ: by 6-4-14 अत्वसन्तस्य चाधातोः।

दृशिर् प्रेक्षणे १. ११४३
दृश् + लिँट् 3-2-115
दृश् ल् 1-3-2, 1-3-3
दृश् णल् 3-4-78, 3-4-82 (3-4-115 stops 3-1-68)
दृश् अ 1-3-7, 1-3-3
दृश् दृश् अ 6-1-8
दर् श् दृश् अ 7-4-66, 1-1-51
द दृश् अ 7-4-60
ददर्श 7-3-86, 1-1-51

महत् तेजो यस्य स: = महातेजा: 2-2-24, 6-3-46
Declined like “चन्द्रमस्” in the masculine.

(प्रशस्तं) तेजोऽस्यास्तीति = तेजस्वान्, तं तेजस्वन्तम्।
तेजस् सुँ + मतुँप् 5-2-94
= तेजस् + मतुँप् 1-2-46, 2-4-71
= तेजस् + वतुँप् 8-2-9
= तेजस् + वत् 1-3-2, 1-3-3. Note: By 1-4-19, “तेजस्” gets the भ-सञ्ज्ञा। Hence 8-2-66 does not apply.
= तेजस्वत्। (Declined like “भगवत्”)।

महांश्चासौ कपिश्च = महाकपि: 2-1-57, 6-3-46

Dec 10th 2011

ताराभिश्चन्द्रमा इव नारीभिर्यो वृत:, तं रावणं महाकपिर्ददर्श।

एकोनविंशः सर्गः

रावणभयेन वेपमानायाः परिम्लानायाश्च जानक्यास्तात्कालिकमवस्थाविशेषं वर्णयितुमपारयन्निव कविरनेकोपमानैस्तां विशिनष्टि । प्राप्तो रावणस्तामावर्जयितुमुपक्रमते ।

“Finding himself unable as it were to depict the mental state of Sītā who got withered up and began to shudder at the sight of Rāvaṇa, the poet tries to portray her with the help of similes. Arrived in her presence, Rāvaṇa tries to win her.”

रावणाद्भयम् = रावणभयम् 2-1-37 पञ्चमी भयेन।

टुवेपृँ कम्पने १. ४२५
वेप् + लँट् 1-3-2, 1-3-5, 1-3-9, 3-2-123
= वेप् + शानच् 3-2-124, 1-4-100
= वेप् + शप् + शानच् 3-1-68
= वेप् + अ + आन 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
= वेप मुँक् + आन 7-2-82, 1-1-46
= वेपम् + आन 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9
= वेपमान
स्त्रियाम् –
वेपमान + टाप् 4-1-4
= वेपमाना 1-3-7, 1-3-3, 1-3-9, 6-1-101

म्लै हर्षक्षये १. १०५२
म्ला + क्त 6-1-45, 3-2-102, 1-1-26, 3-4-72
= म्ला + त 1-3-8
= म्लान 8-2-43
स्त्रियाम् –
म्लान + टाप् 4-1-4
= म्लाना 1-3-7, 1-3-3, 1-3-9, 6-1-101

परिम्लाना 2-2-18

जनकस्य अपत्यं स्त्री जानकी, तस्याः जानक्याः।
जनक ङस् + अण् 4-1-112
= जनक + अ 1-3-3, 1-2-46, 2-4-71
= जानक + अ 7-2-117
= जानक् + अ 1-4-18, 6-4-148
= जानक
स्त्रियाम् –
जानक + ङीप् 4-1-15
= जानक + ई 1-3-8, 1-3-3
= जानक् + ई 1-4-18, 6-4-148
= जानकी

अथवा – शेषविवक्षायाम्
जनकस्य इयम् जानकी, तस्याः जानक्याः।
जनक ङस् + अण् 4-1-83, 4-3-120
Remaining steps same as above.

स चासौ कालश्च = तत्काल: 2-1-57
तत्काले भवम् = तात्कालिकम्।
तत्काल ङि + ठञ् by आपदादिपूर्वपदात् कालात् – वार्त्तिकम् under 4-2-116
= तत्काल + ठ 1-3-3, 1-2-46, 2-4-71
= तत्काल + इक 7-3-50
= तात्काल + इक 7-2-117
= तात्काल् + इक 1-4-18, 6-4-148
= तात्कालिक

अवस्थानां विशेष: = अवस्थाविशेष: 2-2-8, तम्।

धातुः √वर्ण (चुरादि-गणः, वर्ण वर्णक्रियाविस्तारगुणवचनेषु, धातु-पाठः # १०. ४८४)

The ending अकारः of “वर्ण” is not a अनुनासिक: and hence does not get the इत्-सञ्ज्ञा by 1-3-2 उपदेशेऽजनुनासिक इत्।

वर्ण + णिच् । By 3-1-25. “णिच्” gets आर्धधातुक-सञ्ज्ञा by 3-4-114 आर्धधातुकं शेषः
= वर्ण् + णिच् । By 6-4-48 अतो लोपः, when an आर्धधातुकम् affix follows, the अकारः at the end of a अङ्गम् is elided if the अङ्गम् ends in a अकार: at the time when the आर्धधातुकम् affix is prescribed.
= वर्ण् + इ । अनुबन्ध-लोपः by 1-3-3 हलन्त्यम्, 1-3-7 चुटू, 1-3-9 तस्य लोपः।
= वर्णि ।
“वर्णि” gets धातु-सञ्ज्ञा by 3-1-32 सनाद्यन्ता धातवः।

वर्णि + तुमुँन् 3-4-65
= वर्णि + इतुम् 7-2-35, 1-1-46, 1-3-2, 1-3-3
= वर्णे + इतुम् 7-3-84
= वर्णयितुम् 6-1-78

शिषॢँ विशेषणे ७. १४
शिष् + लँट् 1-3-2, 1-3-9, 3-2-123
= शिष् + ति 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9, 3-4-78
= शि श्नम् ष् + ति 3-1-78, 1-1-47
= शिनष् + ति 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
= शिनष्टि 8-4-41
“वि” is the उपसर्ग: (ref. 1-4-59)
वि + शिनष्टि = विशिनष्टि 1-4-80

धातुः √पार (चुरादि-गणः, पार कर्मसमाप्तौ, धातु-पाठः # १०. ४८४)
“पारि” is derived similar to “वर्णि”।
पारि + शतृँ 3-2-123, 3-2-124, 1-3-74
पारि + शप् + शतृँ 3-1-68
पारि + अ + अत् 1-3-8, 1-3-3, 1-3-2
पारे + अ + अत् 7-3-84
पारय् + अ + अत् 6-1-78
पारयत् 6-1-97

धातुः √मा (मा माने २. ५७, माङ् माने शब्दे च ३. ७, माङ् माने ४. ३७)
उपमीयतेऽनेनेति = उपमानम्।
उप मा + ल्युट् 3-3-117
= उप मा + अन 1-3-8, 1-3-3, 7-1-1
= उपमान 6-1-101

अनेक 2-2-6, 6-3-73, 6-3-74
अनेकानि च तान्युपमानानि = अनेकोपमानानि 2-1-57, 6-1-87, तै:।

उपक्रमते – आत्मनेपदम् by 1-3-42 प्रोपाभ्यां समर्थाभ्याम्। (प्रोपाभ्यां प्रारम्भे इत्येव सुवचम्)।

वृजीँ वर्जने १०. ३४४
वृज् + णिच् । By 1-3-2, 3-1-25
= वर्ज् + इ । 1-3-3, 1-3-7, 7-3-86, 1-1-51
= वर्जि ।
“वर्जि” gets धातु-सञ्ज्ञा by 3-1-32 सनाद्यन्ता धातवः।
वर्जयितुम् is derived similarly to वर्णयितुम् above.
आवर्जयितुम् 2-2-18

समीक्षमाणां रुदतीमनिन्दितां सुपक्ष्मताम्रायतशुक्ललोचनाम्।
अनुव्रतां राममतीव मैथिलीं प्रलोभयामास वधाय रावणः॥ ५-१९-२२॥

Rāvaṇa, to his (own) destruction, sought to seduce Sītā (the princess of Mithilā), who was looking around weeping, irreproachable as she was, had large reddish and white eyes with beautiful lashes and was excessively devoted to Śrī Rama.”

१.६९४ ईक्षँ दर्शने
ईक्ष् + लँट् 1-3-2, 1-3-9, 3-2-123
ईक्ष् + शानच् 3-2-124, 1-4-100
ईक्ष् + शप् + शानच् 3-1-68
ईक्ष् + अ + आन 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
ईक्ष् + अ मुँक् + आन 7-2-82, 1-1-46
ईक्षम् + आन 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9
ईक् ष् अ म् आ न
ईक्षमाण 8-4-2
स्त्रियाम् –
ईक्षमाण + टाप् 4-1-4
= ईक्षमाणा 1-3-7, 1-3-3, 1-3-9, 6-1-101
समीक्षमाणा 2-2-18

रुदिँर् अश्रुविमोचने २. ६२
“इर्” gets इत्सञ्ज्ञा by the वार्तिकम् – इर इत्सञ्ज्ञा वाच्या।
रुद् + लँट् 1-3-9, 3-2-123
= रुद् + शतृँ 3-2-124
= रुद् + शप् + शतृँ 3-1-68
= रुद् + शतृँ 2-4-72
= रुद् + अत् 1-3-8, 1-3-2
= रुदत्
स्त्रियाम् –
रुदत् + ङीप् 4-1-6 = रुदती 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
Note: 7-1-80/7-1-81 doesn’t apply.

णिदिँ कुत्सायाम् १. ६९
= निद् 6-1-65, 1-3-2, 1-3-9
= निनुँम्द् 7-1-58, 1-1-47
= निन्द् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9
निन्द् + क्त 3-2-102, 1-1-26
= निन्द् + त 1-3-8, 1-3-9
= निन्दित 7-2-35. Note: 6-4-24 does not apply.
स्त्रियाम् –
निन्दित + टाप् 4-1-4
निन्दिता 1-3-7, 1-3-3, 6-1-101
न निन्दिता = अनिन्दिता 2-2-6, 6-3-73, ताम् अनिन्दिताम्

सु (= शोभनानि) पक्ष्माणि यस्य तत् = सुपक्षम (लोचनम्) 2-2-24, 2-2-35
सुपक्ष्मणी (क्रोधेन रोदनेन वा) ताम्रे (ताम्रप्रान्ते) आयते शुक्ले लोचने यस्याः सा = सुपक्ष्मताम्रायतशुक्ललोचना 2-2-24, 2-2-35, 4-1-4, 6-1-101, ताम्।

अनुकूलं व्रतं (कर्म) यस्या: सा = अनुव्रता 2-2-24, 4-1-4

लुभँ विमोहने ६.२५
लुभ् + णिच् 1-3-2, 3-1-26
= लोभि 1-3-3, 1-3-7, 7-3-86, 3-1-32
लोभि + लिँट् 3-2-115
= लोभयामास
Steps are similar to those for ताडयामास shown above.
प्रलोभयामास 1-4-59, 1-4-80

विंशः सर्गः

चाटुवचनोपन्यासै: सीतां प्रति प्रलोभयन्रावण: प्ररोचनपूर्वं स्वाङ्गीकारं प्रार्थयते ।

“Seeking to seduce Sītā by means of coaxing words, Rāvaṇa implores her to accept him.”

चाटुरूपाणि वचनानि = चाटुवचनानि 2-1-60 वार्त्तिकम् – समानाधिकरणाधिकारे शाकपार्थिवादीनाम् उपसङ्ख्यानम् उत्तरपदलोपश्च।
अथवा –
चाटूनां वचनानि = चाटुवचनानि 2-2-8
चाटुवचनानामुपन्यासा: = चाटुवचनोपन्यासा: 2-2-8, 6-1-87
अथवा –
चाटुवचनैरुपन्यासा: = चाटुवचनोपन्यासा: 2-1-32, 6-1-87

तैः चाटुवचनोपन्यासैः।

लुभँ विमोहने ६.२५
लुभ् + णिच् 1-3-2, 3-1-26
= लोभि 1-3-3, 1-3-7, 7-3-86, 3-1-32
लोभि + लँट् 3-2-123
= लोभि + शतृँ 3-2-124
= लोभि + शप् + शतृँ 3-1-68
= लोभि + अ + अत् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
= लोभे + अ + अत् 7-3-84
= लोभय + अत् 6-1-78
= लोभयत् 6-1-97
प्रलोभयत् 2-2-18

प्रलोभयत् + सुँ 4-1-2 = प्रलोभय नुँम् त् + सुँ 7-1-70, 1-1-47
= प्रलोभयन्त् स् 1-3-2, 1-3-3 = प्रलोभयन्त् 6-1-68
= प्रलोभयन् 1-1-62, 1-4-14, 8-2-23 (after this 8-2-7 cannot apply because of 8-2-1.)

स्वस्याङ्गम् = स्वाङ्गम् 2-2-8
अस्वाङ्गं स्वाङ्गं सम्पद्यते तस्य करणम् = स्वाङ्गीकार:।
स्वाङ्ग सुँ + च्विँ 5-4-50
= स्वाङ्ग च्विँ 1-2-46, 2-4-71
= स्वाङ्ग 1-3-2, 1-3-7, 6-1-67
= स्वाङ्गी 7-4-32

स्वाङ्गी gets the गति-सञ्ज्ञा by 1-4-61 ऊर्यादिच्विडाचश्च and अव्यय-सञ्ज्ञा by 1-4-56 प्राग्रीश्वरान्निपाताः, 1-1-37 स्वरादिनिपातमव्ययम्।

स्वाङ्गी कृ + घञ् 3-3-18, 2-2-18
= स्वाङ्गी कृ + अ 1-3-8, 1-3-3
= स्वाङ्गी कार् + अ 7-2-115, 1-1-51
= स्वाङ्गीकार

स्वाङ्गीकार + अम् 4-1-2 = स्वाङ्गीकारम् 6-1-107

अर्थ उपयाच्ञायाम् १०.४४७
अर्थ + णिच् 3-1-25
= अर्थ + इ 1-3-3, 1-3-7, 1-3-9
= अर् थ् + इ 6-4-48
= अर्थि 3-1-32
अर्थि + लँट् 3-2-123
= अर्थि + त 3-4-78, 1-3-74
= अर्थि + ते 3-4-79
= अर्थि + शप् + ते 3-1-68
= अर्थि + अ + ते 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
= अर्थे + अ + ते 7-3-84
= अर्थयते 6-1-78

प्र + अर्थयते 1-4-59, 1-4-80
प्रार्थयते 6-1-101

पिब विहर रमस्व भुङ्क्ष्व भोगान् धननिचयं प्रदिशाभि मेदिनीं च।
मयि लल ललने यथासुखं त्वं त्वयि च समेत्य ललन्तु बान्धवास्ते॥ ५-२०-३५॥

(Therefore) drink, sport, revel and enjoy pleasures. Bestow (on your relatives) the (immense) store of wealth (that you will own from now on wards) as well as the earth (that will now be yours.) Enjoy you life according to your pleasure, depending on me, O beloved one, and, reaching your presence, let your relatives (too) enjoy life.”

पा पाने १.१०७४
पा + लोँट् 3-3-162
= पा + सिप् 3-4-78
= पा + सि 1-3-3, 1-3-9
= पा + हि 3-4-87
= पा + शप् + हि 3-1-68
= पिब + शप् + हि 7-3-78
= पिब + अ + हि 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
= पिब हि 6-1-97
= पिब 6-4-105

हृञ् हरणे १.१०४६
हृ + लोँट् 3-3-162
= हृ + सिप् 3-4-78
= हृ + सि 1-3-3, 1-3-9
= हृ + हि 3-4-87
= हृ + शप् + हि 3-1-68
= हृ + अ + हि 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
= हर् + अ + हि 7-3-84, 1-1-51
= हर 6-4-105
विहर 1-4-59, 1-4-80

रमुँ क्रीडायाम् १.९८९
रम् + लोँट् 3-3-162
= रम् + थास् 3-4-78
= रम् + से 3-4-80
= रम् + स्व 3-4-91
= रम् + शप् + स्व 3-1-68
= रम् + अ + स्व 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
= रमस्व

भुजँ पालनाभ्यवहारयोः ७. १७
भुज् + लोँट् 3-3-162
= भुज् + थास् 3-4-78, 1-3-66
= भुज् + से 3-4-80
= भुज् + स्व 3-4-91
= भुश्नम्ज् + स्व 3-1-78, 1-1-47
= भुनज् + स्व 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
= भुन्ज् + स्व 1-2-4, 6-4-112
= भुन्ग् + स्व 8-2-30
= भुंग् + स्व 8-3-24
= भुंग् + ष्व 8-3-59
= भुंक् + ष्व 8-4-55
= भुङ्क् + ष्व 8-4-58
= भुङ्क्ष्व

धनस्य निचयः धननिचयः 2-2-8, तं धननिचयम्

दिशँ अतिसर्जने ६.३
दिश् + लोँट् 3-3-162
= दिश् + सिप् 3-4-78
= दिश् + हि 1-3-3, 3-4-87
= दिश् + श + हि 3-1-77
= दिश् + अ + हि 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9. 7-3-86 won’t apply due to 1-2-4, 1-1-5
= दिश 6-4-105
प्रदिश 1-4-59, 1-4-80

ललँ विलासे १.४१६
लल् + लोँट् 3-3-162
= लल् + सिप् 3-4-78
= लल् + सि 1-3-3, 1-3-9
= लल् + हि 3-4-87
= लल् + शप् + हि 3-1-68
= लल् + अ + हि 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
= लल 6-4-105

सुखमनतिक्रम्य = यथासुखम् 2-1-6, 2-4-83, 6-1-107

इण् गतौ २.४०
इ + क्त्वा 3-4-21
सम् आ इ ल्यप् 1-4-60, 2-2-18, 7-1-37
= सम् आ इ य 1-3-8, 1-3-3
= समे य 6-1-87
= समेत्य 6-1-86, 6-1-71, 1-1-46

ललँ विलासे १.४१६
लल् + लोँट् 3-3-162
= लल् + झि 3-4-78
= लल + झु 3-4-86
= लल् + शप् + झु 3-1-68
= लल् + अ + झु 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
= लल + अन्तु 7-1-3
= ललन्तु 6-1-97

बन्धुः एव बान्धवः
बन्धु + अण् 5-4-38
= बन्धु + अ 1-3-3, 1-3-9
= बान्धु + अ 7-2-117
= बान्धो + अ 6-4-146
= बान्धव 6-1-78

Dec 24th 2011

एकविंशःसर्गः

मध्ये तृणप्रक्षेपेण दु:संसर्गं निवार्य साम्ना हितोपदेशपूर्वकं रावणं प्रबोधयन्ती सीता रामगुणान्प्रस्तुत्य तेन सख्यविरोधाभ्यां जायमानशुभाशुभफलं प्रदर्श्य तस्मै आत्मसमर्पणेन सख्यं सम्पादयेत्युपदिशति।

“Placing a blade of grass between herself and Rāvaṇa in order to avoid direct contact with a man of evil intentions and expostulating with him by showing him the right path, Sītā praises Śrī Rāma and, impressing on Rāvaṇa the consequences of the latter befriending and antagonizing Śrī Rāma, advises Rāvaṇa to make friends with Śrī Rāma through self-surrender.”

तृणस्य प्रक्षेपणम् = तृणप्रक्षेपणम् 2-2-8
तेन तृणप्रक्षेपणेन

दु: (= दुष्टः) संसर्गः = दुःसंसर्गः 2-2-18
तं दुःसंसर्गम्

वृञ् आवरणे १०.३४५
वृ + णिच् 3-1-25
= वृ + इ 1-3-3, 1-3-7, 1-3-9
= वारि 7-2-115, 1-1-51, 3-1-32
वारि + क्त्वा 3-4-21
= नि वारि + ल्यप् 2-2-18, 7-1-37
= निवारि + य 1-3-8, 1-3-3
= निवार् + य 6-4-51
= निवार्य

हितश्चासावुपदेशश्च = हितोपदेश: 2-1-57
हितोपदेश: पूर्वो यस्य तत् = हितोपदेशपूर्वकम् 2-2-24, 2-2-35. “कप्”-समासान्तप्रत्यय: by 5-4-154. This is an adverb (क्रियाविशेषणम्) for बोधयन्ती। Neuter gender by वार्त्तिकम् (under 2-4-18) – क्रियाविशेषणानां च क्लीबतेष्यते।

बुधँ अवगमने ४. ६८
बुध् + णिच् 3-1-26
= बुध् + इ 1-3-3, 1-3-7, 1-3-9
= बोधि 7-3-86, 3-1-32
बोधि + लँट् 3-2-123
= बोधि + शतृँ 3-2-124
= बोधि + शप् + शतृँ 3-1-68
= बोधि + अ + अत् 1-3-8, 1-3-3, 1-3-2
= बोधे + अ + अत् 7-3-84
= बोधय + अत् 6-1-78
= बोधयत् 6-1-97
स्त्रियाम् –
बोधयत् + ङीप् 4-1-6
= बोधयत् + ई 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
= बोधयनुँम् त् + ई 6-1-85, 7-1-81, 1-1-47
= बोधयन्ती 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9

रामस्य गुणाः रामगुणाः 2-2-8
तान् रामगुणान्

ष्टुञ् स्तुतौ २.३८
स्तु 6-1-64, निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः
स्तु + क्त्वा 3-4-21
= प्र स्तु + ल्यप् 2-2-18, 7-1-37
= प्र स्तु + य 1-3-8, 1-3-3
= प्र स्तु तुँक् + य 6-1-71
= प्रस्तुत्य 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9

सख्युर्भावः कर्म वा सख्यम्
सखि ङस् + य 5-1-126
= सखि + य 1-2-46, 2-4-71
= सख् + य 1-4-18, 6-4-148
= सख्य
सख्य + सुँ 4-1-2 = सख्य + अम् 7-1-24 = सख्यम् 6-1-107

सख्यं च विरोधश्च सख्यविरोधौ 2-2-29, ताभ्यां सख्यविरोधाभ्याम्।

न शुभम् = अशुभम् 2-2-6, 6-3-73
शुभं चाशुभं च = शुभाशुभे 2-2-29
शुभफलं चाशुभफलं च तयो: समाहार: = शुभाशुभफलम् 2-1-57, द्वन्द्वगर्भ-तत्पुरुष-समास:।
“द्वन्द्वान्ते श्रूयमाणं पदं प्रत्येकमभिसम्बध्यते” इति न्याय:।
जायमानं च तत् शुभाशुभफलम् = जायमानशुभाशुभफलम् 2-1-57

दृशिँर् प्रेक्षणे १.११४३
दृश् + णिच् 3-1-26
= दृश् + इ 1-3-3, 1-3-7, 1-3-9
= दर्शि 7-3-86, 1-1-51, 3-1-32

दर्शि + क्त्वा 3-4-21
प्र + दर्शि + ल्यप् 2-2-18, 7-1-37
= प्र + दर्शि + य 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
= प्रदर्श्य 6-4-51

आत्मनः समर्पणम् आत्मसमर्पणम् 2-2-8
तेन आत्मसमर्पणेन

पदँ गतौ ४. ६५
पद् + णिच् 3-1-26
= पादि 1-3-3, 1-3-7, 1-3-9, 7-2-116, 3-1-32 धातु-सञ्ज्ञा
पादि + लोँट् 3-3-162
= पादि + सिप् 3-4-78
= पादि + सि 1-3-3, 1-3-9
= पादि + हि 3-4-87
= पादि + शप् + हि 3-1-68
= पादि + अ + हि 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
= पादे + अ + हि 7-3-84
= पादय + हि 6-1-78
= पादय 6-4-105
सम् + पादय = सम्पादय 1-4-59, 1-4-80

दिशँ अतिसर्जने ६.३
दिश् + लँट् 3-2-123
= दिश् + तिप् 3-4-78
= दिश् + श + तिप् 3-1-77. 7-3-86 won’t apply due to 1-2-4, 1-1-5
= दिश् + अ + ति 1-3-8, 1-3-9
उप दिशति 1-4-59, 1-4-80

नहि गन्धमुपाघ्राय रामलक्ष्मणयोस्त्वया।
शक्यं सन्दर्शने स्थातुं शुना शार्दूलयोरिव ॥ ५-२१-३१॥

“It is not possible for you to stand within the sight of Śrī Rāma and Lakṣmaṇa even on smelling their presence, any more than a dog would tarry within the gaze of a pair of tigers.”

घ्रा गन्धोपादाने (घ्राणे) १.१०७५
घ्रा + क्त्वा 1-3-2, 3-4-21
उप आङ् घ्रा ल्यप् 2-2-18, 7-1-37
उप आ घ्रा य 1-3-8, 1-3-3
उपाघ्राय 6-1-101

शुना – तृतीया-एकवचनम्, प्रातिपदिकम् “श्वन्”। सम्प्रसारणम् by 6-4-133 श्वयुवमघोनामतद्धिते।

स्थातुम् – “तुमुँन्” by 3-4-65 शकधृषज्ञाग्लाघटरभलभक्रमसहार्हास्त्यर्थेषु तुमुन्। ref. गीता 1-30.

द्वाविंशः सर्गः

सीताकृतगर्हणेन क्रुद्धो रावणो मासद्वयं प्रतीक्ष्य त्वां मारयामीति जानकीं भीषयते । ततो रावणस्त्रीभिर्नेत्रसंकेतादिभिः कृताश्वासा पुना रावणं गर्हति । घोरविकृतनानाकृती राक्षसीस्तर्जनसान्त्वनादिना जानक्या आवर्जने विनियुज्य तर्जनोद्यतं रावणं धान्यमालिनी नाम तत्पत्नी ततो निवर्तयति। स च विमोहितः सन्नन्तःपुरिकाभिरन्तर्गृहं प्रविशति ।

“Nettled by the censure uttered by Sītā, Rāvaṇa allows her a time-limit of two months to revise her decision and threatens her with death if she does not listen to reason. Restored to confidence by the glances of Rāvaṇa’s consorts, however, Sītā condemns him once more. Leaving instructions with ogresses of terrible and ugly aspect to bring her to reason by recourse to intimidation and persuasion, Rāvaṇa thereupon leaves the presence of Sītā along with his womenfolk.”

Jan 14th 2012

गर्हँ कुत्सायाम् १.७२३
गर्हँ + ल्युट् 3-3-115
= गर् ह् + यु 1-3-2, 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
= गर् ह् + अन 7-1-1
= गर्हण 8-4-2, 1-2-46

सीतया कृतम् = सीताकृतम् 2-1-32
सीताकृतं च तत् गर्हणं च = सीताकृतगर्हणम् 2-1-57, तेन

क्रुधँ क्रोधे कोपे ४.८६
क्रुधँ + क्त 3-2-102, 1-1-26, 3-4-72
= क्रुध् + त 1-3-2, 1-3-8, 1-3-9. इण्-निषेध: by 7-2-10.
= क्रुध् + ध 8-2-40
= क्रुद् + ध 8-4-53
= क्रुद्ध 1-2-46
क्रुद्ध + सुँ 4-1-2 = क्रुद्धः

द्वाववयवावस्य = द्वयम्।
द्वि औ + तयप् 5-2-42
= द्वि + तय 1-3-3, 1-2-46, 2-4-71
= द्वि + अयच् 5-2-43
= द् व् + अय 1-3-3, 1-4-18, 6-4-148
= द्वय

मासयोः द्वयम् = मासद्वयम् 2-2-8

मृङ् प्राणत्यागे ६.१३
मृङ् + णिच् 3-1-25
= मृ + इ 1-3-7, 1-3-3, 1-3-9
= मारि 7-2-115, 1-1-51, 3-1-32

मारि + लँट् 3-2-123
= मारि + मिप् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9, 3-4-78
= मारि + शप् + मिप् 3-1-68
= मारि + अ + मि 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
= मारे + अ + मि 7-3-84
= मारय् + अ + मि 6-1-78
= मारयामि 7-3-101

ञिभी भये ३.२
भी + णिच् 3-1-25
= भीषुँक् + णिच् 7-3-40
= भीषि 3-1-32
भीषि + लँट् 3-2-123
= भीषि + त 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9, 3-4-78, आत्मनेपदम् by 1-3-68
= भीषि + ते 3-4-79
= भीषि + शप् + ते 3-1-68
= भीषि + अ + ते 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
= भीषे + अ + ते 7-3-84
= भीषय् + अ + ते 6-1-78 = भीषयते

रावणस्य स्त्रियः रावणस्त्रियः 2-2-8
ताभिः रावणस्त्रीभिः

कृत आश्वास: यस्या सा = कृताश्वासा।
कृत सुँ आश्वास सुँ 2-2-24, 2-2-36
= कृत आश्वास 1-2-46, 2-4-71
= कृताश्वास 6-1-101
कृताश्वास + टाप् 4-1-4
= कृताश्वासा 1-3-7, 1-3-3, 6-1-101

नेत्रेण सङ्केतः नेत्रसङ्केतः 2-1-32
नेत्रसङ्केत आदिर्येषां तानि नेत्रसङ्केतादीनि (चेष्टनानि) 2-2-24
तैर्नेत्रसङ्केतादिभिः।

पुना रावणम् 8-3-14, 6-3-111

घोरा विकृता नाना (विविधाः) आकृतयो यासाम् = घोरविकृतनानाकाकृतयः 2-2-24, 6-3-34
ता घोरविकृतनानाकाकृतीः (द्वितीया-बहुवचनम्)।

रक्ष एव राक्षसः।
रक्षस् सुँ अण् (स्वार्थे) 5-4-38 प्रज्ञादिभ्यश्च।
= रक्षस् अण् 1-2-46, 2-4-71
= राक्षस् अ 1-3-3, 7-2-117
= राक्षस
स्त्रियाम् –
राक्षस + ङीप् 4-1-15
= राक्षस् + ई 1-3-8, 1-3-3, 1-4-18, 6-4-148
= राक्षसी

तर्जनं च सान्त्वनं च तर्जनसान्त्वने 2-2-29
तर्जनसान्त्वने आदी यस्य तत् = तर्जनसान्त्वनादि 2-2-24
तेन तर्जनसान्त्वनादिना

तर्जने उद्यतः तर्जनोद्यतः 2-1-40

तस्य पत्नी तत्पन्ती 2-2-8

वृतुँ वर्तने १. ८६२
वृत् + णिच् 3-1-26
= वर्ति 1-3-3, 1-3-7, 1-3-9, 7-3-86, 1-1-51, 3-1-32 धातु-सञ्ज्ञा
वर्ति + लँट् 3-2-123
= वर्ति + शप् + तिप् 3-1-68, 1-3-74 (1-3-87)
= वर्ति + अ + ति 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
= वर्ते + अ + ति 7-3-84
= वर्तय् + अ + ति 6-1-78 = वर्तयति
नि + वर्तयति = निवर्तयति 1-4-59, 1-4-80

अन्त:पुरे नियुक्ता = अन्त:पुरिका।
अन्त:पुर ङि + ठक् 4-4-69 तत्र नियुक्तः
= अन्त:पुर ङि + इक 1-3-3, 7-3-50
= अन्त:पुर + इक 1-2-46, 2-4-71. 7-2-117 should have applied, but “सञ्ज्ञापूर्वो विधिरनित्य:” इति वृद्धेरभाव:।
= अन्त:पुर् + इक 1-4-18, 6-4-148
= अन्त:पुरिक
स्त्रियाम् –
अन्त:पुरिक + टाप् 4-1-4 = अन्त:पुरिका 1-3-7, 1-3-3, 6-1-101

नापसर्तुमहं शक्या तस्य रामस्य धीमतः ।
विधिस्तव वधार्थाय विहितो नात्र संशयः ।। ५-२२-२१ ।।

“Being the consort of that wise Śrī Rāma, I was not capable of being wrested (by you). My abduction is (only) a device ordained (by Providence) for bringing your destruction : there is no doubt about it.”

शक्य 3-1-99

धीमत: 5-2-94
धीमतस्तस्य रामस्य – “भार्या” इति शेष:।

सृ गतौ १.१०८५
सृ + तुमुँन् 3-4-65. इण्-निषेध: by 7-2-10
= सर्तुम् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9, 7-3-84, 1-1-51
अपसर्तुम् 2-2-18

Compare गीता – 11-53, 11-54

वध एव अर्थः 2-1-57, तस्मै।

विधि: 3-3-92 उपसर्गे घोः किः, 6-4-64

विहित: 7-4-42 दधातेर्हिः।

त्रयोविंशः सर्गः

रावणयोजिता एकजटाद्या राक्षस्यो रावणं प्रशंसन्त्यः सीतां प्रति तत्स्वीकारं रोचयन्ते ।

“Extolling Ravaṇa, Ekajaṭā and other ogresses posted in the Aśoka grove coax her to accept his proposal.”

योजिता 6-4-52
रावणेन योजिताः रावणयोजिताः 2-1-32

एका जटा यस्याः सा एकजटा 2-2-24, 6-3-34, 1-2-48, 4-1-4
आदौ भवा = आद्या 4-3-54, 4-1-4
एकजटा आद्या यासां ताः = एकजाटाद्या: (राक्षस्य:) 2-2-24, 1-2-48, 4-1-4

शंसुँ स्तुतौ दुर्गतावपीत्येके १.८२९
शंसुँ + लँट् 3-2-123
शंसुँ + शतृँ 3-2-124
शंसुँ + शप् + शतृँ 3-1-68
शंस् + अ + अत् 1-3-8, 1-3-3, 1-3-2
शंसत् 6-1-97
स्त्रियाम् –
शंसत् + ङीप् 4-1-6
शंसत् + ई 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
शंसनुँम् त् + ई 6-1-85, 7-1-81, 1-1-47
शंसन्ती 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9
प्रकर्षेण शंसन्ती प्रशंसन्ती 2-2-18

स्वी 5-4-50, 7-4-32, 1-4-61
स्वी कृ + घञ् 3-3-18 = स्वीकार: 7-2-115, 1-1-51
तस्य स्वीकार: = तत्स्वीकार: 2-2-8, तम्।

साधु ते तत्वतो देवि कथितं साधु भामिनि ।
गृहाण सुस्मिते वाक्यमन्यथा न भविष्यसि ।। ५-२३-१९ ।।

“Accept cheerfully, O lovely lady with sweet smiles, the advice which has been tendered to you in good spirit and in accordance with facts; or else you shall die.”

सु (= शोभनम्) स्मितं यस्याः सा = सुस्मिता।
सु स्मित सुँ 2-2-24
सुस्मित 1-2-46, 2-4-71
सुस्मित + टाप् 4-1-4 = सुस्मिता 1-3-7, 1-3-3, 6-1-101

देवि, भामिनि, सुस्मिते are all सम्बुद्ध्यन्ताः (vocative singulars.)

साधु ते कथितम्, साधु गृहाण – इति साधुशब्दद्वयस्य निर्वाह:। (गोविन्दराज:)।

साधु has been used here as an adverb as per the वार्त्तिकम् under 2-4-18 क्रियाविशॆषणानां च क्लीबतेष्यते (कर्मत्वं चेष्यते)।

चतुर्विंशः सर्गः

राक्षसीभिस्तर्जिताऽपि दृढहृदया सीता शच्यरुन्धतीप्रमुखाः पतिव्रता दृष्टान्तीकृत्य मरणाप्तेरपि न मे परपुरुषपरिग्रहः स्यादित्यकातरं प्रतिभाषते । परुषभाषणैर्नानायुधोद्यमनैश्च राक्षसीभिर्भीष्यमाणां रुदतीं च सीतां शिंशपास्थो हनुमाञ्छृणोति ।

“Citing the examples of Śacī, Arundhatī and other devoted wives, even though threatened by the ogresses, Sītā with a stout heart boldly proclaims her resolve not to submit to anyone else than her own husband even on pain of death. Hanumān silently watches her being menaced by the ogresses by means of harsh words and show of weapons, and weeping.”

दृढं हृदयं यस्याः सा दृढहृदया
दृढ सुँ + हृदय सुँ 2-2-24
दृढहृदय 1-2-46, 2-4-71
स्त्रियाम् –
दृढहृदय + टाप् 4-1-4
= दृढहृदया 1-3-3, 1-3-7, 1-3-9, 6-1-101

शची च अरुन्धती च शच्यरुन्धत्यौ 2-2-29
शच्यरुन्धत्यौ प्रमुखे यासां ताः शच्यरुन्धतीप्रमुखाः
शच्यरुन्धती औ प्रुमखा औ 2-2-24
शच्यरुन्धतीप्रुमखा 1-2-46, 2-4-71, 1-2-48, 4-1-4
शच्यरुन्धतीप्रुमखा + शस् = शच्यरुन्धतीप्रुमखाः

अदृष्टान्तं दृष्टान्तं संपद्यमानं कृत्वा = दृष्टान्तीकृत्य

दृष्टान्त अम् च्विँ 5-4-50 = दृष्टान्त 1-3-7, 1-3-2, 6-1-67, 1-2-46, 2-4-71 = दृष्टान्ती 7-4-32, 1-1-52 then
दृष्टान्तीकृत्य 1-4-61, 2-2-18, 3-4-21, 7-1-37, 6-1-71, 1-1-40

मरणस्य आप्तिः मरणाप्तिः 2-2-8
तस्या: मरणाप्तेः (पञ्चमी-एकवचनम्)

परश्चासौ पुरुषश्च परपुरुषः 2-1-57
ग्रह् + अप् 3-3-58 (अपवादः to घञ्)
= ग्रह 1-3-3
परिग्रहः 2-2-18
परपुरुषस्य परिग्रहः = परपुरुषपरिग्रहः 2-2-8

परुषाणि च तानि भाषणानि परुषभाषणानि 2-1-57
तैः परुषभाषणैः

नाना (विविधानि) च तानि आयुधानि च नानायुधानि 2-1-57
नानायुधानाम् उद्यमनम् = नानायुधोद्यमनम् 2-2-8
तैः नानायुधोद्यमनैः

ञिभी भये ३.२
भी + णिच् 3-1-26
भीषुँक् + णिच् 7-3-40, 1-1-46
भीष् + इ = भीषि 3-1-32
भीषि + लँट् 3-2-123
भीषि + शानच् 3-2-124, 1-3-13, 1-4-100
भीषि + यक् + शानच् 3-1-67
भीषि + य + आन 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
भीष् + य + आन 6-4-51
भीष्यम् आन 7-2-82, 1-1-46
भीष्यमाण 8-4-2, 1-2-46
स्त्रियाम् –
भीष्यमाण + टाप् 4-1-4
भीष्यमाणा 1-3-3, 1-3-7, 1-3-9, 6-1-101

शिंशपायां तिष्ठति = शिंशपास्थ: 3-2-4, 6-4-64

verse 1:

मानुषं मांसमास्वाद्य नृत्यामोऽथ निकुम्भिलाम् ।
एवं निर्भर्त्स्यमाना सा सीता सुरसुतोपमा ।
राक्षसीभिर्विरूपाभिर्धैर्यमुत्सृज्य रोदिति ।। ५-२४-४७ ।।

“Having enjoyed human flesh, we shall then dance in the presence of Goddess Bhadrakālī installed in the western quarter of Laṅkā (known by the name of Nikumbhilā)”. Losing her patience while being threatened thus by the monstrous ogresses, the said Sītā, who resembled the daughter of a god, began to cry.

“निकुम्भिला नाम लङ्कायाः पश्चिमभागवर्तिनी भद्रकाली तां नृत्यामस्तत्समीपं गत्वा नृत्याम:।” तिलक-टीका।

मनोरपत्यम् = मनुष्यः। जाताविति वचनादिह अपत्यग्रहणं व्युत्पत्तिमात्रार्थम्।
मनुषुँक् ङस् + यत् 4-1-161, 1-1-46
मनुषुँक् + यत् 1-2-46, 2-4-71
मनुष्य 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9

मनुष्यस्य इदं मानुषम् (adjective to मांसम्)
मनुष्य ङस् + अण् 4-1-83, 4-3-120
= मनुष्य + अ 1-3-3, 1-2-46, 2-4-71
= मानुष्य + अ 7-2-117
= मानुष्य् + अ 1-4-18, 6-4-148
= मानुष् + अ 6-4-151
= मानुष

ष्वदँ आस्वादने १०.३३६
स्वद् + णिच् 3-1-25
= स्वादि 7-2-116, 3-1-32
स्वादि + क्त्वा 3-4-21
= आङ् स्वादि ल्यप् 1-4-60, 2-2-18, 7-1-37
= आ स्वादि य 1-3-8, 1-3-3
= आस्वाद्य 6-4-51

नृतीँ गात्रविक्षेपे ४.१०
नृत् + लँट् 3-2-123
= नृत् + तिप् 3-4-78
= नृत् + श्यन् + मस् 3-1-69. Note: Since the सार्वधातुक-प्रत्यय: “श्यन्” is अपित्, by 1-2-4 it behaves ङिद्वत् – as if it has ङकार: as a इत्। This allows 1-1-5 to prevent 7-3-86 from applying.
= नृत् + य + मस् 1-3-8, 1-3-3, 1-3-4
= नृत्यामः 7-3-101, 8-2-66, 8-3-15

भर्त्सँ सन्तर्जने १०.२०२
भर् त् स् + णिच् 3-1-25
= भर्त्सि 3-1-32
भर्त्सि + लँट् 3-2-123
= भर्त्सि + शानच् 3-2-124, 1-3-13
= भर्त्सि + यक् + शानच् 3-1-67
= भर्त्सि + य + आन 1-3-8, 1-3-3
= भर् त् स् + य + आन 6-4-51
= भर्त्स्यमाण 7-2-82, 1-1-46, 8-4-2
स्त्रियाम् –
भर्त्स्यमाण + टाप् = भर्त्स्यमाणा 4-1-4, 6-1-101

सुरस्य सुता सुरसुता 2-2-8
सुरसुता उपमा यस्याः सा सुरसुतोपमा 2-2-24, 1-2-48, 4-1-4

सृजँ विसर्गे
सृज् + क्त्वा 1-3-2, 3-4-21
= वि सृज् ल्यप् 2-2-18, 7-1-37
= विसृज्य 1-3-8, 1-3-3

रुदिँर् अश्रुविमोचने २.६२ (“इर्” gets the इत्-सञ्ज्ञा by the वार्त्तिकम् – इर इत्-सञ्ज्ञा वाच्या)
रुद् + लँट् 1-3-9, 3-2-123
= रुद् + तिप् 3-2-78
= रुद् + शप् + तिप् 3-1-68
= रुद् + तिप् 2-4-72
= रुद् + ति 1-3-3
= रुद् + इति 7-2-76 रुदादिभ्यः सार्वधातुके, 1-1-46
= रोदिति 7-3-86

पञ्चविंश: सर्गः

राक्षसीगणसन्तर्जनं सोढुमसमर्था जानक्यशोकशाखामालम्ब्य रामादीनाक्रोशन्त्यश्रुधाराभिराप्लुतनेत्रा प्ररोदिति ।

“Unable to endure the threats of the ogresses and calling aloud Śrī Rāma and others, Sītā bursts into a wail.”

राक्षसीनां गणः राक्षसीगणः 2-2-8
राक्षसीगणानां (2-3-65) सन्तर्जनम् = राक्षसीगणसन्तर्जनम् 2-2-8

षहँ मर्षणे १.९८८
सह् + तुमुँन् 6-1-64, 3-4-65
= सह् + तुम् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9. इड्-विकल्प: by 7-2-48
= सढ् + तुम् 8-2-31
= सढ् + धुम् 8-2-40
= सढ् + ढुम् 8-4-41
= स + ढुम् 8-3-13 (वचनसामर्थ्यात् ष्टुत्वस्य असिद्धत्त्वं न)
= सोढुम् 6-3-112 (वचनसामर्थ्यात् ढकारलोपस्य असिद्धत्त्वं न)

अशोकस्य शाखा अशोकशाखा 2-2-8
ताम् अशोकशाखाम्

लबिँ शब्दे अवस्रंसने च १. ४३९
लन्ब् 1-3-2, 7-1-58, 1-1-47
लन्ब् + क्त्वा 3-4-21
= आङ् लन्ब् ल्यप् 2-2-18, 7-1-37
= आलन्ब्य 1-3-8, 1-3-3
= आलम्ब्य 8-3-24, 8-4-58

राम आदिर्येषां ते = रामादय: 2-2-24, तान्।

क्रुशँ आह्वाने रोदने च १.९९२
क्रुश् + लँट् 3-2-123
क्रुश् + शतृँ 3-2-124
क्रुश् + शप् + शतृँ 3-1-68
क्रुश् + अ + अत् 1-3-8, 1-3-3, 1-3-2
क्रोश + अत् 7-3-86
क्रोशत् 6-1-97
स्त्रियाम् –
क्रोशत् + ङीप् 4-1-6
क्रोशत् + ई 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
क्रोशनुँम् त् + ई 6-1-85, 7-1-81, 1-1-47
क्रोशन्ती 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9
आक्रोशन्ती 2-2-18

आप्लुते नेत्रे यस्याः सा = आप्लुतनेत्रा 2-2-24

धिगस्तु खलु मानुष्यं धिगस्तु परवश्यताम् ।
न शक्यं यत् परित्यक्तुमात्मच्छन्देन जीवितम् ।। ५-२५-२० ।।

“Shame indeed be upon the human state and shame upon dependence on others, due to which it is not possible for me (even) to yield up life of my own (free) will !”

द्वितीया विभक्ति: in मानुष्यम् and परवश्यताम् is by the व्याख्यानम् under 2-3-2
उभसर्वतसोः कार्या धिगुपर्यादिषु त्रिषु।

मनुष्यस्य भाव: मानुष्यम् = मनुष्यत्वम्।
मनुष्य ङस् + ष्यञ् 5-1-124
= मनुष्य + य 1-2-46, 2-4-71, 1-3-3, 1-3-6
= मानुष्य + य 7-2-117
= मानुष्य् + य 1-4-18, 6-4-148
= मानुष्य 6-4-151

परेषां वश: = परवश:। 2-2-8
परवशं गत: = परवश्य:।
परवश अम् + यत् 4-4-86
= परवश + य 1-2-46, 2-4-71, 1-3-3
= परवश्य 1-4-18, 6-4-148

परवश्यस्य भावः परवश्यता 5-1-119, तां परवश्यताम्

यत् is a अव्ययम् here – stands for यस्मात् or यत्र (मनुष्यदेहे)

त्यजँ हानौ १.११४१
त्यज् + तुमुँन् 3-4-65. इण्-निषेध: by 7-2-10
= त्यज् + तुम् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9
= त्यग् + तुम् 8-2-30
= त्यक्तुम् 8-4-55
परित्यक्तुम् 2-2-18

आत्मनः छन्दः आत्मच्छन्दः 2-2-8, 8-2-7, 8-2-2, 6-1-73, 8-4-40
तेन आत्मच्छन्देन = आत्मेच्छया।

षड्विंशः सर्गः

राक्षसीभिस्तर्ज्यमाना जानकी मारणेऽपि नैवाहं तदङ्गीकारमनुमंस्ये इति प्रतिजानाना स्वनयनार्थं रामानागमने कारणानि विकल्पयन्ती बहुशो विलपति ।

“Making up her mind not to submit to the advances of Rāvaṇa even on pain of death, when menaced by the ogresses, and indulging in speculation as to why Śrī Rāma was not turning up to rescue her, Sītā wails in various ways.”

तर्जँ भर्त्सने १.२५९
तर् ज् + लँट् (कर्मणि) 3-2-123, 3-4-69
= तर् ज् + यक् + शानच् 3-1-67, 3-2-124
= तर् ज् + य + आन 1-3-3, 1-3-8
= तर् ज् + यमुँक् आन 7-2-82, 1-1-46
= तर् ज् + यम् आन 1-3-2, 1-3-3
= तर्ज्यमान
स्त्रियाम् –
तर्ज्यमान + टाप् 4-1-4
= तर्ज्यमाना 1-3-3, 1-3-7, 1-3-9, 6-1-101

मृङ् प्राणत्यागे ६.१३९
मृ + णिच् 3-1-26
= मारि 7-2-115, 1-1-51, 1-3-3, 1-3-7, 3-1-32
मारि + ल्युट् 3-3-115
= मारि + अन 7-1-1, 1-3-8, 1-3-3
= मार् + अन 6-4-51
= मारण 8-4-2, 1-2-46

“अङ्गी” इति च्व्यन्तमव्ययम्। तत्पूर्वात्कृञो भावे घञ्।
अनङ्गम् अङ्गं सम्पद्यते
अङ्ग सुँ + च्विँ 5-4-50
= अङ्ग च्विँ 1-2-46, 2-4-71
= अङ्ग 1-3-2, 1-3-7, 6-1-67
= अङ्गी 7-4-32

अङ्गी gets the गति-सञ्ज्ञा by 1-4-61 ऊर्यादिच्विडाचश्च and अव्यय-सञ्ज्ञा by 1-4-56 प्राग्रीश्वरान्निपाताः, 1-1-37 स्वरादिनिपातमव्ययम्।

अङ्गी कृ + घञ् 3-3-18, 2-2-18
= अङ्गी कृ + अ 1-3-8, 1-3-3
= अङ्गी कार् + अ 7-2-115, 1-1-51
= अङ्गीकार

तस्य अङ्गीकार: तदङ्गीकार: 2-2-8, तम्

मनँ ज्ञाने ४.७३
मन् + लृँट् 3-3-13
= मन् + इट् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9, 3-4-78
= मन् + ए 1-3-3, 1-3-9, 3-4-79
= मन् + स्य + ए 3-1-33
= मन् + स्ये 6-1-97
= मंस्ये 8-3-24
अनु + मंस्ये 1-4-59, 1-4-80

ज्ञा अवबोधने ९.४३
ज्ञा + लँट् 3-2-123
= ज्ञा + शानच् 3-2-124, 1-3-46, 1-4-100
= ज्ञा + श्ना + शानच् 3-1-81
= जा + श्ना + शानच् 7-3-79
= जा + ना + आन 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9. (मुँक् by 7-2-82 not applicable)
= जानान 6-1-101, 1-2-46
स्त्रियाम् –
जानान + टाप् 4-1-4 = जानाना 1-3-3, 1-3-7, 1-3-9, 6-1-101
प्रतिजानाना 2-2-18

कृपूँ सामर्थ्ये १.८६६
कृप् + णिच् 3-1-26
= कल्पि 7-3-86, 1-1-51, 1-3-3, 1-3-7, 3-1-32, 8-2-18
कल्पि + लँट् 3-2-123
= कल्पि + शतृँ 3-2-124, 1-3-88, 1-4-99, 1-4-100
= कल्पि + शप् + शतृँ 3-1-68
= कल्पे + अ + अत् 1-3-8, 1-3-3, 1-3-2, 7-3-84
= कल्पय् + अत् 6-1-78
= कल्पयत् 6-1-97
स्त्रियाम् –
कल्पयत् + ङीप् 4-1-6
= कल्पयत् + ई 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
= कल्पयनुँम्त् त् + ई 6-1-85, 7-1-81, 1-1-47
= कल्पयन्ती 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9
विकल्पयन्ती 2-2-18

गमॢँ गतौ १.११३७
गम् + ल्युट् (भावे) 3-3-115 = गमनम् 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9, 7-1-1
आङ् + गमनम् = आगमनम् 1-3-3, 1-3-9, 2-2-18
न आगमनम् अनागमनम् 2-2-6, 6-3-73, 6-3-74
रामस्य अनागमनम् = रामानागमनम् 2-2-8, 6-1-101. तस्मिन् रामानागमने

धन्याः खलु महात्मानो मुनयः सत्यसम्मताः ।
जितात्मानो महाभागा येषां न स्तः प्रियाप्रिये ।। ५-२६-४७ ।।

“Happy indeed are the magnanimous and highly blessed hermits by whom the (hightest) Reality has been fully recognized as their (very) self and who have subdued the self and in whose eyes the pleasing and the displeasing do not exist.”

महान् आत्मा येषां ते महात्मानः 2-2-24, 6-3-46

सत्यं (= ब्रह्म) सम्मतम् (आत्मत्वेन) येषां ते = सत्यसम्मता: 2-2-24, 2-2-37

जितः आत्मा यैः ते जितात्मानः 2-2-24

भजँ सेवायाम् १. ११५३
भज्यते इति भाग:। “भागो भाग्यैकदेशयो:।”
महान् भागो येषां ते = महाभागा: 2-2-24, 6-3-46

प्रियं च अप्रियं च प्रियाप्रिये 2-2-29

सप्तविंशः सर्गः

स्वापोद्बुद्धा त्रिजटा सीतां तर्जयन्ती राक्षसीः प्रति मयाद्य रामाभ्युदयरावणापकर्षसूचकः स्वप्नो दृष्टोऽतो निवर्तध्वं सीतातर्जनादिति ता अपसारयति । अथ ताभिः प्रार्थिता सा स्वप्नवृत्तं निवेद्य सीताविजयाशंसकं शुभशकुनं दर्शयति ।।


Risen from sleep, an ogress, Trijaṭā by name, speaks to her companions, intimidating Sītā, of a dream she saw only a few minutes before, revealing the triumph of Śrī Rāma and the discomfiture of Rāvaṇa, and stops them from molesting Sītā. Pressed by them, she relates the dream to them and also speaks of the omens portending the triumph of Sītā.

रामस्य अभ्युदयः रामाभ्युदयः 2-2-8, 6-1-101
रावणस्य अपकर्षः रावणापकर्षः 2-2-8, 6-1-101
रामाभ्युदयश्च रावणापकर्षश्च रामाभ्युदयरावणापकर्षौ 2-2-29

सूचयति इति सूचकः
सूचँ पैशुन्ये १०.४१२
सूच् + णिच् 3-1-25
= सूचि 3-1-32
सूचि + ण्वुल् 3-1-133
= सूचि + वु 1-3-7, 1-3-3, 1-3-9
= सूचि + अक 7-1-1
= सूच् + अक 6-4-51 = सूचक

रामाभ्युदयरावणापकर्षयोः सूचकः = रामाभ्युदयरावणापकर्षसूचकः 2-2-8

वृतुँ वर्तने १.८६२
वृत् + लोँट् 3-3-162
= वृत् + ध्वम् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9, 3-4-78
= वृत् + ध्वे 3-4-79
= वृत् + ध्वम् 3-4-91
= वृत् + शप् + ध्वम् 3-1-68
= वृत् + अ + ध्वम् 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
= वर् त् + अ + ध्वम् 7-3-86, 1-1-51
= वर्तध्वम्
नि + वर्तध्वम् = निवर्तध्वम् 1-4-59, 1-4-80

सृ गतौ १.१०८५
सृ + णिच् 3-1-26
सारि 7-2-115, 1-1-51, 1-3-3, 1-3-7, 1-3-9, 3-1-32

= सारि + लँट् 3-2-123
= सारि + तिप् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9, 3-4-78
= सारि + शप् + तिप् 3-1-68
= सारि + अ + ति 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
= सारे + अ + ति 7-3-84
= सारयति 6-1-78
अप + सारयति = अपसारयति 1-4-59, 1-4-80

स्वप्ने वृत्तं स्वप्नवृत्तम् 2-1-40/2-1-41

सीतायाः विजयः सीताविजयः 2-2-8
सीताविजयस्य आशंसकम् (adjective to स्वप्तवृत्तम्) = सीताविजयाशंसकम् 2-2-8

शुभं शकुनम् = शुभशकुनम् 2-1-57

कृष्यमाणः स्त्रिया मुण्डो दृष्टः कृष्णाम्बरः पुनः ।
रथेन खरयुक्तेन रक्तमाल्यानुलेपनः ।। ५-२७-२४ ।।

“He was seen (in a dream) once more with a shaven head and robed in black, wearing a red garland and smeared with red sandal-paste and being pulled by a woman on a chariot drawn by asses”

कृषँ विलेखने ६.६
कृष् + लँट् 1-3-2, 1-3-9, 3-2-123
= कृष् + शानच् 3-2-124, 1-3-13, 1-4-100
= कृष् + यक् + शानच् 3-1-67
= कृष्य + आन 1-3-3, 1-3-8, 1-3-9
= कृष्य मुँक् + आन 7-2-82, 1-1-46
= कृष्यमाण 8-4-2

स्त्रिया 6-4-79

कृष्णमम्बरं यस्य स कृष्णाम्बरः 2-2-24

खरैर्युक्तः खरयुक्तः 2-1-32
तेन खरयुक्तेन

लिपँ उपदेहे ६.१६९
लिप् + ल्युट् 3-3-117
लिप् + अन 1-3-8, 1-3-9, 7-1-1
लेपन 1-2-46
अनुलेपन 2-2-18

मालैव माल्यम् by वार्त्तिकम् – 5-1-124 वार्त्तिकम् – चातुर्वर्ण्यादीनां स्वार्थ उपसङ्ख्यानम्।
चत्वार एव वर्णाः चातुर्वर्ण्यम्। (गीता 4-13)
सुखमेव सौख्यम्। (सौख्यं वा?)

माल्यं च अनुलेपनं च माल्यानुलेपने 2-2-29
रक्ते (रक्तवर्णे) माल्यानुलेपने यस्य स: = रक्तमाल्यानुलेपनः 2-2-24

ref. गीता 11-11

अष्टाविंशः सर्गः

रावणराक्षसीगणविहितभर्त्सनतर्जनाद्यसहिष्णुः सीता बहु विलप्य यावद्वेण्युद्बन्धनेनासुमोक्षण उद्युङ्क्ते तावदननुभूतपूर्वः शुभशकुन आविरासीत् ।।


The moment Sītā, who was unable to bear the reproaches and threats of the ogresses, endeavors after wailing a good deal to strangle herself to death with the cord used for tying her hair, a propitious omen never seen before appears on her person.

सहिष्णुः 3-2-136

नूनं स कालो मृगरूपधारी मामल्पभाग्यां लुलुभे तदानीम् ।
यत्रार्यपुत्रौ विससर्ज मूढा रामानुजं लक्ष्मणपूर्वजं च ।। ५-२८-१० ।।

It was surely the Time-Spirit who, having assumed the form of a deer, beguiled me, a woman of scanty fortune (that I am), at that time and to whom I, a stupid woman, despatched the two sons of my father-in-law, Lakṣmaṇa (a younger half-brother of Śrī Rāma) and Śrī Rāma (the eldest half-brother of Lakṣmaṇa).”

मृगस्य रूपं मृगरूपम् 2-2-8
मृगरूपं धरतीति मृगरूपधारी

धृञ् धारणे १.१०४७
मृगरूप अम् + धृ णिनिँ 2-2-19, 3-2-78
= मृगरूप धृ इन् 1-3-7, 1-3-2, 1-3-9, 1-2-46, 2-4-71
= मृगरूप धार् इन् 7-2-115, 1-1-51
= मृगरूपधारिन्

मृगरूपधारिन् + सुँ 4-1-2 = मृगरूपधारी 6-4-13

अल्पं भाग्यं यस्याः सा = अल्पभाग्या 2-2-24, 4-1-4
तामल्पभाग्याम्

लुभँ विमोहने ६.२५ इति परस्मैपदिधातुः। “लुलुभे” इत्यत्र तङार्ष:।

सृजँ विसर्गे ६.१५०
= सृज् + लिँट् 3-2-115, 1-3-2
= सृज् + मिप् 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9, 3-4-78
= सृज् + णल् 3-4-82
= सृज् + अ 1-3-7, 1-3-3, 1-3-9
= सृज् सृज् + अ 6-1-8, 1-1-59
= सर् ज् सृज् + अ 7-4-66, 1-1-51
= स सृज् + अ 7-4-60
= स सर् ज् + अ 7-3-86
= ससर्ज
वि + ससर्ज = विससर्ज 1-4-59, 1-4-80

अनु जातः इति अनुजः
= अनु + जन् ड 3-2-101
= अनु + जन् अ 1-3-7, 1-3-9
= अनु + ज् अ 6-4-143. डित्वसामर्थ्यादभस्यापि टेर्लोपः।
= अनुज

रामस्य अनुजः रामानुजः 2-2-8
तं रामानुजम्

पूर्वं जातः इति पूर्वजः (प्रक्रिया प्राग्वत्)
लक्ष्मणस्य पूर्वजः लक्ष्मणपूर्वजः 2-2-8
तं लक्ष्मणपूर्वजम्

तदानीम् 5-3-19, 5-3-1, 7-2-102

एकोनत्रिंशः सर्गः

कविः शुभशकुनान्निर्दिशति । पुरोपलब्धपुलकशकुनसाजात्यात्तेषां शुभत्वं निर्धारयन्ती सीता प्रहर्षमनुभवति ।।

The omens described. Concluding them to be auspicious from the thrill that ran through her body at their sight, Sītā experiences great joy.

शुभा: शकुनाः शुभशकुनाः 2-1-57
तान् शुभशकुनान्

दिशँ अतिसर्जने ६.३
दिश् + लँट् 3-2-123
= दिश् + तिप् 3-4-78
= दिश् + श + तिप् 3-1-77. 7-3-86 won’t apply due to 1-2-4, 1-1-5
= दिश् + अ + ति 1-3-8, 1-3-9
निर् दिशति 1-4-59, 1-4-80

पुरा उपलब्ध: = पुरोपलब्ध: 2-1-4 or 2-1-72
पुरोपलब्धपुलक: 2-1-57
पुरोपलब्धपुलक: च शकुनानि च = पुरोपलब्धपुलकशकुनानि 2-2-29

समाना जाति: यस्य स: = सजातिः 2-2-24, 6-3-84 (योगविभाग:)

सजातेः भावः साजात्यम्
सजाति ङस् + ष्यञ् 5-1-124
= सजाति य 1-2-46, 2-4-71, 1-3-6, 1-3-3, 1-3-9
= साजाति य 7-2-117
= साजात्य 1-4-18, 6-4-148

पुरोपलब्धपुलकशकुनानां साजात्यम् = पुरोपलब्धपुलकशकुनसाजात्यम् 2-2-8

तस्मात् पुरोपलब्धपुलकशकुनसाजात्यात् 2-3-25

निर्धारयन्ती derived similar to बोधयन्ती above.

तस्याः पुनर्बिम्बफलोपमोष्ठं स्वक्षिभ्रुकेशान्तमरालपक्ष्म ।
वक्त्रं बभासे सितशुक्लदंष्ट्रं राहोर्मुखाच्चन्द्र इव प्रमुक्तः ।। ५-२९-७ ।।


Again, her countenance with its lips resembling a (ripe) Bimba fruit (in color) and its beautiful eyes, shapely brows, lovely locks, curved eyelashes and set white teeth shone like the (full) moon released from the mouth of (the demon) Rahu.

बिम्बं च तत् फलं च बिम्बफलम् 2-1-57
बिम्बफलम् उपमा यस्य स बिम्बफलोपमः (adjective to ओष्ठः) 2-2-24, 1-2-48
बिम्बफलोपमौ ओष्ठौ यस्मिन् = बिम्बफलोपमोष्ठम् (वक्त्रम्) 2-2-24

सु (= शोभने) अक्षिणी भ्रुवौ केशान्ता: (अलका:) च यस्मिन् = स्वक्षिभ्रुकेशान्तम् (वक्त्रम्) 2-2-24, 6-3-61

अरालानि (= वक्राणि) पक्ष्माणि यस्मिन् = अरालपक्ष्म (वक्त्रम्) 2-2-24

सिता: (= स्वच्छा: अथवा नीरन्धत्वेन संसक्ता:) शुक्लदंष्ट्रा: यस्मिन् = सितशुक्लदंष्ट्रम् (वक्त्रम्) 2-2-24

षिञ् बन्धने ५. २, ९. ५

सि + क्त 6-1-64, 3-2-102, 1-1-26
= सित 1-3-8, 1-3-9. 7-2-10 stops 7-2-35.

भासृँ दीप्तौ १.७११
भास् + लिँट् 3-2-115, 1-3-2
= भास् + त 1-3-2, 1-3-3, 1-3-9, 3-4-78, 1-3-12
= भास् + एश् 3-4-81, 1-1-55
= भास् + ए 1-3-3, 1-3-9
= भास् भास् + ए 6-1-8
= भा भास् + ए 7-4-60
= भ भास् + ए 7-4-59
= ब भास् + ए 8-4-54
= बभासे

मुचॢँ मोचने ६.१६६
मुच् + क्त 3-2-102, 1-1-26
= मुच् + त 1-3-8, 1-3-9. 7-2-10 stops 7-2-35. 1-1-5 stops 7-3-86.
= मुक्त 8-2-30

त्रिंशः सर्गः

प्रत्यक्षदर्शनेनावगतसकलसीतावृत्तः शिंशपास्थ एव हनुमान्सीतायाः समाश्वासनानाश्वासनयोर्गुणदोषौ विमृशन्समुचितसमये समाश्वासनमेवावश्यं कार्यमिति निश्चिनोति ।।

Weighing the pros and cons of comforting Sītā or remaining mum, now that he had come to know everything about Sītā at first hand, Hanumān decides upon the former course at the psychological moment.

अक्षि अक्षि (2-3-8) प्रति = प्रत्यक्षम्‌।
प्रति + अक्षि अम् 2-1-6 (यथार्थे – वीप्सार्थे), 1-4-90, 2-3-8, 1-2-43, 2-2-30
= प्रति + अक्षि 1-2-46, 2-4-71
= प्रत्यक्षि 6-1-77
= प्रत्यक्षि + टच् 5-4-107 गणसूत्रम् – प्रतिपरसमनुभ्योऽक्ष्ण:।
= प्रत्यक्षि + अ 1-3-3, 1-3-7
= प्रत्यक्ष 1-4-18, 6-4-148
प्रत्यक्ष + सुँ 4-1-2
= प्रत्यक्ष + अम् 2-4-83
= प्रत्यक्षम् 6-1-107

प्रत्यक्षं दर्शनम् प्रत्यक्षदर्शनम् 2-1-4 or 2-1-72
तेन प्रत्यक्षदर्शनेन

सीतायाः वृत्तम् = सीतावृत्तम् 2-2-8
सकलं च तत् सीतावृत्तम् = सकलसीतावृत्तम् 2-1-57
अवगतं सकलसीतावृत्तं येन स: = अवगतसकलसीतावृत्तः 2-2-24

शिंशपायां तिष्ठति = शिंशपास्थ: 3-2-4, 6-4-64

न आश्वासनम् = अनाश्वासनम् 2-2-6, 6-3-73, 6-3-74
समाश्वासनं च अनाश्वासनम् = समाश्वासनानाश्वासने 2-2-29
तयोः समाश्वासनानाश्वासनयोः

गुणश्च दोषश्च गुणदोषौ 2-2-29

विमृशति इति विमृशन्
मृशँ आमर्शने ६.१६१
मृश् + लँट् 3-2-123
= मृश् + शतृँ 3-2-124
= मृश् + श + शतृँ 3-1-77
= मृश् अ अत् 1-3-2, 1-3-8 (7-3-86 is stopped by 1-1-5 because the श-प्रत्यय: is ङिद्वत् by 1-2-4)
= मृशत् 6-1-97, 1-2-46
वि + मृशन् = विमृशन् 2-2-18

ref. गीता 18-63

समुचितश्चासौ समयश्च = समुचितसमयः 2-1-57
तस्मिन् समुचितसमये

कृ + ण्यत् 3-1-124
= कार्य 7-2-115, 1-1-51, 1-3-3, 1-3-7, 1-3-9, 1-2-46

निस् + चिनोति = निश्चिनोति 1-4-59, 1-4-80, 8-2-66, 8-3-15, 8-3-34, 8-4-40

न विनश्येत्कथं कार्यं वैक्लव्यं न कथं भवेत् |
लङ्घनं च समुद्रस्य कथं नु न वृथा भवेत् || ३९||

How should I act to ensure that the purpose may not be frustrated? How should I guard against thoughtlessness? And how, I wonder, should I ensure that my leaping across the sea does not go in vain?

तथा कर्तव्यम् – इति शेष:।

विक्लवस्य भाव: (कर्म वा) = वैक्लव्यम् (= बुद्धिहीनता)। Derivation similar to that of वैफल्यम् above.

एकत्रिंशः सर्गः

शिंशपास्थेन हनुमता मानुषीं भारतीमाश्रित्य रामजननादारभ्य स्वीयसीतादर्शनान्तं प्रतिपादितवृत्तं श्रुत्वा हर्षनिर्भरा सीता सर्वतश्चक्षुश्चालनेन निर्वर्णयन्ती शिंशुपाशाखास्थं हनुमन्तं विलोकयति ।।

Transported with joy to hear the story commencing from the birth of Śrī Rāma and ending with Hanumān’s espying Sītā, narrated in a human tongue by Hanumān remaining perched on Śiṁśapā tree, and casting her eyes all round, Sītā catches sight of Hanumān sitting on a bough of the same Śiṁśapā tree beneath which she stood.

“मानुष” derived above in verse 24.
स्त्रियाम् –
मानुष + ङीप् 4-1-15
= मानुष + ई 1-3-8, 1-3-3, 1-3-9
= मानुष् + ई 1-4-18, 6-4-148
= मानुषी

स्वस्येदम् = स्वीयं (सीतादर्शनम्)।
स्व कुँक् + छ 4-3-120, 4-2-138 वार्त्तिकम् – स्वस्य च, 1-1-46
= स्व क् + ईय 1-3-2, 1-3-3, 7-1-2
= स्वकीय
“आगमशास्त्रमनित्यम्” इति “कुँक्”-अभावे “स्वीय” इति रूपं सिध्यति।

नि:शेषेण भर: यस्याम् = निर्भरा 2-2-24

निर्वर्णयन्ती is derived similar to बोधयन्ती above.

जानकी चापि तच्छ्रुत्वा विस्मयं परमं गता ।
ततः सा वक्रकेशान्ता सुकेशी केशसंवृतम् । उन्नम्य वदनं भीरुः शिंशपामन्ववैक्षत ।। ५-३१-१६ ।।

Sītā (Janaka’s daughter) herself was struck with supreme wonder to hear that speech. Raising her face screened with (disheveled) hair, that timid lady with charming curly locks thereupon looked up into the Śiṁśapā tree (on which Hanumān was perched).

सु (= शोभना:) केशा: यस्या: 2-2-24 = सुकेशी/सुकेशा।
सुकेश + ङीष् 4-1-54
= सुकेश् + ई 1-3-8, 1-3-3
= सुकेशी 1-4-18, 6-4-148

In the absence of ङीष् (which is optional), we get the form सुकेशा 4-1-4.

ञिभी भये ३. २
भी + क्रु 3-2-174
= भीरु 1-3-8, 1-3-9. Note: 1-1-5 stops 7-3-84.

ऐक्षत posted on July 6, 2011.

द्वात्रिंशः सर्गः

प्रत्यक्षदृष्टमपि हनुमन्तं स्वाप्नं विभाव्य स्वप्ने कपिदर्शनमनर्थावहमिति मन्वाना सीता रामादिकुशलं परिचिन्त्याथ कारणान्तरैस्तस्यास्वाप्निकत्वं निश्चिन्वाना हनुमदुक्तस्य याथार्थ्यसिद्ध्यै ब्रह्मादीन्प्रार्थयते ।।

Imagining Hanumān to have been seen in a dream, though actually perceived by her, and believing the sight of a monkey in a dream to be ominous, Sītā becomes anxious about the welfare of Śrī Rāma and others. Then concluding him on other grounds to have been seen in her waking hours, she prays to Brahmā and other gods that the statement of Hanumān may come out to be true.

प्रत्यक्षदृष्टम् similar to प्रत्यक्षदर्शनम् derived earlier.

स्वप्ने भवम् = स्वाप्नम्
स्वप्न ङि + अण् 4-3-53, 4-1-83
= स्वप्न + अ 1-3-3, 1-3-9, 1-2-46, 2-4-71
= स्वाप्न + अ 7-2-117
= स्वाप्न् + अ 1-4-18, 6-4-148
= स्वाप्न

स्वप्ने भवम् = स्वाप्निकम्
स्वप्न ङि + ठञ् – वार्त्तिकम् (under 4-3-60) अध्यात्मादेष्ठञ् इष्यते। (अध्यात्मादिराकृतिगणः।)
= स्वप्न + इक 1-3-3, 1-3-9, 7-3-50, 1-2-46, 2-4-71
= स्वाप्न + इक 7-2-117
= स्वाप्न् + इक 1-4-18, 6-4-148
= स्वाप्निक

“मन्वान” derived earlier.

न अर्थ: = अनर्थ: 2-2-6, 6-3-73, 6-3-74

वहति = वह:
वहँ प्रापणे १. ११५९
वह् + अच् 3-1-134
= वह 1-3-3, 1-3-9
आवह 2-2-18

अनर्थस्य (2-3-65) आवह: = अनर्थावह: 2-2-8

अन्यै: कारणै: = कारणान्तरै: 2-1-72. ref. गीता 12-13 देहान्तरप्राप्ति:

“चिन्वान” derived above

अर्थमनतिक्रम्य = यथार्थम् 2-1-7
यथा (2-4-82) + अर्थ अम् 2-1-7 (पदार्थानतिवृत्तौ), 1-2-43, 2-2-30
= यथार्थ 1-2-46, 2-4-71
तस्य भाव: = याथार्थ्यम् 5-1-24

अहं हि तस्याद्य मनोभवेन सम्पीडिता तद्गतसर्वभावा |
विचिन्तयन्ती सततं तमेव तथैव पश्यामि तथा शृणोमि ।। ५-३२-१२ ।।

Constantly thinking (as I do) of him alone, tormented as I am by a longing for him, my whole affection being fastened on him, I likewise behold him and hear of him alone.

भू + अच् 3-1-134
= भो + अ 1-3-3, 1-3-9, 7-3-84
= भव 6-1-78
मनस: मनसि वा भव: = मनोभव: (काम:)।

तम् (रामम्) गता: = तद्गता: 2-1-24
सर्वभावा: 2-1-49
तद्गता: सर्वभावा: यस्या: सा = तद्गतसर्वभावा।


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